तुलनात्मक भारतीय साहित्य एवं पद्धति विज्ञान का प्रश्न -डॉ. इंद्रनाथ चौधुरी  

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है भारतकोश का नहीं।
{{#css:
  1. bodyContent {width: 97%; color:#333333; background-color: #fef5f6; padding:10px; padding-top:none; padding-right:none; border: thin solid #ffa6a6; margin-top:10px;}

hr { background-color: #f44f4f; margin-top:10px; margin-bottom:10px;} }}

लेखक- डॉ. इंद्रनाथ चौधुरी

संस्कृत काव्यशास्त्र ने तुलनात्मक भारतीय साहित्य के उद्भव या विकास में जहाँ कोई योगदान नहीं दिया, वहाँ दूसरी ओर हमारे पारंपरिक संस्कृत पांडित्य की कतिपय अद्भुत विशेषताओं के कारण भी संस्कृत साहित्य के इतिहास में इस ओर कोई सचेष्टता नहीं दिखाई पड़ी। संस्कृत के सृजनशील कृतिकारों ने देशी भाषा में लिखित साहित्य के प्रति कोई रुचि नहीं दिखलाई और इसलिए इस साहित्य की संस्कृत पटभूमिका को लेकर कोई रचना उपलब्ध नहीं है। हमारे आधुनिक भाषाओं के उद्भव के साथ साथ इस दिशा में तुलनात्मक अध्ययन की संभावनाएं दिखाई पड़ीं, मगर फिर भी ब्राह्मणवाद से जुड़े हुए हमारे संस्कृत पांडित्य ने इस ओर कोई कदम नहीं बढ़ाया। सन 1753 में अपने आक्सफ़ोर्ड लेक्चर्स ऑफ़ पोयट्री में जब राबर्ड लाउथ ने हिब्रू कविता के साथ यूनानी कविता की तुलना की, तब भारतवर्ष में देवभाषा संस्कृत की कविताओं के साथ देशी या विदेशी भाषाओं में रचित कविता की तुलना एक अमानवीय व्यापार थी। इसीलिए भारतवर्ष में भारतीय, फ़ारसी तथा अरबी कविताओं के तुलनात्मक अध्ययन का अवकाश नहीं था यद्यपि अठारहवीं शताब्दी में संस्कृत, देशी भाषा अथवा अरबी, फ़ारसी जानने वाले विद्वान् इस देश में मौजूद थे। इसलिए उन्नीसवीं शती के अंत में जब इस देश में आधुनिक साहित्य पांडित्य का प्रसार हुआ, तब हमारे यहाँ तुलनात्मक साहित्यिक अध्ययन की कोई परंपरा ही नहीं थी। अन्यान्य कार्यों के लिए अरबी, फ़ारसी के ज्ञान की ज़रूरत तो थी, मगर दूसरी एशियाई भाषाओं में रचित साहित्य के ज्ञान की हमने कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं की। दूसरे एशियाई साहित्य पर भारतीय साहित्य, दर्शन एवं धर्म के प्रभाव का तुलनात्मक विवेचन भारतीय विद्वानों के स्थान पर यूरोपीय विद्वानों ने शुरू किया। अंग्रेज़ी साहित्य के संपर्क में आने पर ही भारत में साहित्य के प्रति तुलनात्मक दृष्टि का वास्तविक प्रसार हो सका और इस कार्य में अंग्रेज़ी के माध्यम से दूसरे यूरोपीय साहित्य से भी हम परिचित हो सके। मगर बीसवीं शती के प्रारंभ में जब विभिन्न आधुनिक भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य की ओर हमारा रुझान बढ़ा, तब आलोचना कार्य में तुलनात्मक दृष्टि को स्वीकार करने पर भी तुलना के लिए दूसरी भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य के स्थान पर अंगेज़ी साहित्य की ओर ही हमारा ध्यान गया। कदाचित इसका एक कारण, जैसा कि आर. के. दास गुप्त कहते हैं हमारी वह औपनिवेशिक मनोवृत्ति थी, जिसके फलस्वरूप दूसरी भाषाओं के स्थान पर अंग्रेज़ी साहित्य के प्रति ही हमारा पूरा ध्यान केंद्रित रहा। (विगनिंग्स ऑफ़ कंपैरेटिव लिटरेचर, शोध लेख, 1977)। साधारण