द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन : निर्णय और क्रियान्वयन -राजमणि तिवारी  

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लेखक- राजमणि तिवारी

28 अगस्त, 1976। प्रात: कालीन वेला। चतुर्दिक मोहक हरीतिमा। स्वागत करती शस्य श्यामला मही। मारिशस के सुरम्य स्थल मोका में स्थित महात्मा गांधी संस्थान का विशाल प्रांगण। दूर-दूर पर दृष्टिगोचर होती हुई पर्वतमालाएं और उनकी उपत्यकाओं में लहराते ईख के खेत। उनकी मधुर मनुहार मन को मोह रही थी। इंद्र देव रह-रहकर झीनी-झीनी फुहारों से अभिषेक करते प्रतीत हो रहे थे। उभरते-घुमड़ते बादल किसी का संदेश पहुँचाने के लिए बैचेन थे। मानो जो लोग वहाँ नहीं पहुँच पाए थे, उनकी उपस्थिति की सूचना देने का भार उन्हीं के कंधों पर हो। चारों तरफ़ प्रकृति की निराली छटा बिखरी हुई थी।

महात्मा गांधी संस्थान का संपूर्ण प्रांगण विश्व की चुनी हुई मनीषा और पांडित्य के सान्निध्य से पुलकित हो रहा था। लेखकों, कवियों, पत्रकारों, विद्वानों, विचारकों, समीक्षकों, प्रशासकों आदि का विशाल जमघट लगा हुआ था। उत्साह, स्फूर्ति, उल्लास और उमंग के भाव साक्षात् स्वरूप धारण करने का उद्यत से प्रतीत हो रहे थे। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्घाटन के क्षण निकट आ रहे थे। विश्व के लगभग 20 देशों के विद्वान् अपनी अपनी वेशभूषा में वहाँ उपस्थित थे, फिर भी वहाँ भारतीय वेशभूषा और भारतीयता का ऐसा प्रधान्य दिखाई पड़ रहा था, मानो हम भारत से 3000 मील दूर न होकर भारत के ही किसी नगर में बैठे हों। इस सम्मेलन में भारत, इंग्लैंड, अमरीका, फ़्रांस, फ़ेडरल रिपब्लिक ऑफ़ जर्मनी, हालैंड, जापान, जर्मन जनवादी गणतंत्र, चेकोस्लोवाकिया, इटली, स्वीडन, हंगरी, कीनिया, जांबिया, मलावी, तंजानिया, मेडागास्कर आदि लगभग 20 देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इनके अतिरिक्त मारिशस के कोने-कोने से आए साहित्यकार, लेखक, विद्वान् तथा सामान्य जनता अपार संख्या में उपस्थित थी।

भारत सरकार की ओर से 30 विद्वानों का एक सरकारी प्रतिनिधि मंडल भेजा गया था, जिसमें हिन्दी के मूर्धन्य विद्वानों के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के वरेण्य विद्वान, साहित्यकार, प्रशासक आदि भी सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों, कालेजों, स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं तथा निजी संस्थानों के लगभग 150 विद्वान, कलाकार आदि भी इस सम्मेलन में उपस्थित थे। उस समय विशाल पंडाल में उपस्थित अपार जन समूह के सम्मुख मारिशस, भारत और अन्य देशों के विद्वान् मंच पर विराजमान थे। सम्मेलन प्रारंभ होने की उद्घोषणा और मंगलाचरण के पश्चात् मारिशस की कुछ बालिकाओं ने निम्नलिखित प्रार्थना गीत प्रस्तुत किया :
हे जगत्राता विश्व विधाता, हे सुख शांति निकेतन हे।
प्रेम के सिंधु, दीन के बंधु, दु:ख दरिद्र विनाशक हे।
नित्य अखंड अनंत अनादि, पूरणब्रह्म सनातन हे।
जगआश्रय जगपति जगवंदन, अनुपम अलख निरंजन हे।
प्राणसखा त्रिभुवन प्रतिपालक, जीवन के अवलंबन हे।
हे जगत्राता विश्व विधाता, हे सुख शांति निकेतन हे।
 
इस प्रार्थना गीत के उदात्त और मधुर स्वरों ने उस वातावरण को किसी पुनीत मंत्र की भांति इस प्रकार अभिभूत कर दिया, जो केवल अनुभव का विषय है, वाणी का नहीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानों हम धरातल से ऊपर उठते जा रहे हों और किसी अनिर्वचनीय विराटता का अनुभव कर रहे हों। ऐसे ही आह्लादकारी वातावरण में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।

