विश्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ -डॉ. कामता कमलेश  

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लेखक- डॉ. कामता कमलेश

          विगत कुछ वर्षों से हिन्दी का वैश्विक मंच विशाल से विशालतर होता जा रहा है। राष्ट्र संघ में हिन्दी की स्थापना का प्रयास विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन आदि ऐसी घटनाएं हैं जिनसे हिन्दी की क्षमता का सहज ही ज्ञान हो जाता है। अब हिन्दी एक देशीय नहीं अपितु बहुदेशीय भाषा का रूप ले चुकी है। यही क्या बोलने वाले की दृष्टि से भी हिन्दी संसार की चतुर्थ बड़ी भाषा है। इस समय भारत से बाहर शताधिक विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों में हिन्दी का पठन-पाठन इस बात का द्योतक है कि हिन्दी मात्र साहित्य की चीज नहीं वरन् वह हृदयों को जोड़ने वाली ऊर्जा भी है और प्रेम की गंगा भी वर्तमान समय में हिन्दी का लेखन एवं प्रचार प्रसार प्रायः दो रूपों में हो रहा है प्रथम के अन्तर्गत वो देश आते हैं जहां के लोग हिन्दी को एक विश्व भाषा के रूप में 'स्वांत: सुखाय’ सीखते, पढ़ते-पढ़ाते हैं। इसके अन्तर्गत रूस, अमेरिका, कनाडा, इंगलैण्ड, जर्मनी, इटली, बेल्जियम, फ्रांस, चैकोस्लोवाकिया, रूमानिया, चीन, जापान, नार्वे, स्वीडन, पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको आदि देश आते हैं। दूसरे के अन्तर्गत वे देश आते हैं जहां भारत से जाने वाले प्रवासी भारतीय और भारतवंशी लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं जिनकी मातृ भाषा हिन्दी रही जो कि आजकल मॉरीशस फिजी, गुयाना, सूरीनाम, कीनिया, ट्रिनीडाड-टुबैगो, बर्मा, थाइलैंड, नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया, दक्षिणी अफ्रीका आदि देशों में रह रहे हैं। इन्हें हिन्दी अपनी पैतृक-संपत्ति के रूप में मिली। इन दोनों प्रकार के देशों में हिन्दी का रचना संसार बहुत ही विपुल एवं समृद्ध है।
          भाषा और साहित्य की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। इसीलिए हिन्दी भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम’ को लक्ष्य करके प्रसारित हो रही है। विश्व की इस महान् भाषा के विकास के लिए विभिन्न भारतेतर देशों में संचार साधन के रूप में आकाशवाणी, दूरदर्शन के साथ साथ पत्र पत्रिकाओं का खुलकर सहयोग लिया जा रहा है।