पाठक यह समझते थे कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित मध्ययुगीन साहित्य की एक जैसी विषय वस्तु और अभिप्रायों का साम्यमूलक तुलनात्मक अध्ययन अंग्रेज़ी साहित्य की तुलना में भारतीय भाषाओं में रचित किसी एक साहित्य के अध्ययन को अधिक महत्त्व दिया, क्योंकि उनके अनुसार बौद्धिक दृष्टि से यह ज़्यादा लाभदायक था। यह निश्चित है कि अंग्रेज़ी साहित्य के प्रति हमारे आग्रह के फलस्वरूप हमारी साहित्यिक दृष्टि का विकास हुआ और हमने एक बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में साहित्य को ग्रहण करने की कोशिश की। हमारे आधुनिक साहित्यकारों ने पाश्चात्य साहित्य के संदर्भ में आधुनिक भारतीय साहित्य के विकास की बात की और इस तरह तुलनात्मक दृष्टिकोण का प्रसार किया।
भारतीय संदर्भ में भारतीय साहित्य की अवधारणा ही अपने आप में तुलनात्मक साहित्य है, क्योंकि यहाँ एक से अधिक साहित्यों की ओर संकेत है। मगर विभिन्न भारतीय साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन की एक स्वतंत्र स्थिति है। यह फ़्रांसीसी-जर्मन संप्रदाय की तरह कृतियों के तथ्यपरक संपर्कों (रपोर्टस डी फेट) की छानबीन नहीं हो सकती, क्योंकि विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित साहित्यों का पारस्परिक संपर्क उस रूप में बाह्य (एक्सटर्नल) नहीं है, जैसे कि पाश्चात्य तुलनात्मक साहित्य में जर्मन फ़्रांसीसी या रूसी साहित्य के संबंधों को बाह्य कहा जाता है। वहाँ इनमें संपर्क चेतनता के स्तर पर नहीं होता वरन् संपर्क स्थापित करना पड़ता है और एक सुनिश्चित स्थिति बन जाने पर तथ्यों के रूप में उनका विश्लेषण हो पाता है। बहुभाषिक देश होने के नाते हम एक जटिल चेतनता में जीते हैं। भले ही हम एक ही भाषा (जैसे हिन्दी) बोलते हों। बहुभाषिक स्थिति (मल्टीलिंग्वल सिचुएशन) बहुभाषीय अवस्थिति (पौलिग्लॉट ओरिएनटेशन) से भिन्न एक विशिष्ट चेतना है और इस स्थिति में पनपने वाले साहित्यों (जैसे हिन्दी, बंगला, मराठी आदि) के अध्ययन के लिए उन मूल ऐतिहासिक तथा साहित्यिक स्रोतों से परिचित होना पड़ता है, जिनकी प्रेरणा से इन साहित्यों में लगभग एक ही प्रकार की आवेशात्मक तथा बौद्धिक अनुभूतियों का प्रसार हुआ है। भारतीय तुलनात्मक साहित्य की यह पहली विशेषता है, जिसके फलस्वरूप पाश्चात्य तुलनात्मक साहित्य एक बहुभाषिक स्थिति में प्रसारित स्वाभाविक रूप से तुलनात्मक है और इसके विपरीत पाश्चात्य तुलनात्मक साहित्य नाना भाषाओं की एक असद्श दुनिया है, जहाँ तुलना को रूप देना पड़ता है।
एक ही प्रकार के ऐतिहासिक तथा साहित्यिक स्रोतों से प्रभावित होने के कारण यहाँ सादृश्यमूलक अध्ययन के लिए अधिक अवसर हैं। इसका तात्पर्य कोई सार्विक अनुभूति का सादृश्यमूलक अध्ययन नहीं, वरन् एक निश्चित ऐतिहासिक स्थिति में उभरने वाली घटनाओं से प्रभावित साहित्यों का अध्ययन है, जिनमें आपस में कोई दूसरा प्रतीयमान संबंध नहीं है, जैसे कि देश विभाजन की ऐतिहासिक स्थिति के आश्रय से शरणार्थियों की अनुभूतियों को लेकर हिन्दी के यशपाल और बंगला के प्रबोध कुमार सन्याल के उपन्यासों का अध्ययन।
