हिन्दी की भावी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका -डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा  

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लेखक- डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा

आधुनिक हिन्दी की यह असाधारण विशेषता है कि वह अपने वर्तमान रूप में किसी क्षेत्र विशेष की बोली नहीं है। उन्नीसवीं सदी से प्रचलित खड़ी बोली नाम से उसके किसी क्षेत्र की बोली होने का संकेत नहीं मिलता। यह नाम वास्तव में उसे ब्रजभाषा से भिन्न सूचित करने के लिए दिया गया था। ब्रज की 'ओ' कार बहुलता की जगह उसमें 'आ' कार की प्रधानता है और ब्रज की मधुरता के विपरीत उसमें खरापन या खडखडाहट अधिक है। मेरठ-दिल्ली के अतराफ की बोली से उसका उदय अवश्य हुआ, पर उस क्षेत्र की खड़ी बोली क्षेत्र का नाम भाषा के नामकरण के बाद मिला। बाँगरु, कौरवी और हरियाणवी नाम भी बाद में दिए गए। सबसे पहले इस भाषा को सिंधु के पार के देश 'हिन्द' और उसके निवासी 'हिन्दू' 'हिन्दुई' और 'हिन्दवी' ये सब नाम आठवीं से लेकर ग्यारहवीं-बारहवीं सदी तक लगातार आक्रमण करने वाले अरब, तुर्क, ईरानी और अफ़ग़ानों ने दिए थे। इस तरह हिन्दी भाषा को संपूर्ण देश की भाषा के रूप में सबसे पहले विदेशियों ने पहचाना और उसी के अनुरूप उसे नाम दिया। 'हिन्दुई', 'हिन्दवी' के साथ 'हिन्दी' नाम भी काफ़ी पुराना है, जैसा कि अमीर ख़ुसरो (1253-1325) के उल्लेख से सिद्ध होता है, हालांकि अमीर ख़ुसरो ने 'हिन्दी' नाम से, जान पड़ता है, संस्कृत का भी संकेत किया था, क्योंकि हिन्दी को अरबी के समान कहकर उन्होंने जो प्रशंसा की, वह संस्कृत पर अधिक लागू होती है।
बारहवीं-तेरहवीं सदी से शुरू होकर जब वह अपभ्रंश से निकलकर स्वतंत्र भाषा बन रही थी, तभी से हिन्दवी ने अठारहवीं सदी तक सारे देश में दूर-दूर फैलकर संपर्क भाषा का दायित्व संभाल लिया था। विचित्र संयोग है कि उस समय तक और उसके बाद उन्नीसवीं सदी के अंत तक वह हिन्दी साहित्य की मुख्य भाषा भी नहीं थी। अवधी और ब्रज और अंतत: ब्रज का हिन्दी का काव्य भाषा के रूप में पांच सौ वर्ष तक वर्चस्व बना रहा। परंतु अठारहवीं शताब्दी से जो नई सामाजिक चुनौतियां आने लगीं, उनका सामना करने में अपने व्यापक प्रसार के बावजूद ब्रजभाषा असमर्थ सिद्ध हुई। यह भारी जिम्मेदारी उठाने का सौभाग्य हिन्दवी नाम से प्रचलित भाषा को ही मिला। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी से ही विदेशी विजेताओं के द्वारा राज्य विस्तार के लिए जो सैनिक अभियान किये गए, उनमें यही भाषा जन संपर्क का माध्यम रही। इस कारण शुरू से ही उसकी क्षेत्रीय विशेषताएँ घिसने लगीं और अंतरप्रांतीय व्यवहार में आकर उसका नया रूप निखरने लगा। हिन्दी क्षेत्र की बोलियों के अलावा उसने भारत की प्राय: सभी मुख्य भाषाओं के अनेक तत्त्व आत्मसात् किए और अपनी असीम ग्रहणशीलता के बल पर उसने सारे देश में स्वेच्छा से अपनाए जाने की योग्यता पैदा कर ली। हिन्दी की यही शक्ति उसकी भावी संभावनाओं का स्रोत है।
जिस तरह उत्तर-पश्चिमी स्थल मार्गों से आए विदेशियों ने उसे हिन्दी नाम देकर पूरे देश की प्रमुख भाषा बनाया और उसी के माध्यम से अपना शासन उत्तर-पूर्व, दक्षिण और पश्चिम सभी ओर बढ़ाया, उसी तरह दक्षिण-पश्चिमी समुद्री रास्तों से आए यूरोप के व्यापारी, राजनीतिक विजेताओं ने भी हिन्दुस्तानी नाम से उसकी पहचान की। इस तरह दोनों नाम हिन्दी और हिन्दुस्तानी भाषा की अक्षेत्रीय, अंतरप्रांतीय और सर्व भारतीय व्यवहार योग्यता के सूचक है। इसी योग्यता के बल पर और अपनी मूल प्रकृति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अनुराग से यह भाषा अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की अधिकारी बन जाती है। हर नए राजनीतिक दौर में विदेशियों के द्वारा प्रतिष्ठा पाना इस मान्यता की गारंटी है।