मॉरीशस

          (हिन्द) महासागर में अवस्थित मॉरीशस ही वह पहला देश है। जहां सर्वप्रथम दिसंबर 1834 में प्रवासी भारतीयों के चरण पड़े थे। अन्य देशों में विनीडाड 1845, द. अफ्रीका 1860, गुुयाना 1870, सूरीनाम जून 1873, फीजी मई, 1879 में भारतीय मज़दूर पहुंचे थे। मॉरीशस ही वह प्रथम भारतेतर देश है जहां विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हुआ और राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने का प्रस्ताव भी सर्वप्रथम इसी ने ही रखा था। अतः विश्व हिन्दी साहित्य में मॉरीशस का अपना विशिष्ट स्थान बन गया है। इस समय वहां भावयित्री एवं कारयित्री दोनों प्रतिभाएं एक साथ कार्यरत हैं। हिन्दी पत्रकारिता की दृष्टि से मॉरीशस में सर्वप्रथम 15 मार्चए 1909 को 'हिन्दुस्तानी’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्र हिन्दी, अंग्रेजी तथा गुजराती में एक साथ प्रकाशित होता था। इसके प्रथम संपादक डॉ. मणिलाल थे। इस पत्र के माध्यम से ही वहां के लोगों में सामाजिकए राजनीतिक चेतना का उदय होने के साथ साथ
निज भाषा उन्नति अहैए निज उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान केए मिटै न हिये को सूल।।
का भी अनुभव किया। लेकिन डॉ. मणिलाल के भारत आने के बाद ही इस पत्र का प्रकाशन बंद हो गया। सन् 1910 में डॉ. मणिलाल ने वहां आर्य समाज की स्थापना की और एक प्रेस भी खोला। यहीं से सन् 1911 में 'माॅरिशस आर्य पत्रिका’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह एक साप्ताहिक पत्र था। पहले यह पत्र आर्य सभा के पदाधिकारियों की देख रेख में चला। फिर सन् 1916 में पं. काशीनाथ किष्ठो इसके संपादक बने जिन्होंने बड़ी लगन और निष्ठा से इसे कई वर्षों तक जीवित रखा। इसमें आर्य समाज की शिक्षा के साथ साथ वैदिक धर्म को भी प्रधान स्थान मिलता था। इसी वर्ष श्री रामलाल के संपादन में ‘ओरिंटल गजे़ट’ नाम का एक और पत्र प्रकाशित हुआ। इसमें भारतीयों के बारे में प्रचुर सामग्री छपती थी। सन् 1920 में इंडोमॉरीशस संघ के तत्वाधान में 'मारिशस टाइम्स’ का प्रकाशन हुआ। 1924 में श्री गजाधर राजकुमार के संपादन में मॉरिशसमित्र’ नाम का एक पत्र निकला जिसमें अधिकतर सामाजिक सुधार तथा भ्रातृत्व भावना के लेख छपते थे। फिर सन् 1929 में ‘आर्य वीर’ नाम का एक द्विभाषिक पत्र निकला। यह एक साप्ताहिक पत्र था जिसके प्रथम संपादक पं. काशीनाथ किष्ठो ही हुए। इसमें आर्य समाज के विचारों का बाहुल्य रहता था।
          सन् 1933 में सनातन धर्मावलंबियों में श्री रामासामी नरसीमुलु (नरसिंह दास) के संपादन में 'सनातन धर्मांक’ पत्र निकला। जिसमें हिन्दू धर्म और रीति रिवाजों पर विपुल सामग्री दी जाती थी यह एक द्विभाषिक पत्र था। मॉरीशस के भारतवंशियों में सांस्कृतिक चेतना जाग्रत करने के उद्देश्य से सन् 1936 में इंडियन कल्चरल एशोशिएशन की स्थापना हुई। इस संस्था ने ‘इंडयन कल्चरल रिव्यू’ नाम का एक पत्र निकाला जिसके प्रथम संपादक थे डॉ. के. हजारी सिंह जो मोक स्थित महात्मा गांधी के वर्तमान निदेशक हैं। इसी संस्थान में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन सन् 1976 में हुआ था। सन् 1936 में रिव्यू के एक पूरक हिन्दी पत्र 'वसंत’ का प्रकाशन हुआ जिसके संपादक थे पं. गिरजानन उमाशंकर। कुछ वर्ष प्रकाशित होने के बाद यह पत्र बंद हो गया। पाँच वर्ष पूर्व 'वसंत’ का पुनर्जन्म हुआ और इसके वर्तमान संपादक हैं मारिशस के प्रसिद्ध लेखक श्री अभिमन्यु अनंत। यह एक मासिक पत्र है तथा महात्मा गांधी संस्थान के तत्वाधान में प्रकाशित हो रहा है। यह पूर्ण साहित्यिक धारा पत्र है। इसमें नवोदित रचनाकारों को अधिक स्थान मिलता है। इसका कहानी विशेषांक काफ़ी ख्याति अर्जित कर चुका है। विदेशी हिन्दी पत्रों में वसंत का स्थान सर्वोपरि माना जा सकता है तथा इसका स्तर भी भारतीय श्रेष्ठ पत्रों के समान ही है।