इस सम्मेलन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएँ भेजते हुए प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा था कि 'हिन्दी विश्व की महान् तथा सशक्त भाषाओं में से एक है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और आज़ादी के बाद भारत में, और दूसरे देशों में भी हिन्दी भाषा की अभिवृद्धि हुई है तथा इसके साहित्य का बहुत विकास हुआ है। आज कई महादेशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है, यह बहुत अच्छी बात है कि विश्व के हिन्दी प्रेमी ऐसे सम्मेलनों में मिलते हैं, जिससे 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भीवना बढ़ती है। लेकिन हिन्दी को किसी अन्य भाषा का अहित करके आगे नहीं बढ़ना है, बल्कि उन्हें साथ लेकर चलना है, जैसे कि एक परिवार छोटे-बड़े सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है।'

सर्वप्रथम उपस्थित प्रतिनिधियों और जन समुदाय का स्वागत करते हुए इस सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष श्री दयानंद लाल वसंत राय ने कहा, 'आज मारिशस के इतिहास में यह एक सुनहरा दिन है, जब इस देश में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। आज हमारा हृदय अत्यंत हर्ष और उल्लास से भरा हुआ है और हम इस सम्मेलन में पधारे हुए अपने सभी सम्मानित अतिथियों, प्रतिनिधियों, पर्यवेक्षकों तथा अन्य आमंत्रित भाइयों और बहनों का हार्दिक स्वागत करते हैं। हमारा ध्यान ख़ासतौर पर उन उदारमना अतिथियों की ओर जाता है, जो भारत सहित अनेक दूर दूर के देशों से यात्रा के कष्ट और असुविधाओं को सहन कर हमारे देश में पधारे हैं। उनके आगमन से हमारे इस विराट आयोजन की शोभा बढ़ी है। आप सब के स्वागत में केवल यहाँ की हिन्दी भाषी जनता ही नहीं, अपितु समूचे मारिशस के तेलुगु, मराठी, तमिल, उर्दू, गुजराती, चीनी, फ़्रेंच, अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ बोलने वाले भी सम्मिलित हैं।

इसके बाद मारिशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं हिन्दी के अनन्य प्रेमी डॉ. शिवसागर रामगुलाम ने इस सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए बड़े ही मर्मस्पर्शी शब्दों में कहा, 'मारिशस में हिन्दी का विकास हमारे समाज के विकास का दस्तावेज़ है। हमारे जो पूर्वज यहाँ आए थे, वे ख़ाली हाथ थे, उनके पास लड़ने का कोई हथियार नहीं था। उन्होंने बहुत दु:ख सहा। जानवर की तरह खेतों में रात और दिन काम किया। अपने धैर्य को जतन से बचाए रखा, क्योंकि उनके पास अपनी भाषा थी। वे हिन्दी, उर्दू, तमिल, तेलुगु, मराठी आदि बोलते थे। इन भाषाओं में बहुत ऊँचा ज्ञान और साहित्य है। अपनी भाषा की डोरी से उन्होंने अपने धर्म और अपनी संस्कृति को बांध रखा था।' मारिशस में भारतीय भाषाओं के विकास का क्रम बताते हुए उन्होंने आगे कहा, 'हमारा विश्वास है कि इन भाषाओं की रक्षा से हमारे देश की संस्कृति की रक्षा होनी है और इन संस्कृतियों के मेल से हम मारिशस में नई संस्कृति का निर्माण करेंगे, जिसमें सबका योगदान होगा।' 'मेरा विश्वास है कि हिन्दी प्यार और एकता की भाषा है। यह हमेशा से जनता की भाषा रही है। भारत और मारिशस, दोनों को स्वतंत्र कराने में हिन्दी का हाथ रहा है।