मगर तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन के लिए हमारे पास भारतीय साहित्य की कोई एक अवधारणा नहीं है। अलग अलग भाषाओं में रचित साहित्यों के आश्रय से अनुलंबीय ढंग से भारतीय साहित्येतिहास का अध्ययन भारत तुलनात्मक साहित्य का एक बहुत ही प्रमुख क्षेत्र है। एकक व्यवस्था स्तर पर एकक साहित्य के रूप में भारतीय साहित्य के इतिहास की अवधारणा का निर्माण बहुत ही ज़रूरी है। भारतीय साहित्य की बात करते हुए हम सांप्रतिक काल में भी इसे विभिन्न भाषाओं में अभिव्यक्त नाना साहित्यों का मात्र संग्रह ही मानते हैं। हमारी साहित्यिक परंपरा के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण को हम अभी तक पूरा नहीं कर पाए हैं। एकक साहित्य के रूप में भारतीय साहित्य की अवधारणा का निर्माण तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के आश्रय से ही पूरा किया जा सकता है।
आधुनिक संदर्भ में भारतीय साहित्य पर एक ओर मारिशस का प्रभाव पड़ा और दूसरी ओर नई रोशनी में प्राचीन के पुनर्निर्माण की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। भारतीय तुलनात्मक साहित्य के संदर्भ में यह प्रभाव विवेचन, जैसा कि डॉ. अमिय देव कहते हैं पाश्चात्य तुलनात्मक साहित्य के प्रभाव विवेचन के अनुरूप नहीं हो सकता। तीसरी दुनिया का देश होने के नाते एक औपनिवेशिक मनोवृत्ति के सहारे अंग्रेज़ी ज्ञान-विज्ञान हमारी चिंतन धारा में प्रवेश कर गया है। इसलिए प्रभाव के तथ्यों का विवेचन करते हुए लेखकों की मनोवृत्ति के मनोविज्ञान से परिचित होना भी ज़रूरी है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा को और अधिक चमकाने के लिए प्रभाव का उपयोग मात्र सान के रूप में नहीं किया था। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के प्रभाव अध्ययन में उस तनाव का विवेचन भी ज़रूरी है, जिसमें पराधीन भारत का लेखक जी रहा था। एक ओर भारतीय साहित्य (संस्कृत) की सशक्त अविच्छिन्न धारा में पलने वाला लेखक और दूसरी इस तरह इन दोनों के बीच जीने वाले लेखक का तनाव, इस द्वि-संरचना के तनाव की ऐतिहासिक व्याख्या आवश्यक है। भारतीय साहित्य के इतिहास के निर्माण में इस द्विआधारी संरचना को ध्यान में रखना पड़ता है और पाश्चात्य प्रभाव का हमारी परंपरा से संघर्ष और उससे पैदा होने वाले तनाव और उसका विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है। भारतीय साहित्य के प्रभाव विवेचन के अंतर्गत इस तनाव का अध्ययन संपूर्ण भारतीय साहित्याध्ययन को तुलनात्मक बनाने के लिए बाध्य करता है।
किसी एक भारतीय भाषा में रचित एकक साहित्याध्ययन में कृतियों का अध्ययन, लेखक के व्यक्तित्व का अध्ययन और साथ ही काल, परिवेश और जातिगत संदर्भों में अध्ययन में कारण-कार्य संबंधों का ध्यान रखना ज़रूरी होता है, मगर तुलनात्मक साहित्याध्ययन में कारण-कार्य संबंधों के दूसरे गहरे रूपों से परिचित होना बहुत ही आवश्यक है। इसलिए साहित्य के इतिहास से अलग तुलनात्मक साहित्यिक इतिहास की रचना तुलनात्मक साहित्य की प्रविधि से ही संभव हो पाती है। उदाहरण के रूप में, बंगला के कवि मधुसूदन दत्त ने पहले पहल अंग्रेज़ी में लिखना शुरू किया। साहित्य का इतिहास मात्र इसकी सूचना देगा मगर तुलनात्मक साहित्यिक इतिहास इसका कारण बताएगा। और यह भी