          सन् 1942 में पब्लिक रिलेशंस ऑफिस से 'मासिक चिट्ठी’ नाम से एक लघु पत्र निकला जो सूचनात्मक अधिक था। सन् 1945 में ‘आर्यवीर जागृति’ नाम से एक दैनिक पत्र निकला जिसके संपादक थे प्रो. विष्णुदयाल वासुदेव। इसने भी पर्याप्त ख्याति अर्जित की थी परंतु कुछ वर्षों के बाद इस बंद होना पड़ा। सन् 1948 में 'जनता’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके प्रथम संपादक हुए श्री जयनरायण राय। इसमें साहित्यिक और हिन्दी के लिए समर्पित भाव को स्थान मिला। बाद में इसको कुछ समय के लिए बंद होना पड़ा परंतु पुनः सन् 1974 में इसका पुन:प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस समय 'जनता’ मॉरीशस का सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक माना जाता है। तथा इसके वर्तमान संपादक हैं श्री राजेन्द्र अरुण। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के समय इसने हिन्दी प्रचार प्रसार के लिए उत्कृष्ठतम भूमिका निभाई थी। सन् 1948 में ही एक और पत्र 'जमाना’ भी विष्णुदयाल बंधु के संपादन में निकला। यह मॉरीशस के हिन्दी लेखकों का सहयोगी पत्र था। और इसमें अधिकतर हिन्दी की रचनाओं का स्थान दिया जाता था। अब यह पत्र कभी कभार ही निकल पाता है। इसके उपरांत आर्य सभा मॉरीशस ने पुनः ‘आर्योदय’ नाम का एक और पत्र निकाला। यह पत्र आज भी वैदिक धर्म और हिन्दी की सेवा बड़ी निष्ठा से कर रहा है। सन् 1953 में मॉरीशस आमाल गामटेड के तत्वाधान में 'मज़दूर’ का प्रकाशन हुआ जिसमें प्रवासी भारतीयों के समाचारों को प्रमुखता से छापा जाता था। सन् 1959 में श्री भगतसुरज मंगर और श्री रामलाल विक्रम के संपादन में 'नवजीवन’ का प्रकाशन हुआ। फिर सन् 1960 में मॉरीशस हिन्दी परिषद का त्रैमासिक पत्र ‘अनुराग’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका को सम्पूर्ण मॉरीशसीय लेखकों का सहयोग प्राप्त था। इसके प्रथम संपादक थे पं. दौलत शर्मा। इसमें कविताए कहानी, नाटक, संस्मरण, भेंटवार्ता तथा निबंध को भरपूर स्थान दिया जाता है। यह पत्र इस समय मॉरीशस का एकमात्र त्रैमासिक साहित्यिक पत्र है। संप्रति इसके संपादक हैं मारिशस के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कवि और लेखक श्री सोमदत्त बखौरी। इसी वर्ष 'समाजवाद’ पत्र का भी प्रकाशन हुआ जो थोड़े दिनों बाद बंद हो गया। हिन्दू मॉरीशस कांग्रेस ने ष्कांग्रेस नाम से तथा प्रशिक्षण महाविद्यालय ने 'प्रकाश’ नाम से सन् 1964 में अपने अपने पत्र निकाले। प्रकाशन में वहां के प्रशिक्षणार्थियों की रचनाओं का बाहुल्य होता है। यह पत्र अब भी वार्षिक अंक के रूप में प्रकाशित हो जाता है। प्रो. रामप्रकाश इसके संपादक हैं। सन् 1965 में मॉरीशस में सर्वप्रथम एक बाल पत्रिका का प्रकाशन हुआ जिसका नाम था 'बाल सखा'। यह पत्रिका हिन्दी लेखक संघ के तत्वाधान में प्रकाशित हुई।
          सन् 1970 में मॉरीशस के प्रसिद्ध आर्य नेता श्री मोहनलाल मोहित के संपादन में ‘आर्य समाज’ का हीरक जयंती विशेषांक प्रकाशित हुआ तथा सन् 1973 में 'वैदिक जरनल’ का प्रकाशन। इन दोनों पत्रों का संकल्प हिन्दी भाषा को सुदृढ़ बनाना था। सन् 1974 में त्रियोले से ‘आभा’ दर्पण’ नाम के दो विशुद्ध साहित्यिक पत्र निकले। ये मासिक पत्र थे। ‘आभा’ के समपादक हैं मारिशस के उदयीमान कवि तथा कहानीकार श्री महेश रामजियावन। ‘आभा’ का कहानी विशेषांक पाठकों में काफ़ी चर्चित रह चुका है। इसी के साथ द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष श्री दयानंदलाल वसंतराय के संपादन में 'शिवरात्रि’ वार्षिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्र आज भी अपनी गरिमा और गौरवमयी परंपरा के साथ प्रकाशित होता है। इसमे भी हिन्दी साहित्य को प्रचुर स्थान दिया जाता है। तथा संस्कृत शिक्षा के लिए भी कभी कभार अच्छे लेख प्रकाशित होते हैं। सन् 1975 में हिन्दी सरस्वती संघ, त्रियोले की त्रैमासिक पत्रिका 'रणभेरी’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिसमें वहां के हिन्दी रचनाकारों को विशेष रूप से प्रोत्साहन देने का संकल्प है। इस प्रकार मॉरीशस में हिन्दी पत्रों की एक लंबी पृष्ठ श्रंखला समय के साथ निरंतर बढ़ती जा रही है जो कि विश्व हिन्दी साहित्य के लिए एक शुभ लक्षण है।

फिजी

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
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3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
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13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
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14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
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16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
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59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
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63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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