सर्वसाधारण के व्यवहार की हिन्दी या हिन्दुस्तानी अपने दो भिन्न परिनिष्ठित और साहित्यिक रूपों में भारत और पाकिस्तान दो देशों की राजभाषा है। हिन्दी और उर्दू दो स्वतंत्र भाषाओं के रूप में भारतीय संविधान में भी स्वीकृत है। परन्तु यह सर्वविदित है कि उनकी भिन्नता और अभिन्नता, पृथकता और एकता के बीच लगभग एक सौ वर्ष तक जो मीठा-कड़ुवा विवाद चलता रहा और भारत में जो उनका मिला-जुला व्यवहार होता रहा और हो रहा है, उससे यह साफ प्रकट होता है कि हिन्दी और उर्दू ऐसी भिन्न और परस्पर अनमिल भाषाएँ नहीं हैं कि उनमें परस्पर संवाद संभव न हो। हिन्दी और उर्दू के भारत में कोई अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं। यदि उर्दू पाकिस्तान की राजभाषा है, तो भारत के भी कई राज्यों में उसे यह दर्जा मिला हुआ है। जिस तरह भारत के विभिन्न भाषा क्षेत्रों में हिन्दी कहीं भी अजनबी नहीं है और उसके माध्यम से हर हर जगह सामान्य व्यवहार संभव है, उसी तरह बल्कि उससे भी अधिक पाकिस्तान की सभी भाषाओं- पंजाबी, सिंधी और पश्तों के क्षेत्रों में हिन्दी के लिए सहज अनुकूलता है। भारत के हिन्दी भाषी को पाकिस्तान बनने के पहले से इन भाषा-भाषियों के साथ आत्मीयता स्थापित करने में जो आसानी होती थी, उसमें भी कोई फर्क नहीं पड़ा। विदेशों में हिन्दी भाषी भारतीय और पाकिस्तान के बीच भाषा का कोई अंतर नहीं रहता। फिर भी, हिन्दी और उर्दू नाम से दो भाषाओं वाले देशों की ये भाषाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार की भाषाएँ कही जा सकती हैं। इतना ही नहीं, भारत के पास-पड़ोस के देशों नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान, बर्मा और श्रीलंका में हिन्दी के सरल रूप का सामान्य व्यवहार किसी न किसी स्तर पर कमोबेश सीमा में प्रचलित है। हिन्दी के इस सरल रूप को हिन्दुस्तानी कहना अधिक उपयुक्त है। विशेष रूप से उर्दू के साथ अधिक निकटता प्रकट करने के लिए। भारत और पाकिस्तान दोनों की इस सम्मिलित भाषा की अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार की संभावनाएँ असीम हैं। पश्चिम एशिया के देशों में जहाँ पर इस समय भारतीयों और पाकिस्तानियों के आवागमन का क्रम बढ़ता जा रहा है, इसका स्पष्ट संकेत मिल रहा है। ज्यों-ज्यों हिन्दी, उर्दू भाषी व्यापार, कारोबार मज़दूरी और तकनीकी और ग़ैर तकनीकी पेशों के सिलसिले में फैलते जाएंगे, हिन्दी-हिन्दुस्तानी का व्यवहार जोर पकड़ता जाएगा। पश्चिम एशिया के देशों में हिन्दी-हिन्दुस्तानी में अरबी-फ़ारसी मूल के शब्दों की अपेक्षा बहुलता रहेगी। भारत बढ़ने पर दोनों देशों की निकटता में भी वृद्धि हो सकती है। हिन्दी-हिन्दुस्तानी के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार में फ़िल्मों का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी फ़िल्मों और सुगम संगीत की लोकप्रियता पाकिस्तान और पश्चिम एशिया के देशों में निरंतर बढ़ रही है। भाषा के प्रसार में इसमें अनायास सहायता मिलती है।
भारतीय संस्कृति का प्रसार किसी समय दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में हिन्देशिया, मलेशिया, कम्बोज, हिन्द-चीन से लेकर जापान, कोरिया और मंगोलिया तक था। चीन में भी बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ था। इस सांस्कृतिक अभियान की आधार भाषाएँ संस्कृत और पालि थीं। इन देशों की भाषाओं में संस्कृत और पालि का प्रभाव आज तक मौजूद है। श्रीलंका की सिंहली भाषा उसी वर्ग की है, जिसकी हिन्दी। संस्कृत और पालि के माध्यम से सिंहली और हिन्दी की निकटता है। इस प्राचीन सांस्कृतिक और भाषिक दाय को हिन्दी ही वहन कर सकती है। इन देशों में हिन्दी-हिन्दुस्तानी का अंतर्राष्ट्रीय रूप अपेक्षाकृत संस्कृतनिष्ठ होगा।
प्रवासी भारतीय दुनिया के अनेक भागों में काफ़ी बड़ी संख्या में फैले हुए हैं। इनमें हिन्दी के अलावा अन्य भाषा-भाषी भी हैं। पर अधिकांश में उनकी समान संप्रेषण भाषा हिन्दी बन गई है। मारिशस, फीजी, ट्रिनिडाड, गुयाना आदि भूतपूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों में बहुत बड़ी संख्या हिन्दी क्षेत्र के भोजपुरी बोली बोलने वालों की है। अन्य बोलियों और भाषाओं के बोलने वाले भी हैं और हिन्दुओं के अलावा मुसलमान भी हैं। सामान्य संप्रेषण के लिए इन सबने हिन्दी-हिन्दुस्तानी को ही अपनाया है। अफ्रीका के कुछ देशों दक्षिण अफ्रीका, केनिया, युगांडा आदि में भी जहाँ गुजराती भाषियों की संख्या अधिक है हिन्दी भाषा भारतीयों के सामान्य व्यवहार में अधिक आती है। इन देशों में आर्य समाज ने हिन्दी के प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत में हिन्दी की पूर्व प्रतिष्ठा होने पर इन देशों के मूल निवासी भी अधिकाधिक संख्या में हिन्दी को अपनायेंगे।