कहेगा कि उस समय भारतीय विद्वान् अंग्रेज़ी में लिखना पसंद क्यों करते थे। साहित्य का इतिहास यह भी सूचना देगा कि मधुसूदन ने कब बंगला में लिखना शुरू किया और साहित्यिक इतिहास उसका कारण ढूँढ कर लाएगा। साहित्य का इतिहास उनकी अंग्रेज़ी कविता 'मैं आलबियां के सुदूर तट के लिए आहें भरता हूँ' में अभिव्यक्त दृष्टि का बंगला कविता माँ, इस दास को याद रखना' में परिवर्तित होने की सूचना देगा मगर साहित्यिक इतिहास इसका विश्लेषण करेगा और यह भी बताएगा कि बंगला रचना में 'आलबियां' को कवि किस प्रकार आत्मसात् करता है (देखिए, अमिय देव का शोध लेख कंपैरेटिव इंडियन लिटरेचर 1981)। वस्तुत: तुलनात्मक साहित्य के पद्धति विज्ञान के आश्रय से भारतीय साहित्य के इतिहास की साहित्यिक इतिहास का एकक अवधारणा बन सकती है। कालक्रम के स्थान पर समस्वार्थता के तत्त्वों (एलीमेंट्स ऑफ़ सौलिडेरिटी) के आधार पर विवेचन करने पर ही यह संभव हो सकता है, मगर समस्वार्थता के तत्त्वों को चुनने के लिए भारतीय साहित्य के संदर्भ में उन कारण-कार्य संबंधों का ध्यान रखना होगा, जिनके पीछे पाश्चात्य साहित्य का एक ख़ास हाथ्? रहा है। दरअसल भारतीय साहित्य के साहित्यिक इतिहास की रचना में पाश्चात्य साहित्य के साथ भारतीय साहित्य के संबंधों तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित साहित्यों के पारस्परिक संबंधों में पहला संबंध बिल्कुल ऐतिहासिक है और दूसरा अंशत: ऐतिहासिक एवं अंशत: काव्यशास्त्रीय सौंदर्यपरक रहा है। स्वाधीनता के बाद तीसरी दुनिया की स्थिति बन जाने से पाश्चात्य साहित्य के साथ हमारे इस ऐतिहासिक संबंध में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है। मध्ययुगीन भारतीय साहित्य के साथ अरबी तथा फ़ारसी साहित्य के ऐतिहासिक एवं काव्यशास्त्रीय सौंदर्यपरक संबंधों का अध्ययन भी इसमें जुड़ा हुआ है।
अब तक के विवेचन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पाश्चात्य तुलनात्मक साहित्य से अलग भारतीय तुलनात्मक साहित्य के लिए भारतीय साहित्यिक इतिहास की संकल्पना की रचना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विषय है। भारत के बहुभाषीय स्वरूप के कारण इस संकल्पना की रचना तुलनात्मक साहित्य के स्तर पर ही संभव है। तुलनात्मक साहित्य की प्रविधि के आश्रय के एकक व्यवस्था स्तर पर एकल साहित्य के रूप में भारतीय साहित्यिक इतिहास की अवधारणा का निर्माण हो सकता है। भारतीय विद्वानों में सर्वप्रथम श्री अरविंद ने अपनी पुस्तक 'इंडियन लिटरेचर' में समस्वार्थता के तत्त्वों के निर्देश आधार पर भारतीय साहित्य की अवधारणा के निर्माण का सफल प्रयत्न किया था। उन्होंने वैदिक काल से लेकर भक्ति काल तक के भारतीय साहित्य के केंद्रीय स्तर, रूप तथा सौंदर्यात्मक मूल्य का पता लगाया और भारतीयों के सांस्कृतिक मन की अभिव्यक्ति के रूप में उसे स्वीकृति दी। श्री अरविंद के अनुसार भारतीय मन का मूल स्वर आध्यात्मिक, अंतर्दृष्टि तथा मनोगत है (द इंडियन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडियन कल्चर, भाग xiv)। बाद में सुनीति कुमार चटर्जी, नगेन्द्र कृष्ण कृपलानी आदि ने इसी मूल स्वर को स्वीकारते हुए भारतीय साहित्य के दूसरे