अपने सारगर्भित अध्यक्षीय भाषण में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नेता डॉ. कर्ण सिंह ने हिन्दी की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा, 'आज हिन्दी सभी प्रकार के विचारों की एक समर्थ वाहिनी बन चुकी है और बोलने वालों की संख्या को देखते हुए यह विश्व की चार प्रमुख भाषाओं में से एक है। इसमें अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने की क्षमता है। देववाणी संस्कृत के साथ तो हिन्दी का अधिक सामीप्य है, क्योंकि वह हिन्दी की ही नहीं, कई भाषाओं की जननी है। इस अवसर पर एकत्र सदस्यगण के सामने मैं यह प्रार्थना करना चाहूंगा कि जहाँ वे हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अग्रसर हैं, वहाँ उनका संस्कृत की ओर भी ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। इस सशक्त, सजीव भाषा के सीखने के प्रबंध हर उस देश में होने चाहिए, जहाँ पर हिन्दी भाषा-भाषी रहते हों। इससे हिन्दी साहित्यकारों तथा दार्शनिकों को ही लाभ नहीं होगा, बल्कि हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाने में सहायता होगी। इसके अतिरिक्त हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में परस्पर अनुवाद ज़रूरी है। भारत में लिखे जाने वाले हिन्दी साहित्य को अन्य देशों तक, और अन्य देशों के साहित्यकारों की हिन्दी रचनाओं को भारत पहुँचाना एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसी से हिन्दी जगत् की आंतरिक शक्ति बढ़ेगी और हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय रूप अधिक निखरेगा। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिकाओं की आवश्यकता है, जो हिन्दी का संदेश विश्व के हर उस क्षेत्र तक पहुँचाए, जहाँ हिन्दी भाषी तथा हिन्दी प्रेमी रहते हों।
यह सम्मेलन तीन दिन तक चलता रहा। सम्मेलन में जिन 4 प्रमुख विषयों पर विचार-विमर्श हुआ, वे इस प्रकार है :

  1. हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति, शैली और स्वरूप,
  2. जनसंचार के साधन और हिन्दी,
  3. स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका,
  4. विश्व में हिन्दी के पठन-पाठन की समस्याएँ।

 
प्रत्येक विषय पर विचार विमर्श करने के लिए तीन तीन विद्वानों का एक एक अध्यक्ष मंडल बनाया गया था। इस अध्यक्ष मंडल का एक सदस्य मारिशस का, दूसरा भारत का और तीसरा इनसे भिन्न अन्य किसी देश का विद्वान् होता था। इनके अतिरिक्त एक विद्वान् विषय के संयोजन का कार्य करता था। पहले विषय पर बनाये गए अध्यक्ष मंडल में श्री खेर जगत् सिंह (मारिशस), प्रो. डी.पी. यादव (भारत), प्रो. के. दोई (जापान) तथा डॉ. लोठार लुत्से (जर्मन संघीय गणराज्य) शामिल थे। डॉ. धर्मवीर भारती ने इसका संयोजन किया था। इस विषय पर भाग लेने वालों में जयनारायण राय, श्रीमती धनवंती रिक्वाय, श्री रामदेव धुरंधर, श्री देववंशलाल रामनाथ, श्री सोमदत्त बखौरी, श्री लेनार्ट पियर्सन, श्रीमती निकोल बलवीर, श्रीमती इवा अरादि, श्री ओडोलेन स्मेकल, श्रीमती कोहेन तथा प्रो. के. दोई प्रमुख थे। इस सभी विद्वानों ने हिन्दी की महानता बतलाते हुए उसे राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने पर जोर दिया।

'जन संचार के साधन और हिन्दी' नामक विषय पर विचार करने के लिए श्री वासुदेवसिंह (भारत), प्रो. के. दोई (जापान) और श्री मोहन लाल मोहित (मारिशस) का अध्यक्ष मंडल बनाया गया था। इसके संयोजक श्री चंदूलाल चंद्राकर थे। वक्ताओं में सर्वश्री शंकरदयाल सिंह, महावीर अधिकारी, दीपचंद्र बिहारी, मनोहरश्याम जोशी, रवींद्र वर्मा, श्रीकांत वर्मा, ए. रमेश चौधरी आरिगपूडि, कमलेश्वर, राजेंद्र अवस्थी, धर्मवीर जी धुरा, अरविंद कुमार आदि प्रमुख थे। हिन्दी के ऐतिहासिक योगदान की चर्चा करते हुए वक्ताओं ने बतलाया कि इसके माध्यम से कवियों, साहित्यकारों, संतों, विचारकों ने अपनी अनुभूतियों से देश-विदेश को जाग्रत किया है और वे इसे सार्वदेशिक तथा अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनाने में निरंतर प्रयत्नशील रहे हैं।

