हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति -डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव  

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लेखक- डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव

संस्कृति ब्रह्म की भांति अवर्णनीय है। यह अत्यंत व्यापक और गंभीर अर्थ का बोधक है। नृविज्ञान में संस्कृति का अर्थ ‘समस्त सीखा हुआ व्यवहार’ होता है अर्थात वे सब बातें जो हम समाज के सदस्य होने के नाते सीखते हैं। इस अर्थ में संस्कृति शब्द परंपरा का पर्याय है। शरीर और आत्मा की भांति सभ्यता एवं संस्कृति जीवन की दो भिन्न प्रेरणाओं को व्यक्त करतीं हैं। सभ्यता जीवन का रूप है। संस्कृति उसका सौंदर्य है। सभ्यता का अर्थ है -समाया। समाज में रहने की योग्यता अर्थात सामाजिक समता, जो सामाजिक विधि निषेध पर जोर देती है। सभ्यता = सभा+कृ शब्द से बना है, जिसका मुख्यार्थ सभा में बैठने की योग्यता है। सभा में शिष्टाचार का पालन किया जाता है। सभ्यता का संबंध नागरिकता से भी है। संस्कृति शब्द अधिक व्यापक है। और विशुद्धि का द्योतक है। कृष्टि का उद्देश्य भी भूमि की प्राकृतिक अवस्था को शुद्ध करना ही है। संस्कृति बौद्धिक विकास की अवस्थाओं को सूचित करती है और सभ्यता का परिणाम शारीरिक और भौतिक विकास है। संस्कृति का अर्थ सम्यक कृति और संभूय कृति भी है। मनुष्य व्यष्टि के रूप में सम्यक कृति करता है। और संघशः संभूय कृति करता है। यों मनुष्य जीवन के दो पहलू होते हैं - एक वैयक्तिक और दूसरा सामाजिक जीवनश्। इन दोनों प्रकार के जीवनों में सम्यक कृति करनी है। जैसी प्रकृति होती है वैसी प्रवृत्ति होती है, जैसी प्रवृत्ति होती है वैसी सभ्यता बदलती रहती है। सभ्यता के अनुकूल संस्कृति परिणत होती है। संस्कृति का संबंध मुख्यतः मनुष्य की बुद्धि, स्वभाव, मन प्रवृत्तियों से होता है। पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में संस्कृति और सभ्यता का अंतर यों स्पष्ट किया है ;‘समृद्ध सभ्यता में संस्कृति का विकास होता है और उससे दर्शन, साहित्य, नाटक, कला, विज्ञान और गणित विकसित होते हैं। यों संस्कृति बौद्धिक उन्नति का पर्यायवाची है और सभ्यता भौतिक विकास का समानार्थी है। सभ्यता बाह्य क्रियात्मक रूप है, संस्कृति विचारधारा का परिणाम है।’
भारत की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। यह जड़ एवं अपरिवर्तनशील है। ‘भा’ का अर्थ है प्रकाश। ‘भारत’ का अर्थ है प्रकाश में रत अर्थात दत्तचित्त होकर अनुष्ठान करने से संप्राप्त संस्कार-संपन्नता। यही भारतीय संस्कृति है। भारतीय संस्कृति को समग्रता मे हिंदू संस्कृति से समीकृत किया जा सकता है। हमारा आग्रह यही है कि हिंदू संस्कृति इस देश की सबसे प्रधान और व्यापक संस्कृति है। मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं का जो व्यापक चित्र हिंदुओं के साहित्य में उपलब्ध होता है वैसा किसी दूसरी जाति या धर्म के साहित्य में नहीं। यह एक विशाल सांस्कृतिक धारा है, जिसे अनेक उपधाराओं मे पुष्ट एवं सम्पन्न किया है। इसलिए यह आभाणक लोक मे प्रसिद्ध है कि ‘संस्कृते संस्कृति रस्ति’ इति। यह ऋषिओं और मुनियों की संस्कृति है। इसके प्रवाह मे शक़, हूण, यवन, पठान, मुग़ल, अरब सबने अपनी अपनी उपधाराओं के जल मिलाए फिर भी पुण्य भागीरथी की तरह इसकी मूल धारा अविच्छिन्न है। सभी जल एक हो गया है। इसमें पश्चिम का विराट प्रवाह भी आ मिला है और इसमें समा पाया है। यों भारतीय संस्कृति सामाजिक संस्कृति का ज्वलंत उदाहरण है।

हिन्दी

सिंध नदी को सिंधु कहते थे। उसके आसपास की भूमि को ‘सिंधु’ कहते थे। हिंदी शब्द का संबंध संस्कृत शब्द ‘सिन्धु’ से माना जाता है।[1] यह सिंधु शब्द ईरानी में जाकर हिन्दू और फिर हिन्द हो गया ओर इसका अर्थ हुआ - सिंध प्रदेश। ‘हिन्द’ शब्द धीरे धीरे भारत का पर्यायवाची शब्द बन गया। इसी में ईरानी का ‘ईक’ प्रत्यय लगने से ‘हिन्दीक’ बना है जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। हिन्दी ‘हिन्दीक’ का तद्भव रूप है जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यों यह विशेषण है जो संज्ञा के रूप में भाषा के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाषा के रूप में हिन्दी के वास्तविक अस्तित्व में आने का समय 1000 ई. माना जाता है। यों सहस्त्र वर्षो की विपुल साहित्य राशि हिन्दी में विद्यमान है। जैसे संस्कृत प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति की वाहक रही, जन्म संस्कार से मृत्यु संस्कार तक के विधि निषेधपरक संस्कारों की माध्यम रही, वैसे ही भारत-भारती हिन्दी आधुनिक भारतीय जीवन की गतिविधियों की वाहक रही है, इसमें कोई संदेह नहीं। हिन्दी साहित्य में भारतीय जनजीवन के अनेक पहलुओं का विविध एवं वयापक चित्र उपलब्ध होता है। हिन्दी साहित्य में उपलब्ध विशेषताओं का उल्लेख रोमन लिपि में लिखित ‘हिन्दू’ शब्द के हिज्जे के अक्षरों के आधार पर किया जाता है। वे विशेषतायें निम्न प्रकार हैं:-

H History इतिहास
I Individual व्यक्ति
N Nature प्रकृति
D Divinity दिव्यता
U Unity समन्वय

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. डॉ. भोलानाथ तिवारी सिंधु शब्द की व्युत्पति द्रविड़ भाषा ‘चिंदु’ ( उछलना) से मानते हैं।

बाहरी कड़ियाँ

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क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
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3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
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