भारत की जनसंख्या बढ़ती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप अन्य भाषा-भाषियों की तरह हिन्दी भाषियों की प्रवासभीरुता कम होती जाएगी। तमिल भाषी तो कई शताब्दियों पहले दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में जा बसे थे। मलयालम भाषी केरलीय भी हाल में ही विदेशों में जाने लगे हैं। इधर कुछ दिनों से वे हज़ारों की तादाद में पश्चिम एशिया के देशों में भरते जा रहे हैं। पंजाबी भाषी दुनिया में हर जगह फैल गए हैं। अमरीका के पश्चिमी तट पर केलिफोर्निया में उन्होंने बड़े-बड़े फार्म बनाए हैं। इन सब की तुलना में हिन्दी भाषी शायद समुद्र तटों से बहुत दूर स्थल में सिमटे रहने के कारण और पंजाबियों की तुलना में साहसिकता और कर्मठता की दृष्टि से पिछड़े होने के कारण अधिक संतोषी प्रवासभीरु हैं। परंतु आबादी का दबाव और बेरोजगारी जैसे उन्हें कलकत्ता और बंबई जाने के लिए विवश करती है। विदेशों की ओर से आकृष्ट करेगी और भविष्य में जब भारत की विभिन्न भाषाओं वाले विदेशों में बसेंगे, तब अपने सामान्य आपसी व्यवहार के लिए हिन्दी-हिन्दुस्तानी का ही सहारा लेंगे। इंग्लैंड में जा बसे भारतीयों और पाकिस्तानियों का व्यावहारिक भाषा-सर्वेक्षण किया जाए तो कुल मिलाकर निष्कर्ष हिन्दी-हिन्दुस्तानी के पक्ष में ही निकलेगा। यह स्थिति इंग्लैंड के अलावा यूरोप के अन्य देशों में, अमरीका में और अन्यत्र भी होगी। इस संबंध में उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीयों, विशेष रूप से हिन्दी भाषियों का अंग्रेज़ी के प्रति दासभाव जैसा लगाव बहुत बड़ी बाधा है। पढ़े-लिखे, यानी अंग्रेज़ीदां हिन्दी भाषियों की अपनी भाषा के प्रति विशेष उदासीनता वास्तव में चिंत्य है।
सामान्य व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी-हिन्दुस्तानी का प्रसार हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका का प्रबल और मूलभूत अंग है। इस संबंध में भारत के विभिन्न भाषा क्षेत्रों में हिन्दी-हिन्दुस्तानी के व्यवहार रूपों की विविधता को ध्यान में रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी अंग्रेज़िया हिन्दी की न तो लिपि अलग है और न इसका समर्थक रही दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल, पूर्व भारत के बंगाल, असम और उड़ीसा, उत्तर भारत के कश्मीर और पश्चिम भारत के पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र के अनेक मुस्लिम बहुत छोटे-छोटे क्षेत्रों की हिन्दी, कलकतिया हिन्दी, बंबइया हिन्दी, कुछ फ़िल्मों के मज़ाक के तौर पर प्रयुक्त दक्षिणी भारतीयों की हिन्दी, पंजाबी हिन्दी, गुजराती हिन्दी, बंगाली हिन्दी आदि की तरह भिन्न-भिन्न देशों में प्रयुक्त हिन्दी-हिन्दुस्तानी में उन-उन देशों की भाषाओं का रंग आना अनिवार्य है। मानक हिन्दी में भी डच, फ्रेंच, पुर्तग़ाली और अरबी, फ़ारसी-तुर्की भाषाओं के न जाने कितने शब्द और कुछ भाषिक तत्त्व भरे पड़े हैं। वर्तमान समय में हिन्दी के देश व्यापी प्रसार के साथ भारतीय भाषाओं के प्रभाव से उसके रूपों में विविधता आती जा रही है। इसमें भी अधिक विविधता उसके सामान्य व्यवहार के अंतर्राष्ट्रीय प्रयोगों में आयेगी। उसके लक्षण आज भी देखे जा सकते हैं। हिन्दी की यह ऐतिहासिक उदारता बनी रहेगी। अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में इस तरह की उदारता अंग्रेज़ी में सबसे अधिक है और शायद फ्रेंच में सबसे कम। जिस तरह इंग्लैंड जैसे छोटे से देश में क्षेत्र भेद के अनुसार भाषा का प्रयोग भेद पाया जाता है, और जिस प्रकार अमरीका के भिन्न-भिन्न यूरोपीय भाषाओं के बोलने वालों की अमरीकी अंग्रेज़ी में विविधता पाई जाती है, उसी तरह भूतपूर्व अंग्रेज़ी साम्राज्य के अधीन देशों की अंग्रेज़ी में संबंधित भाषाओं का रंग लिए अंग्रेज़ी के तरह-तरह के रूप देखे जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार की हिन्दी-हिन्दुस्तान की भी कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति रहेगी। एक अंतर इस कारण अवश्य रहेगा कि अंग्रेज़ी का प्रसार शासन के बल पर हुआ, इसलिए सभी देशों की अंग्रेज़ी को उसके स्टैंडर्ड रूप की ओर उन्मुख बनाए रखने के प्रयास किए जाते रहे। हिन्दी-हिन्दुस्तानी के विविध रूपों को हिन्दी के परिनिष्ठित रूप की ओर उन्मुख होने की उस तरह की मजबूरी कभी नहीं हो सकती। राजभाषा हिन्दी के परिनिष्ठित रूप की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा ही इस संबंध में नियामक अधिकरण की भूमिका निभा सकती हैं।