समस्वार्थता के तत्त्वों का उल्लेख किया, जिसके द्वारा भारतीय साहित्य की एकता का पता लग सके। कृष्ण कृपलानी का कहना है कि विभिन्न भारतीय साहित्य के बदलते हुए प्रारूप के बावजूद कुछ तत्त्व दूसरों की अपेक्षा अधिक विशिष्ट प्रमाणित हुए हैं, और जिन्हें काल नष्ट नहीं कर सका है। इनमें से एक है, एक असीम सत्ता की प्रमुख अनुभूति (माडर्न इंडियन लिटरेचर 1980, पृष्ठ 120)। एकता के इन तत्त्वों की सहायता से ही भारतीय साहित्य के एकक रूप का ढांचा तैयार हो जाता है। इस ढांचे में बाद में अरबी और फ़ारसी तथा पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के प्रभाव स्वरूप चिंतन और अभिव्यक्ति के नए स्वर उभरते हैं। उदाहरण के लिए सूफ़ी विचारधारा अथवा स्वच्छंतावादी यूरोपीय दृष्टि आदि। मगर इससे भारतीय साहित्य के मूल स्वर की प्रामाणिकता और अधिक सिद्ध हुई है और अनिवार्य अपवर्तन, उत्क्रमण तथा रूपांतरण से भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य और अधिक विस्तृत हो सका है। आज नाना प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारणों से भारतीय साहित्य की प्राण शक्ति या उसके मूल स्वर पर दबाव पड़ रहा है, परंतु फिर भी यह मूल स्वर अपने जटिल विन्यास में अब भी विद्यमान है। यहाँ केवल एकता के तत्त्व नहीं वैविध्य के तत्त्वों को भी ध्यान में रखना पड़ेगा, क्योंकि समस्वार्थता के तत्त्वों से निर्मित अन-टूटी भारतीय परंपरा को स्वीकारते हुए विभिन्न भाषाओं में लिखने वाले हमारे लेखकों की स्वाधीनता भी महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के रूप में महाकाव्य की परंपरा ने हमारे लेखकों को बहुत ही प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप तुलसीदास, कंबन, कृत्तिबास, माधव कंडाली, मुक्तितेश्वर, अभिनव पंपा आदि की रचनाओं में एकरूपता दिखाई पड़ती है, मगर साथ ही इनका वैविध्य भी आकर्षक है। ये सारे लेखक एक ही परंपरा से जुड़े होने पर भी आकर्षक है। ये सारे लेखक एक ही परंपरा से जुड़े होने पर भी निराले ढंग से एक दूसरे से भिन्न भी हैं। भारतीय साहित्य की एकता उसके इस वैविध्य के कारण और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। (शिविर कुमार दास, द आइडिया ऑफ़ एन इंडियन लिटरेचर, वगर्थे। 19 : 3)। इस प्रकार भारतीय साहित्य के इतिहास की रचना में इस निर्देश आधार की सहायता से यानी एकता और वैविध्य के तत्त्वों के आश्रय से विभिन्न भाषाओं की रचनाओं के सर्वभारतीय संबंधों को आँकना सहज हो जाता है।
भारतीय साहित्य के इतिहास की रचना में दूसरा निर्देश आधार हमारी राष्ट्रीय अनुभूति के परिवर्ती आयाम हैं, जिनको विभिन्न कथ्यों के द्वारा साहित्य में पुन: सृजित किया गया है। इससे भविष्य के काल विभाजन की समस्या का बहुत ही अच्छा समाधान हो सकता है। राष्ट्रीय अनुभूति के परिवर्ती आयामों के आश्रय में ऐतिहासिक दृष्टि से विश्वासोत्पादक अविच्छिन्न साहित्यिक अभिव्यक्ति का आलेख प्रस्तुत किया जा सकता है। उदाहरण के रूप में, वीर काव्यों की युद्धानुभूति और उथल-पुथल, भक्ति, रीति तथा वैष्णव काव्यों की आध्यात्मिक तथा रोमानी प्रेमानुभूति, नव जागरण की अनुभूति, स्वच्छंदतावादी लोकोत्तर अनुभूति, राष्ट्रगान की अनुभूति, प्रकृतवादी तथा यथार्थानुभूति, सामाजिक यथार्थ या परिवर्तनवादी अनुभूति तथा सांप्रतिक काल में लेखकों की विघटित तथा मोहभंग की स्थिति। इस अध्ययन में प्रांतीय भाषाओं में रचित साहित्य के विशिष्ट लक्षणों का तुलनात्मक प्रस्तुतीकरण भी अपेक्षित है। यहाँ भी एकता और विविधता के आश्रय से भारतीय साहित्य के इतिहास की रचना करनी है।
