हिन्दी का विकासशील स्वरूप -डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया  

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hr { background-color: #f44f4f; margin-top:10px; margin-bottom:10px;} }} (शब्दावली के संदर्भ में)

लेखक- डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
मेरा विश्वास है कि लगभग दूसरी हर चीज के बनिस्वत भाषा किसी राष्ट्र के चरित्र की ज्यादा बड़ी कसौटी है। अगर भाषा शक्तिशाली और जोरदार होती है तो उसका इस्तेमाल करने वाले लोग भी वैसे होते हैं। अगर वह छिछली, लच्छेदार और पेंचीदा है तो उसे बोलने वाली प्रजा में भी वही लक्षण देखने को मिलेगें - अखिल भारतीय भाषा यदि कोई हो सकती है तो वह सिर्फ हिन्दी या हिन्दुस्तानी, कुछ भी कह लीजिए-ही हो सकती है। -पंडित जवाहरलाल नेहरू

भाषा के विकास से तात्पर्य

किसी भी जीवित भाषा से तात्पर्य है, उसमें अंतर्निहित रचनात्मक शक्तियों का निरंतर तथाा सुग्राहिता। अपने परिवेश के प्रति सजग रहने से प्रथम लाभ होता है कि जो शब्द वहां से मिले उसे अपने अनुकूल बनाकर लिखा जाये। अगर भाषा की प्रवृत्ति के अनुकूल न हो तो उस भाव को व्यक्त करने के लिए शब्द बना लिया जाए। बनाई हुई, गढ़ी हुई शब्दावली तब ही काम की हो सकती है जब वह जीवंत और गतिशील भाषा के साथ निरंतर संपर्क रहे और प्रयोग कसौटी पर अपने को परखती कसती रहे। 18वीं शताब्दी के अंत मे बर्लिन अकादमी द्वारा आयोजित शोध प्रतियोगिता में डी. येनिश ने जोरदार शब्दों में घोषणा की थी कि भाषा मात्र एक वस्तु नहीं मानव जाति की बौद्धिक एवं नैतिक जीवन की अभिव्यक्ति है। मनुष्य की अभिलाषाओं और सांस्कृतिक प्रगति के साथ उसमें तद्नुरूप परिवर्तन होते रहे। माधुर्य, सूक्ष्मता, शक्ति, स्पष्टता एवं ओज से संपन्न होना जीवित भाषा का अनिवार्य लक्षण है। यही लक्षण निरंतर विकासशील एवं प्रबुद्ध जनजाति का भी होता है। सफल भाषा ही पूर्ण भाषा हो सकती है और पूर्ण भाषा ही सफल भाषा बन सकती है। शब्द भंडार और व्याकणिक स्पष्टता से ही एक संभव है जो वस्तुतः भाषा की समृद्धि का द्योतक है।
         किसी भाषा को विकसित विकासशील माना जाए और किसको नहीं इसके लिए प्रो० फर्ग्युसन ने बड़ी गहराई से विचार किया है। लिखित रूप मे प्राप्त जिस भाषा में (क) आपसी पत्र व्यवहार होता हो (ख) पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित होती हों (ग) मौलिक पुस्तकों का लेखन कार्य होता हो, वह भाषा विकसित मानी जायेगी। इस कसौटी पर हिन्दी बिल्कुल खरी उतरती है। हां, उन्होंने जो आगे की अवस्थायें स्वीकार की हैं कि

  1. उसमें वैज्ञानिक साहित्य निरंतर प्रकाशित होता रहे तथा
  2. अन्य भाषाओं में हुए वैज्ञानिक कार्य का अनुवाद तथा सार संक्षेप में प्रकाशित होता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. (भाषा, पृ० 332)
  2. -‘1901 की जनगणना की रिपोर्ट

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