व्यावहारिक हिन्दी की एक और प्रवृत्ति गत पचास-साठ वर्षों से तेज़ी से बढ़ती जा रही है। वह है, अंग्रेज़ी शब्द ही नहीं पदबंधों तक की ज्यों का त्यों हिन्दी वाक्यों में ठूँसने की प्रवृत्ति। भाषा व्यवहार के सभी स्तरों पर अंग्रेज़ी से परिचित हिन्दी भाषियों की हिन्दी-हिन्दुस्तानी में मिश्रण की यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ती जा रही है कि अक्सर क्रिया रूप और उसमें भी केवल सहायक क्रिया के रूप, परसर्ग और शायद क्रिया विशेषण rतो हिन्दी के रहते हैं, वाक्य के अन्य सभी घटक अंग्रेज़ी से लेकर प्रयुक्त होते हैं। हिन्दी के इस रूप को उस तरह का अभी कोई नाम नहीं दिया गया, जिस तरह अरबी-फ़ारसी शब्दावली के अतिशय बोझ से लदी हिन्दी को उर्दू नाम से अलग कर लिया गया था। इसका कारण शायद यही है कि उर्दू की तरह इस अंग्रेज़ी हिन्दी की न तो लिपि अलग है और न इसका समर्थक कोई अलग सांस्कृतिक या धार्मिक समुदाय। परन्तु भाषा प्रयोग के आधार पर समाज में वर्ग विभाजन तो इस प्रवृत्ति के कारण बढ़ ही रहा है। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी का प्रभाव और उसकी आतंकपूर्ण प्रतिष्ठा घटने के बजाए बढ़ती ही गई है। इस कारण इस अस्वस्थ और कुंठाजनक भाषा मिश्रण को रोकना कठिन जान पड़ता है। हिन्दी ही नहीं भारत की सभी भाषाएँ इस रोग की शिकार हो रही हैं। कोई देशव्यापी जन आंदोलन ही इस प्रवृत्ति को निरुत्साहित कर सकता है। हिन्दी में अंग्रेज़ी का यह मिश्रण उसके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी की तकनीकी शब्दावली अवश्य एक सीमा तक हिन्दी के मौखिक व्यवहार में सहायक होगी। बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त विभिन्न व्यावसायिक वर्गों के परस्पर संवाद की अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी में निश्चय ही मुख्य रूपों से अंग्रेज़ी और सामान्य रूप से अन्य यूरोपीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली का प्रयोग अधिक सुविधाजनक और प्राय: अनिवार्य होगा।
सामान्य व्यवहार की हिन्दी-हिन्दुस्तानी विविध रूपों की स्थिति देश में प्रचलित उसके विविध रूपों के समान स्टैंडर्ड हिन्दी से नीचे के स्तर की होगी। उच्च स्तर की हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग के दो मुख्य संदर्भ हैं और अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी पर विचार करते समय प्राय: उन्हीं पर अधिक ध्यान जाता है। पहला संदर्भ शैक्षणिक प्रयोगों का है और दूसरा राजनैतिक मान्यता का। शैक्षणिक संदर्भ में शिक्षा और उसके विभिन्न स्तर और ज्ञान-विज्ञान संबंधी विविध विद्वत कार्य आते हैं। भाषा की वास्तविक प्रतिष्ठा मुख्य रूप से इस पर निर्भर होती है। राजनीतिक संदर्भ के अंतर्गत वह सब अंतर्राष्ट्रीय कार्य आता है, जिसका संबंध विभिन्न देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क और वाणिज्य व्यवसाय से है। राष्ट्रसंघ और उसके अंतर्गत विभिन्न राजनीतिक, शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन भी इसी से संबंधित हैं। भाषा के अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार की यह सर्वोच्च स्थिति है और शैक्षणिक मान्यता बहुत कुछ उस पर निर्भर होती है।
शैक्षणिक दृष्टि से हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार की कई स्थितियाँ हैं। उन देशों में, जहाँ भारतमूल के निवासी अधिक संख्या में हैं, जैसे, फ़ीजी, मारिशस, ट्रिनिडाड, सुरीनाम, गुयाना, वहाँ प्रवासी भारतीयों के बीच हिन्दी सीखने-सिखाने की औपचारिक व्यवस्था काफ़ी अर्से से चल रही है। दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भी जहाँ भारतीय आबादियाँ एक साथ बसी हुई हैं, यह व्यवस्था पाई जाती है। अधिकतर यह कार्य स्वैच्छिक संस्थाओं के द्वारा होता है। पर कहीं-कहीं शासन द्वारा भी सहायता और मान्यता प्राप्त हुई है। परंतु यह शिक्षण शिक्षा के उच्च स्तर पर नहीं है, क्योंकि हिन्दी की उच्च शिक्षा प्राप्त करने से किसी प्रकार की उन्नति की आशा नहीं की जा सकती। इसे हिन्दी के शैक्षणिक व्यवहार का एक सीमित अंग ही कह सकते हैं, क्योंकि