'हिन्दी के प्रचार-प्रसार में स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका' नामक विषय पर हुए विचार-विमर्श के अध्यक्ष मंडल में श्री सूरजप्रसाद सिंह मंगर (मारिशस), श्री एम. वी. कृष्णराव (भारत) और श्रीमती निकाल बलवीर (फ़्रांस) शामिल थीं। इसका संयोजन भारत के श्री आंजनेय शर्मा ने किया। वक्ताओं में सर्वश्री मधुकरराव चौधरी, मोहनलाल मोहित, डॉ. जयरामन, योगेंद्र शर्मा, इंद्रदेव भोला, डॉ. रत्नाकर पांडेय, हृदयग्रीवाचारी, राधाकृष्ण मूर्ति, मंगलप्रसाद तिलकधारी, डॉ. राजेश्वरैया इत्यादि प्रमुख थे। इन वक्ताओं ने कहा कि अगर हिन्दी के विकास, प्रचार और प्रसार का इतिहास देखा जाए तो साफ हो जाता है कि इसमें प्रारम्भ से अगर किसी का योगदान मिला है, तो स्वैच्छिक संस्थाओं का, जिन्होंने अपने अथक प्रयत्नों से हिन्दी का प्रचार, प्रसार और विकास अहिन्दी भाषा भाषी प्रान्तों में और विदेशों में भी किया है। शासन के द्वारा तो कार्रवाई होती रही, लेकिन जहाँ पर शासनों की दिक्कतें रहीं वहाँ स्वैच्छिक संस्थाओं ने कार्य किया है।

चौथे सत्र में 'विश्व में हिन्दी के पठन-पाठन की समस्या' विषय पर विचार-विमर्श हुआ, जिसके अध्यक्ष मंडल में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अतिरिक्त श्री सतकाम बलैल (मारिशस) और प्रो. ओदोलेन (चेकोस्लोवाकिया) शामिल थे। इसका संयोजन प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने किया। जिन-जिन विद्वानों ने इसमें भाग लिया। उनमें प्रो. हरवंशलाल शर्मा, श्री के.के. मंडल, डॉ. गोपाल शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, प्रो.जी. सुंदर रेड्डी, डॉ. कामिल बुल्के, श्री ठाकुरदत्त, श्री पूजानंद नेमा, श्री मोहन गौतम, श्रीमत कमलारत्नम, प्रो. श्यामनंदन किशोर तथा श्री सुधाकर पांडेय के नाम उल्लेखनीय हैं। इन वक्ताओं का विचार था कि हिन्दी के अध्ययन एवं अध्यापन की प्रणाली को और सशक्त बनाया जाए, इसके लिए नए अविष्कारों का भी प्रयोग किया जाए और शोध के क्षेत्रों को व्यापक बनाया जाए। भाषा और साहित्य की रक्षा के लिए मातृभाषा को ही अध्ययन-अध्यापन का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

सभी सत्रों में विचार-विमर्श का स्तर बहुत ही उच्च कोटि का रहा। इनमें हिन्दी के प्रचार, प्रसार, प्रयोग, प्रशिक्षण इत्यादि सभी पहलुओं पर गंभीरता और विस्तार से विचार किया गया। इस विचार-मंथन के परिणामस्वरूप सम्मेलन के अंत में एक मंतव्य प्रचारित किया गया, जिसकी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं।

