राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा -शंकरराव लोंढे  

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लेखक- शंकरराव लोंढे

भारत एक विशाल देश है। हजारों मील तक फैला हुआ है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक लगभग 2000 मील का भूभाग है और पश्चिमी छोर द्वारिका से लेकर पूर्वी छोर तक लगभग 1700 मील का विस्तार है। यह स्वाभाविक है कि इतने बड़े देश में अनेक भाषाएँ तथा बोलियाँ बोली जाएँ। फिर भी यहाँ सदा से यह भावना रही है कि यह सारा विस्तृत भूभाग एक देश है और ये विभिन्न भाषाएँ इस विशाल भाग की अलग-अलग क्यारियाँ हैं।
प्राचीनकाल में इस संपूर्ण भूभाग को एकता की सुदृढ़ डोर में बाँधने की भूमिका संस्कृत ने निभाई और फिर बदलती परिस्थितियों में यह स्थान हिन्दी को मिला। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि हिन्दी द्वारा इस महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने की भावना भी सर्वप्रथम हिन्दीतर भाषी भारतीयों के मन में ही उत्पन्न हुई और उन्होंने अनुभव किया कि समूचे देश में एक भाषा, और वह भी संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी ही हो सकती है। सर्वप्रथम 1875 में अपने पत्र सुलभ समाचार में तत्कालीन बंगाल के राजनीतिज्ञ, समाज सेवी केशवचंद्र सेन ने कहा था:

एक भाषा के न होने के कारण भारत में एकता नहीं होती है, और चारा ही क्या है? तब सारे भारतवर्ष में एक ही भाषा का व्यवहार करना ही एकमात्र उपाय है। हिन्दी को यदि भारत की एकमात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाए तो सहज ही में यह एकता संपन्न हो सकती है।
‘वन्देमातरम्’ राष्ट्रगीत के रचयिता बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी भी हिन्दी के प्रबल पक्षपाती थे। आपकी मान्यता थी कि ‘हिन्दी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी।’ अरविंद घोष, श्री भूदेव मुखर्जी, जस्टिस शारदाचरण मित्र आदि ने भी हिन्दी को समर्थन किया।
महाराष्ट्र के लोकप्रिय नेता श्री लोकमान्य तिलक ने भी एक लिपि और एक भाषा प्रचार कार्य को अपना समर्थन दिया। आपके ही प्रोत्साहन से माधवराव सप्रे हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे।
गुजरात में स्वामी दयानंद सरस्वती ने सोच-विचार कर हिन्दी भाषा को ही अपने सिद्धांतों के प्रचार का माध्यम बनाया। सभी गुरूकुलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी बनी।
विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालचारी और उर्दू के शायर जोश मलीहाबादी ने भी हिन्दी का ही समर्थन किया।

चार्ल्स नेपियर ने भी इस देश में अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में स्थान न देकर हिन्दी को ही इसके उपयुक्त मानते हुए कहा– हिन्दी जितनी अधिक और अंग्रेज़ी जितनी कम काम में लाई जाएगी, उतनी ही शीघ्रता से हिन्दी का विकास होगा। हिन्दी का प्रयोग जितना विस्तार से हो सके होना चाहिए। शिक्षा का माध्यम किसी स्तर पर अंग्रेज़ी नहीं होना चाहिए।
सन् 1918 का वर्ष था। इन्दौर में महात्मा गांधी के सभापतित्व में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था। इसी अधिवेशन में सभापति के आसन से महात्मा गांधी ने सुझाव प्रस्तुत किया कि भारत के अहिन्दी भाषा प्रांतों में हिन्दी प्रचार का प्रयत्न किया जाए जिससे कि देश में विभिन्न प्रांतों के निवासियों में एकता और राष्ट्रीयता की भावना पैदा हो और उसकी जड़े भी मजबूत हो सकें। फलस्वरूप गांधीजी की प्रेरणा और प्रयास से दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार का कार्य प्रारंभ किया गया। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना हुई और उसका प्रधान कार्यालय मद्रास में रखा गया।
इस समय तक समूचे देश के लिए एकता और राष्ट्रीयता के प्रबल नियामक और सुदृढ़ संयोजक सूत्र के रूप में एक सामान्य भाषा का एक मंच से प्रचार का कोई व्यापक प्रयत्न नहीं हुआ था। अंग्रेज़ी ही पारस्परिक विचार-विनिमय का माध्यम थी। अत: देश के गण्यमान्य नेताओं का सामूहिक ध्यान इस महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर आकृष्ट हुआ। इस मान्यता को ठोस और सक्रिय रूप देने का सब से व्यापक प्रयत्न अप्रैल 1936 नागपुर में हुए अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में एक निर्णायक कदम उठाकर किया गया।
इस अधिवेशन के सभापति पद पर आसीन थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी, प्रस्तावक थे बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन और अनुमोदक थे, श्री जमनालाल बजाज। प्रस्ताव के परिणामस्वरूप 15 सदस्यों की एक प्रचार-समिति बनी। यही आज की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का पूर्व रूप था गांधीजी, टंडन जी, राजेंद्र बाबू, जवाहरलालजी, जमनालालजी बजाज, आचार्य नरेंद्र देव जी, काका कालेलकर, शंकरराव देव, माखनलाल चतुर्वेदी, वियोगी हरि आदि देश के जाने-माने चिंतक इसके जनक तथा मुख्य संस्थापक सदस्य थे। उपरोक्त प्रस्ताव के अनुसार राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना सन् 1936 में हुई और इसका मुख्य कार्यालय वर्धा में रखा गया।

उद्देश्य

  1. हिन्दी प्रचार की यह संस्था राष्ट्रीय भावनाओं को उद्बुद्ध करने एवं समस्त भारतीयों के हृदयों में एकात्मता प्रस्थापन का उद्देश्य लेकर स्थापित हुई। इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखकर ‘एक हृदय हो भारत जननी’ को उसने अपना उद्घोष वाक्य बनाया।
  2. भारत के स्वतंत्र होने के बाद जब संविधान में उसकी 351 वीं धारा के अंतर्गत हिन्दी के रूप के संबंध में जो निदेश दिया गया कि वह भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा होगी, तब समिति ने इसे सहर्ष स्वीकार किया, क्योंकि यही तो उसके हिन्दी प्रचार के कार्य में मूल भावना थी। आवश्यकता के अनुरूप संस्कृत से तथा अन्य भाषाओं से शब्दों को आत्मसात् करने में उसे कोई हिचक या आपत्ति नहीं थी और न है।
  3. सारे देश में तथा आवश्यकतानुसार विदेशों में भी हिन्दी के प्रति अनुराग उत्पन्न करना और उसके प्रचार करने का प्रयत्न करना।

क्रियान्वयन

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
1. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव
2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
हिन्दी का विकासशील स्वरूप
14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
17. मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी
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19. सांस्कृतिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास डॉ. त्रिलोचन पांडेय
20. हिन्दी का सरलीकरण आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा
21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
22. जन की विकासशील भाषा हिन्दी श्री भागवत झा आज़ाद
23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
25. हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप प्रो. विजयेन्द्र स्नातक
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26. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी श्री जीवन नायक
27. देवनागरी प्रो. देवीशंकर द्विवेदी
28. हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या प्रो. प. बा. जैन
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33. विदेशों में हिन्दी:प्रचार-प्रसार और स्थिति के कुछ पहलू प्रो. प्रेमस्वरूप गुप्त
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विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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