इसका उपयोग वही करते हैं, जो हिन्दी को अपनी भाषा मानते हैं। जब इन देशों के मूल निवासी भी इसका लाभ उठाने लगेंगे, तभी इसे वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार कहा जा सकेगा। वर्तमान रूप में इसे हिन्दी की भावी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका का प्रबल साधन अवश्य कहा जा सकता है। क्योंकि इसका असर हिन्दी-हिन्दुस्तानी के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है और उससे गैर हिन्दी भाषी मूल निवासी भी हिन्दी को अपनाने की ओर उन्मुख होते हैं। हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था के साथ-साथ अन्य शैक्षणिक कार्य, साहित्यिक क्रियाकलाप, सामयिक साहित्य, साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाएँ, प्रकाशन कार्य आदि के द्वारा भी हिन्दी के लिए अनुकूल वातावरण बनता है और उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की पृष्ठभूमि तैयार होती है। हम आशा कर सकते हैं कि भविष्य में इन देशों में हिन्दी को राजनीतिक मान्यता मिलेगी और शासन की सहभाषा के रूप में उसका प्रयोग होने लगेगा। अभी केवल फ़ीजी के संविधान में संसद में भाषण देने के लिए हिन्दुस्तानी की छूट मिली है। उच्च शिक्षा की लालसा पूरी करने के लिए इन देशों के नवयुवक अच्छी संख्या में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग और राष्ट्रभाषा समिति वर्धा की परीक्षाओं में बैठते हैं।
शैक्षणिक हिन्दी का वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय प्रसार यूरोप, अमरीका और एशिया के कुछ देशों में हुआ है। पश्चिमी और पूर्वी यूरोप में मिलाकर कम से कम एक दर्जन देशों में तीन दर्जन विश्वविद्यालय और संस्थानों में हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था है। कनाडा और संयुक्त राज्य अमरीका में लगभग चार दर्जन विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, जर्मन और रूसी में हिन्दी की अनेक कृतियों के अनुवाद हुए हैं। इन भाषाओं में हिन्दी के द्विभाषी कोश, व्याकरण, इतिहास और समीक्षा संबंधी महत्त्वपूर्ण शोधपरक और परिचयात्मक प्रकाशन भी हुए हैं। प्राच्य शिक्षा और भारतीय विद्या सम्मेलनों में हिन्दी और उर्दू को भी स्थान मिलने लगा। एशिया में नेपाल ही ऐसा देश है, जहाँ हिन्दी को उच्चतम शिक्षा तक स्थान मिला है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की प्रतिष्ठा है। श्रीलंका के कोलम्बो विश्वविद्यालय में भी इस तरह की व्यवस्था हुई है। जापान में भी कम से कम आधे दर्जन विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिन्दी के पाठ्यक्रम चलते हैं, जिनमें कई में उच्च शिक्षा की व्यवस्था है। विदेशों के अनेक विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिन्दी-उर्दू के सम्मिलित विभाग हैं। कुछ देशों में हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ भी मुद्रित या हस्त लिखित रूप में प्रकाशित होती हैं। परन्तु रूस और पूर्वी यूरोप के अन्य देशों को छोड़ सभी पश्चिमी देशों में हिन्दी शिक्षण या तो दक्षिण-पूर्व एशिया संबंधी अध्ययनों या भाषा विज्ञान विभागों के एक अंग के रूप में होता है। निश्चय ही हिन्दी को उन्नत देशों की भाषाओं के समान आदर नहीं मिला है। चीनी और अरबी भाषाओं की भी अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक स्थिति हिन्दी से बेहतर है। जब तक शैक्षणिक, प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से स्वयं देश में अंग्रेज़ी का स्थान हिन्दी से ऊँचा रहेगा। अभी तो यही आशा की जा सकती है कि हिन्दी भाषा और साहित्य स्वयं अपने बल पर, अर्थात् समृद्धि और गौरव अर्जित करके सम्मान प्राप्त करता जाएगा। यही वास्तव में स्थायी प्रतिष्ठा का मूल आधार है।