तुलनात्मक भारतीय साहित्य के स्रोतों जैसे वैदिक तथा संस्कृत साहित्य, पुराण, धर्मग्रंथ, रामायण, महाभारत, जातक ग्रंथ, कला संगीत, लोककथा, अरबी-फ़ारसी स्रोत तथा बाद में पाश्चात्य स्रोत और इनका भारतीय साहित्य के कथ्य, बुनावट और संरचना पर पड़े प्रभाव को ठीक ढंग से आंकने पर विभिन्न भाषाओं के साहित्य में पाए जाने वाली एकता और विविधता में एक सर्वभारतीयता परिलक्षित होती है, जो एकक भारतीय साहित्य की अवधारणा का मूल तत्त्व है। आधुनिक काल में इस सांस्कृतिक एवं एवं साहित्यिक अविच्छिन्नता को तोड़ते हुए बहुत से लेखकों ने मूल भारतीय परंपरा पर विदेशी विचारधाराओं को अध्यारोपित किया है। मगर संरचना, बुनावट तथा कथ्यों के आश्रय से परंपरा तथा संस्कृति की निरंतरता के अध्ययन के साथ पश्चिमीवाद के अधपके प्रभाव पर आधारित आत्मा तथा व्यक्तित्व विरोधी (एंटी सैलफ़ एंड एंटी बीइंग) रचनात्मकता का अध्ययन भी भारतीय साहित्य के इतिहास के सांश्लेषिक ढांचे को निर्धारित करने के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन के लिए तुलनात्मक पद्धति की सहायता लेनी पड़ेगी। तुलनात्मकवादी आलोचक के लिए तुलना एक सचेतन एवं मूलभूत पद्धति है। साहित्यिक उदाहरणों की अव्यवस्थित विस्तृत सूची को समेटने के लिए जब तुलनात्मक पद्धति के अंतर्गत तुलना का प्रयोग किया जाता है, तब अध्ययन से निकलने वाले निष्कर्षों का इस हद तक तनुकृत होने की संभावना रहती है, जहाँ यह अवधारणा अपनी शक्ति काफ़ी खो देती है। अवधारणा को तनुकृत (डाइल्यूट) कहने की यह प्रवृत्ति अगर एक निश्चित सीमा को पार कर जाये, जहाँ पर प्रत्येक संभाव्य तुलनाएँ तुलनात्मक शोध का अंग मान ली जाती हैं, तब इस पद्धति की अपनी विवेचक शक्ति भी समाप्त हो जाती है। उदाहरण के लिए आधुनिक बोध जो प्रकट करने वाले प्रत्येक, हिन्दी, बंगला या मराठी नाटक में विसंगती बोध को एक दूसरे का पर्याय मान लेना है, अथवा प्रगतिशील प्रत्येक कविता को प्रगतिवाद का पर्याय मान लेना अथवा हर नई कविता को अस्तित्ववादी विचारधारा के साथ जोड़ना तुलनात्मक पद्धति के साथ अन्याय करना है। आधुनिक साहित्य के प्रत्येक पक्ष, विधा कथ्या या प्रवृत्ति में कुछ तुलनीय अंश अवश्य विद्यमान रहता है। मगर तुलनात्मक पद्धति के लिए यह आवश्यक है कि तुलनात्मक विश्लेषण एवं तुलनात्मक विवरण के अंतर को प्रकट करते हुए अध्ययन का प्रसार करे। प्रत्येक विवरण कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से तुलनात्मक होता है, मगर किसी एक पद्धति, ढांचा या प्रतिमान के आश्रय से किया गया प्रत्येक विश्लेषण ऐसा नहीं होता। इसीलिए तुलनात्मक साहित्य की समस्याओं को समझते हुए पद्धति के रूप में तुलना के प्रयोग में बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ती है। तुलनात्मक साहित्याध्ययन सादृश्य