  • इस अधिवेशन ने प्रथम हिन्दी विश्व सम्मेलन के बोधवाक्य- 'वसुधैव कुटुंबकम्' को स्वीकार किया है, जिसके अनुसार विश्व की एक परिवार के रूप में कल्पना की गई है। इस सम्मेलन का विश्वास है कि आज जब मानवता एक चौराहे पर जा खड़ी है, हिन्दी का प्रेम, सेवा और शांति की भाषा के रूप में उन सारी शक्तियों को बल देना चाहिए, जो 'एक विश्व एक परिवार' के आदर्श को और भी सुदृढ़ करें और जहाँ मानव के लिए जाति, धर्म, वर्ण और राष्ट्रीयता की सीमाएँ न हों। यह सम्मेलन उसी दृष्टिकोण को दुहराना चाहता है, जिसे प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन ने भी स्वीकार किया था कि वह हिन्दी के मामले में किसी भी प्रकार की ज़ोर-जबरदस्ती या लादने की दृष्टि नहीं रखता है और इसी प्रकार यह मानता है कि जो भाषा स्वेच्छा से स्वीकार की जाएगी, वही सारे विश्व में लोकप्रियता और मान्यता प्राप्त करेगी।
  • सम्मेलन ने प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में पारित इस प्रस्ताव का फिर समर्थन किया कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में एक आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान मिले और यह सिफारिश की कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक क्रमबद्ध कार्यक्रम बनाया जाए। सम्मेलन को यह जानकर संतोष हुआ कि प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के अन्य निर्णयों के बारे में भी ठोस कदम उठाए गए हैं, जिनमें विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना का निर्णय भी शामिल है।
  • सम्मेलन में भारत में समाचार पत्रों के संकलन के बारे में निर्गुट देशों के उस सम्मेलन का भी स्वागत किया गया, जिसमें सभी संवाद-सामग्री का एक 'पूल' बनाने का निर्णय लिया गया। सम्मेलन की धारणा है कि जन-संचार के अन्य सभी साधनों, जैसे- रेडियो, टेलिविजन, फिल्म तथा अन्य प्रकार के वैज्ञानिक उपकरणों का हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उपयोग किया जाए, ताकि वह 'एक विश्व एक परिवार' की उदात्त भावना का प्रचार कर सके।
  • सम्मेलन की धारणा है कि मारिशस, भारत, फ़िजी, त्रिनिडाड, गुयाना जैसे अन्य देशों में वहाँ की स्वैच्छिक संस्थाओं ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और यह माना गया है कि इन सभी संस्थाओं को उन देशों की सरकारों तथा जनता से सहायता मिलनी चाहिए। मारिशस और भारत जैसे देशों में तो हिन्दी का अभियान राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना के आंदोलन से ही जुड़ा रहा है, लेकिन इन देशों की संस्थाओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अपना हिन्दी प्रचार-कार्य जारी रखा है।
  • सम्मेलन ने विश्व के अनेक देशों में हिन्दी के पठन-पाठन संबंधी समस्याओं पर भी विचार किया और इसमें पाठ्य पुस्तकों, वैज्ञानिक उपकरणों तथा अन्य बातों के अभाव में किन प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, इस पर भी विचार किया। इन कठिनाइयों को दूर करने का अवश्य ही प्रयत्न होना चाहिए। साथ ही साथ यह भी विचार प्रकट किया गया कि क्षेत्र के विशेषज्ञों को विशिष्ट गोष्ठियों का आयोजन कर इन समस्याओं के बारे में व्यावहारिक सुझाव और समाधान प्रस्तुत करने चाहिए। विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे विशाल मंच पर तो इन समस्याओं का निर्देश मात्र दिया जा सकता है।
  • द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारिशस में हुआ है, इस बात पर सभी प्रतिनिधियों ने अपनी हार्दिक प्रसन्नता प्रकट की और उसका मुक्त कंठ से अभिनंदन किया। सम्मेलन जिस कुशलता के साथ संचालित हुआ, उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। अनेक प्रतिनिधियों ने यह इच्छा व्यक्त की कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सम्मेलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की दृष्टि से किसी संगठन का विचार किया जाए। एक विशेष सुझाव दिया गया कि मारिशस में ही एक विश्व हिन्दी केंद्र की स्थापना की जाए, जो सारे विश्व की हिन्दी गतिविधियों का समन्वय कर सके और एक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन हो, जो भाषा के माध्यम से ऐसे समुचित वातावरण का निर्माण कर सके, जिसमें मानव विश्व का नागरिक बनकर रहे और विज्ञान और अध्यात्म की महान् शक्ति एक नए समन्वित सामंजस्य का रूप ले सके। सम्मेलन के विचार में यह उचित होगा कि इस कार्य के नेतृत्व के लिए मारिशस के प्रधानमंत्री डॉ. शिवसागर रामगुलाम जी से ही निवेदन किया जाए, जो द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष हैं और जिनका सुयोग्य, अनुभवी एवं प्रज्ञायुक्त मार्ग दर्शन इसके लिए परम उपयोगी होगा।
  • द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी प्रतिनिधि और पर्यवेक्षकों का यह अभिमत रहा है कि यह सम्मेलन मात्र हिन्दी के इतिहास में ही नहीं, वरन् मानवता की निरंतर यात्रा में भी एक युगांतकारी घटना है। इसलिए यह सम्मेलन विश्व के उन समस्त स्त्री-पुरुषों की ओर स्नेह और मैत्री का हाथ बढ़ाता है, जो ऐसे ही महान् आदर्शों के लिए काम कर रहे हैं। सम्मेलन में यह सुदृढ़ धारणा प्रकट की गई कि तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन होने तक की अवधि तक हिन्दी राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय दोनों क्षेत्रों में आदर्श प्रगति कर लेगी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
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63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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