अंतर्राष्ट्रीय भूमि का अंतिम लक्ष्य हिन्दी के विश्वव्यापी राजनीतिक और कूटनीतिक व्यवहार और राष्ट्र की वास्तविक मान्य भाषा के रूप में विदेशों द्वारा उसे स्वीकार किया जाना है। राष्ट्रसंघ की अंग्रेज़ी, रूसी, फ़्रेंच, स्पेनिश, चीनी और अरबी भाषाओं के साथ उसे सातवीं भाषा के रूप में मान्यता मिलना, उसी व्यवहार का तर्क सम्मत प्रतिफल हो सकता है। परन्तु उपर्युक्त छह भाषाओं में अंतिम दो चीनी और अरबी का राष्ट्रसंघ के कार्यों में अपेक्षाकृत कम प्रयोग होता है। प्रधानता केवल पहली तीन अंग्रेज़ी, रूसी और फ़्रेंच की है। कहना न होगा इसका कारण राजनीतिक, आर्थिक, औद्योगिक और सामरिक शक्ति ही है। प्रथम विश्वयुद्ध के पहले फ़्रेंच और जर्मन का जो महत्त्व था, वह बाद में नहीं रहा। अंग्रेज़ी को फ़्रेंच के बराबर का दर्जा मिल गया और जर्मनी की पराजय जर्मनी भाषा के राजनीतिक पराभव का कारण बन गई। द्वितीय विश्वयुद्ध में फिर पराजित होकर जर्मनी के दो खंडों में विभाजित होने पर जर्मन भाषा विश्व के राजनीतिक मंच से विदा हो गई। इसके विपरीत अंग्रेज़ी ने फ़्रेंच को भी पीछे ढकेलकर विश्व भाषाओं में पहला स्थान प्राप्त कर लिया। इसका कारण अमरीका का राजनीतिक प्रभुत्व है, यद्यपि अंग्रेज़ी के पीछे खिसकती जा रही है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले दुनिया के भाषा मानचित्र पर रूसी का महत्त्व नहीं था, पर द्वितीय युद्ध के विजेताओं में अमरीका के साथ रूस का बराबरी का स्थान हो गया और रूसी भाषा भी दुनिया की दो महान् भाषाओं में गिनी जाने लगी। फ़्रेंच भाषा की महत्ता बनाए रखने के अनेक कारण हैं। फ़्रेंच की अपनी भाषिक, विशेषताएँ विशेष रूप से उसकी अर्थभ्रम से रहित अपेक्षाकृत सुनिश्चित अभिव्यक्ति क्षमता उसकी अंतर्राष्ट्रीय उपयोगिता को कायम रखने का बहुत बड़ा कारण है। साथ ही राजनीतिक दृष्टि से यूरोप में फ़्रांस का महत्त्व अद्वितीय रहा है। आधुनिक काल में उसका गौरवपूर्ण इतिहास जर्मनी की विश्वविजय का महत्त्वकांक्षा की पूर्ति में उसके द्वारा उपस्थित की गई बाधाएँ और अदम्य साहस के साथ जर्मनी का मुकाबला करते रहने की उसकी संकल्प शक्ति आदि अनेक कारणों से फ़्रांस की राजनीतिक प्रतिष्ठा स्थिर बनी रही। उसकी भाषा की प्रतिष्ठा के पीछे इन राजनीतिक घटकों का बहुत बड़ा हाथ है। स्पेनिश भाषा की मान्यता के पीछे जो ऐतिहासिक कारण हैं, उनमें दक्षिण अमरीका के अनेक देशों में उसके एकाकी प्रभुत्व का सबसे अधिक महत्त्व है। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के विरुद्ध चीन के अमरीका-रूस के मित्र पक्ष में रहकर विजयी होने से चीन का राजनीतिक महत्त्व बढ़ने के साथ चीनी भाषा को भी महत्त्व मिला। साथ ही भौगोलिक विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से भी चीन का पहला स्थान रहा है। अरबी भाषा अपने प्राचीन गौरव के बावजूद सदियों तक दबी रही, क्योंकि आधुनिक काल में अरब देशों की राजनीतिक स्थिति दुर्बल और पराधीनतापूर्ण थी। पर तेल भंडारों के धन से अरबों के भाग्य पलट गए और अचानक उनका महत्त्व बढ़ गया। धन के जोर से ही अरबी भाषा राष्ट्रसंघ की छठी अधिकृत भाषा हो गई।
भाषाओं की सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की उपरिलिखित परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भारत और उसकी राजभाषा-राष्ट्रभाषा हिन्दी को देखने पर दोनों के अंतर्राष्ट्रीय मान और महत्त्व का मूल्यांकन आसानी से किया जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले ही भारत ने दुनिया की बड़ी शक्तियों का ध्यान आकर्षित कर लिया था। भारतीय राजनेताओं में महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नाम विशेष रूप से विश्व विख्यात होने लगे थे। ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उसका राजनीतिक, आर्थिक स्वाधीनता का संघर्ष विश्व के इतिहास में अद्वितीय था। आज़ादी के बाद उसकी राजनीतिक सुस्थिरता, वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति विश्व की परस्पर संघर्षशील शक्तियों के राजनीतिक, सामरिक प्रभावों से मुक्त उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और एशिया और हिन्दी महासागर के देशों में उसकी भौगोलिक स्थिति आदि अनेक कारण हैं, जिनसे अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत का सम्मान ऊँचा हुआ। क्षेत्रीय विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया में वह दूसरे स्थान पर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला वह सबसे बड़ा देश है। नव स्वतंत्रता प्राप्त विकासशील देशों को गुटनिरपेक्ष विदेश नीति के आधार पर संगठित करने और उनके साथ मिलकर सामूहिक रूप में विश्वशांति, समता, बंधुत्व मानवता और आर्थिक न्याय का प्रबल आंदोलन चलाने में उसकी शानदार भूमिका रही है। विश्व की राजनीति में उसकी बात का वजन है। ऐसे