संबंधात्मक, परंपरा अध्ययन अथवा प्रभाव सूत्रों का अध्ययन होता है। यह साम्य या वैशाभ्यमूलक हो सकता है। मगर दोनों ही स्थितियों में अध्ययन का गहन या सुव्यवस्थित होना आवश्यक है। सादृश्य संबंधात्मक अध्ययन में तुलनात्मकतावादी आलोचक 'पॉलीजेनेटिक' पद्धति का सहारा लेता है, जहाँ उसकी सांश्लेषिक दृष्टि के पीछे ठोस औचित्य विधान नहीं होता। यहाँ तुलनात्मकतावादी आलोचक का विश्रांति का मूड होता है एवं उससे ही चिंतन का प्रसार संभव होता है एवं अध्ययन की सारी दृष्टि सृजनात्मक विधिगत (डियोटरो क्रिएटिव) बन जाती है। परंपरा अध्ययन में साहित्यों में प्रतिफलित राष्ट्रीय चेतना (स्पिरिट) का समांतरीय अध्ययन किया जाता है। तुलनात्मक साहित्याध्ययन में प्रभावसूत्रों का अध्ययन उसकी केंद्र पद्धति है। प्रभावसूत्रों के अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति मात्र स्रोतों या माडलों की खोज नहीं करती है। इसका मुख्य कार्य यह विश्लेषित करना है कि प्रापक लेखक ने अपने माडल का प्रयोग कैसे किया है। अपने कलात्मक अभिप्रायों को अप्रधान बनाते हुए कैसे उसने अपने माडल को नया रूप दिया है तथा कौन सी नई काव्यात्मक क्रिया को उसमें जोड़ा है। आखिरकार साहित्यिक पांडित्य को व्यवस्थित ढंग से प्रसारित होना तभी संभव होता है, जब साहित्यिक कृति की 'साहित्यिकता' की खोज को आलोचना का मुख्य केंद्र बिंदु स्वीकार कर लिया जाता है।
तुलनात्मक आलोचना तुलनात्मक पद्धति का आधार नियम है। तुलनात्मक भारतीय साहित्य के सुव्यवस्थित काव्यशास्त्रीय सौंदर्यपरक तथा आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए भारतीय तुलनात्मकतावादी आलोचक इस कोशिश में हैं कि वे अपनी ही तुलनात्मक आलोचना का प्रसार तथा अधिभाषा का निर्माण करें। संस्कृत तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र के तुलनात्मक पर्यवेक्षण के द्वारा ही एक लाभदायक सर्वभारतीय आलोचनात्मक सिद्धांत भाषा का निर्माण किया जा सकता है। जिससे ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय तथा काव्यशास्त्रीय सौंदर्यपरक दृष्टि की सहायता से तुलनात्मक भारतीय साहित्य के नाना आयामों का मूल्यांकन संभव है। मगर मूल्यांकन के लिए तुलनात्मक पद्धति को अंतर्विधावर्ती होना ज़रूरी है। इस पद्धति विज्ञान का यह विश्वास है कि औचित्य ही सर्वमान्य सिद्धांत है। संस्कृत काव्यशास्त्र के साथ पाश्चात्य काव्यशास्त्र को जोड़कर निर्मित 'अधिभाषा' की अंतर्विधावर्ती दृष्टि की सहायता से मूल्यांकन की तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन का वास्तविक प्रसार कर सकता है। इस प्रकार के अध्ययन से ही विभिन्न साहित्यों में एक कॉमन आईडेंटिटी को ढूँढ निकालना तथा अन्तत: एकता और विविधता के धरातल पर भारतीय साहित्य के एकक साहित्य रूप की अवधारणा का निर्माण संभव हो पाता है।



टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
1. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव
2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
हिन्दी का विकासशील स्वरूप
14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
17. मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी
18. राजभाषा के रूप में हिन्दी का विकास, महत्त्व तथा प्रकाश की दिशाएँ श्री जयनारायण तिवारी
19. सांस्कृतिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास डॉ. त्रिलोचन पांडेय
20. हिन्दी का सरलीकरण आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा
21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
22. जन की विकासशील भाषा हिन्दी श्री भागवत झा आज़ाद
23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
25. हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप प्रो. विजयेन्द्र स्नातक
देवनागरी लिपि की भूमिका
26. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी श्री जीवन नायक
27. देवनागरी प्रो. देवीशंकर द्विवेदी
28. हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या प्रो. प. बा. जैन
29. देवनागरी लिपि की भूमिका डॉ. बाबूराम सक्सेना
30. देवनागरी लिपि (कश्मीरी भाषा के संदर्भ में) डॉ. मोहनलाल सर
31. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी लिपि पं. रामेश्वरदयाल दुबे
विदेशों में हिन्दी
32. विश्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ डॉ. कामता कमलेश
33. विदेशों में हिन्दी:प्रचार-प्रसार और स्थिति के कुछ पहलू प्रो. प्रेमस्वरूप गुप्त
34. हिन्दी का एक अपनाया-सा क्षेत्र: संयुक्त राज्य डॉ. आर. एस. मेग्रेगर
35. हिन्दी भाषा की भूमिका : विश्व के संदर्भ में श्री राजेन्द्र अवस्थी
36. मारिशस का हिन्दी साहित्य डॉ. लता
37. हिन्दी की भावी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा
38. अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद
39. नेपाल में हिन्दी और हिन्दी साहित्य श्री सूर्यनाथ गोप
विविधा
40. तुलनात्मक भारतीय साहित्य एवं पद्धति विज्ञान का प्रश्न डॉ. इंद्रनाथ चौधुरी
41. भारत की भाषा समस्या और हिन्दी डॉ. कुमार विमल
42. भारत की राजभाषा नीति श्री कृष्णकुमार श्रीवास्तव
43. विदेश दूरसंचार सेवा श्री के.सी. कटियार
44. कश्मीर में हिन्दी : स्थिति और संभावनाएँ प्रो. चमनलाल सप्रू
45. भारत की राजभाषा नीति और उसका कार्यान्वयन श्री देवेंद्रचरण मिश्र
46. भाषायी समस्या : एक राष्ट्रीय समाधान श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी
47. संस्कृत-हिन्दी काव्यशास्त्र में उपमा की सर्वालंकारबीजता का विचार डॉ. महेन्द्र मधुकर
48. द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन : निर्णय और क्रियान्वयन श्री राजमणि तिवारी
49. विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का स्थान डॉ. रामजीलाल जांगिड
50. भारतीय आदिवासियों की मातृभाषा तथा हिन्दी से इनका सामीप्य डॉ. लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा
51. मैं लेखक नहीं हूँ श्री विमल मित्र
52. लोकज्ञता सर्वज्ञता (लोकवार्त्ता विज्ञान के संदर्भ में) डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा
53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://amp.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=तुलनात्मक_भारतीय_साहित्य_एवं_पद्धति_विज्ञान_का_प्रश्न_-डॉ._इंद्रनाथ_चौधुरी&oldid=600743" से लिया गया