महान् देश की भाषा आदर होना अवश्यंभावी है। इस प्रतिष्ठा के कारण स्वतंत्र भारत की संविधान स्वीकृत राजभाषा हिन्दी का सम्मान भी अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बढ़ा है। यह सम्मान कहीं अधिक बढ़ गया होता, अगर हिन्दी को पूरे तौर पर राजभाषा का दायित्व निभाने का अवसर मिल जाता। राजकीय कार्यों में अंग्रेज़ी का साम्राज्य अब भी कायम है। विदेश नीति और कूटनीति संबंधी सभी कार्य अंग्रेज़ी में होते हैं। भारतीय दूतावासों में अंग्रेज़ी ही चलती है। हिन्दी का प्रयोग केवल औपचारिक प्रतीक रूप में होता है। परन्तु यह आशा निराधार नहीं है कि हिन्दी अंग्रेज़ी के द्वारा अपहृत अपना पद अवश्य प्राप्त कर लेगी। जब कभी ऐसा हो सकेगा, हिन्दी विश्व भाषाओं के मंच पर ऊँचा स्थान पाएगी और तब वह दिन दूर न रहेगा, जब राष्ट्रसंघ में उसका वही स्थान होगा, जो अंग्रेज़ी, रूस और फ़्रेंच को प्राप्त है। चीनी और अरबों की तुलना में एशिया के देशों में उसका प्रसार और सम्मान अधिक होगा। इसका संकेत उसके सरल हिन्दी-उर्दू के मूल रूप हिन्दुस्तानी के संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप और उसके पास-पड़ोस के देशों में व्यापक प्रचलन में मिलता है। इसकी अपरिचित संभावनाओं का उल्लेख पीछे किया गया है। परंतु भारत को अपनी भाषा नीति के निर्धारण, नियोजन और राजकीय हिन्दी के स्वरूप पर व्यावहारिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण से सतत विचार और पुनर्विचार करते रहना ज़रूरी है।
यह बारम्बर समझते रहने और स्मरण रखने की बात है कि हिन्दी गत आठ सौ वर्षों से देश व्यापी संपर्क की भाषा राष्ट्रभाषा के पथ पर अग्रसर होती रही है। औपचारिक राजकीय मान्यता भी उसे मिली और यह मार्के की बात है कि इसे मान्यता दूर दक्षिण के मुसलमानी राज्यों में मध्य युग में ही मिल गई थी। लगभग तीन सौ वर्ष तक बहमनी सल्तनत में वह पद पर आसीन रही। लिपि अवश्य उसकी देवनागरी नहीं थी और उसका नाम दकनी या दक्खिनी हिन्दी था। परंतु उसी भाषा का उत्तर भारतीय आधुनिक रूप सामान्य संपर्क भाषा की तरह कमोबेश देश भर में प्रचलित रहा। इसी ऐतिहासिक अनिवार्यता के कारण उसे राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, केशवचंद्र सेन, महात्मा गांधी और अनेक गैर हिन्दी क्षेत्र के सामाजिक नेताओं ने अखिल भारतीय भाषा के रूप में पहचाना। आगे चलकर वह स्वाधीनता संग्राम की मुख्य माध्यम भाषा बनी और अंत में स्वतंत्र भारत की राजभाषा चुनी गई। हिन्दी उसका प्राचीनतर नाम है, जो मध्य युग में उसके अधिक प्रचलित नाम हिन्दुई या हिन्दवी जितना ही पुराना है। फ़ारसी-अरबी की शब्दावली और उसकी साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा के अधिक मिश्रण से हिन्दी की जो शैली अठारहवीं सदी में अलग उभर कर आई, उसका नाम उर्दू हो गया। लिपि की भिन्नता के कारण भाषा के दो रूपों का अलगाव अधिक स्पष्ट और स्थायी जैसा हो गया। परंतु दोनों के मूल में भाषा का जो एक ही सामान्य रूप विद्यमान है, उसे हिन्दुस्तानी नाम देना स्वाभाविक ही है। पूरे हिन्दुस्तान में वही प्रचलित है। उसके द्वारा हिन्दी का भारत की भाषाओं विशेषकर उर्दू के साथ सम्मिलन सहज हो जाता है। साथ ही वह भारत और पाकिस्तान के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करने का साधन भी है। संविधान की 351 वीं धारा में हिन्दी के विकास के लिए दिये गए निर्देश में हिन्दुस्तानी शैली का उल्लेख भारत की मिली-जुली संस्कृति के संदर्भ में किया जाना महत्त्वपूर्ण है। हिन्दुस्तानी उस संस्कृति की वाहक, संरक्षक और उन्नायक है। उसकी ग्रहण शीलता उसे एशिया की अनेक भाषाओं से अपनी भाषा संपदा बढ़ाते हुए बड़े विस्तार में ग्राह्य बनने में सहायक होती रहेगी।
परन्तु हिन्दुस्तानी कोई अलग भाषा नहीं है। इसी कारण संविधान की अष्टम अनुसूची में उसे नहीं दिखाया गया। हिन्दुस्तानी एक भावना है। देश के विभाजन को उस भावना द्वारा बचाने के उद्देश्य से ही उस पर अधिक जोर दिया गया था और भावनात्मक उद्देश्य से ही संविधान में हिन्दी के स्थान पर राजभाषा हिन्दुस्तानी नाम से अंकित कराने के प्रयास किये गए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस भावना के प्रेरणा स्रोत थे, परन्तु उसे पूर्ण भाषा के रूप में विकसित करना संभव नहीं था। हिन्दी और भारत की सभी विकासशील भाषाओं का संस्कृत के साथ ऐसा स्वाभाविक संबंध है कि उसे तोड़ने का प्रयास करना भाषा प्रवाह के स्रोत पर ही बाँध बनाने के समान है। संस्कृत का मुख्य उत्तराधिकार हिन्दी को ही मिला है। महात्मा गांधी की हिन्दुस्तानी भावना को भाषा रूप देने के उद्देश्य से संस्कृत की तत्सम शब्दावली को अरबी-फ़ारसी की शब्दावली के साथ बराबरी का संबंध जोड़ते हुए हिन्दी से दूर रखने के जो प्रयास किये गए उनकी परिणति हास्यास्पद ही रही। आधुनिक युग में हिन्दी के नये पथ पर चलने के शुरू में 1800 के आस पास मुंशी इंशा अल्ला ख़ाँ ने 'हिन्दवी छुट किसी और बोली का पुट' न आने देकर अरबी, फ़ारसी, संस्कृत और ब्रजभाषा आदि के प्रभावों से मुक्त भाषा गढ़ने का जो प्रयोग 'उदयभान चरित' में किया था, वह भी विफल रहा था। इसके बाद बीसवीं सदी के दूसरे दशक में संस्कृत की घनघोर तत्समप्रधान शैली में रचित 'प्रियप्रवास' के प्रसिद्ध कवि पंडित अयोध्यासिंह उपाध्याय ने 'ठेठ हिन्दी का ठाठ', 'चौखे चौपदे' और 'चुभते चौपदे' लिखकर इसी प्रकार के जो नमूने पेश किए उन्हें भी गंभीरता से नहीं लिया गया। भाषा की जिमनास्टिक कभी सफल नहीं हो सकती।
भाषा को उसकी परम्परा से काटा नहीं जा सकता। हिन्दी ने अपभ्रंश की गोद से उठकर चलना शुरू करते ही संस्कृत की संचित संपदा से पोषण पाना आरंभ कर दिया था। मध्य युग के संपूर्ण साहित्य में कबीर से लेकर पद्माकर तक संस्कृत की शब्द संपत्ति का जो प्रयोग हुआ, उसके बगैर साहित्य की रचना और भाषा का विकास हो ही नहीं सकता था। अरबी और फ़ारसी के प्रभाव से भी उसने बहुत लाभ उठाया। परंतु किसी भाषा के विकास में स्वयं उसकी ऐतिहासिक परंपरा और आगत विदेशी प्रभावों की बराबरी नहीं हो सकती। अरबी और फ़ारसी के अतिशय प्रभाव ग्रहण करने का परिणाम भाषा विभाजन और उर्दू नाम से एक नई भाषा के उदय में हुआ। जिस तरह मध्य युग के पुनरोदय और नव जागरण को प्रभावशाली वाणी देने के लिए संस्कृत का आश्रय आवश्यक था, उसी प्रकार उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के आधुनिक नव जागरण की अभिव्यक्ति के लिए वही अक्षय कोश काम आया। स्वतंत्र भारत की अनेकविध मांगों की पूर्ति भी उसी स्रोत से हो सकती है। यही अनुभव करते हुए संविधान की 351 वीं धारा में हिन्दी के विकास के लिए मुख्य रूप से संस्कृत से लाभ उठाने का निर्देश किया गया है। इस अनिवार्यता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। साथ ही, यह भी सहज अनिवार्यता है कि संपूर्ण देश की नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हिन्दी सभी सहभाषाओं के संपर्क सहयोग से लाभ उठाए। परंतु अपने विकास क्रम में सहजभाव से संस्कृत के स्रोत और अन्य भाषाओं के सहचारजन्य प्रभावों का उपयोग करते हुए हिन्दी को अपनी आत्मा-अस्मिता या निजता को सुरक्षित रखना ज़रूरी है।
हिन्दी की निजता को सबसे बड़ा खतरा अंग्रेज़ी के अत्यधिक दबाव से पैदा हुआ है। अंग्रेज़ी की अनुवाद भाषा के रूप में उसके प्रयोग में संस्कृत की शब्दावली का बोझ लदता जा रहा है। इस क्रम में उसके सामान्य जन से कट जाने का भी खतरा है। अपनी बोलियों से भी वह अलग होती चली जा रही है। इसीलिए यह ज़रूरी है कि उसे अपने सरल सहज रूप में विकास करने दिया जाए। उसे अपने आधारभूत सामान्य भाषा रूप से, जिसका उल्लेख संविधान में हिन्दुस्तानी शैली नाम से किया गया है, लगाव बनाए रखना ज़रूरी है। तकनीकी और पारिभाषिक शब्दावली के प्रयोग के अलावा अनावश्यक संस्कृत तत्समता से भाषा को बोझिल न बनाकर अगर उसे जहाँ तक संभव हो सरल, सहज रूप में हिन्दी-हिन्दुस्तानी के नज़दीक रखा जाए तो वह उर्दू का भी बहुत सा साहित्य आत्मसात कर सकती है। इससे देश में हिन्दी-उर्दू के वर्तमान भाषा विभाजन से उत्पन्न तनाव को दूर किया जा सकता है। यह भी संभव है कि पाकिस्तान के साथ भाषा संपर्क स्थापित हो जाए और भविष्य में भारत और पाकिस्तान इस उपमहाद्वीप की दो प्रधान भाषाओं हिन्दी और उर्दू की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के लिए मिलकर प्रयास करें। कम से कम तीन और राष्ट्र नेपाल, फ़ीजी और मारिशस इस प्रयास में शामिल हो सकते हैं।


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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
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