भारतीय आदिवासियों की मातृभाषा तथा हिन्दी से इनका सामीप्य -लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा  

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लेखक- लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा

सरल, निश्च्छल और आडंबहीन नागरिक के रूप में भारत के आदिवासी रामायण-महाभारत काल से ही अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। प्रकृति से उनका तादात्म्य संबंध रहा है जिसके परिणामस्वरूप उनकी संगीतमय नैसर्गिक बोली ऐसी प्रतीत होती है, जैसे बाँसुरी बज रही हो। देश के विभिन्न भाग में फैले आदिवासियों में सामाजिक और सांस्कृतिक एकरूपता मिलती है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि अपने देश में आदिवासियों का निरंतर शोषण हो रहा है। इसका प्रमुख कारण है उनके प्रति उपेक्षाभाव। इसके अतिरिक्त देश के सामंतवादी पृष्ठभूमि तथा जाति-पाँति के भेदभाव भी आदिवासी-शोषण के लिए बहुत अधिक उत्तरदायी है। भारतवर्ष में आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से आदिवासियों का शोषण तो हुआ ही है, वे सांस्कृतिक शोषण के शिकार रहे हैं। उनकी अपनी मातृभाषा रही है, जो शनै: शनै: लुप्त होती जा रही है। आदिवासी जब बोलते हैं, तो उनसे संगीतमयी ध्वनि निकलती है।
भारत के आदिवासियों में प्रचलित आदिवासी भाषाएँ दो भाषा-परिवार के अन्तर्गत वर्गीकृत की गई हैं- आस्ट्रो एशियाटिक (आग्नेय) भाषा परिवार तथा, द्रविड़ भाषापरिवार। आस्ट्रो एशियाटिक भाषा-परिवार की मुंडा शाखा के अन्तर्गत तीन महत्वपूर्ण भाषाएँ हैं- ‘संताली’, ‘हो’ तथा ‘मुंडारी’। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा की उत्तरी द्रविड़ शाखा के अन्तर्गत महत्वपूर्ण भाषा ‘कुरुख’ है जो भारतीय आदिवासियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है।
‘संताली’, ‘हो’ या ‘मुंडारी’ चूँकि एक ही भाषा-परिवार से व्यत्पन्न हैं, इसलिए उनकी रूपरचना में बहुत कुछ साम्य स्वाभाविक है। वैसे विरोहर, भूमिज, तुरी और असुरी आदि इस परिवार की गौण बोलियाँ हैं। सर जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार संताल, हो, मुंडा, भूमिज, विरोहर आदि आदिवासियों के पूर्वज खरवार कहे जाते हैं। आज खरवार छोटानागपुर के गृहस्थ हैं, जिनकी जीविका का साधन कृषिकार्य है। चूँकि मुंडा दक्षिण से होते हुए उत्तर भारत में आ बसे हैं, इसलिय आर्यभाषाओं से पारस्परिक संपर्क के कारण इनमें हिन्दी के बहुतेरे शब्द आ गए हैं।

संताली

मुंडा-परिवार की भाषाओं में संताली बहुत ही लोकप्रिय भाषा है। इसे संथाली भी कहा जाता है। प्राय: 500 किलोमीटर क्षेत्र में बसे मुंडा आदिवासियों में 57 प्रतिशत लोग संताली बोलते हैं। 1971 की जनगणना के अनुसार संताली भाषा-भाषियों की संस्था 36,93,558 है। भारत में संताल आदिवासी एक बड़े भूभाग में बसे हैं। सर्वेक्षण से यह ज्ञात होता है कि उत्तर में इसकी सीमा रेखा गंगा नदी है तथा दक्षिण में वैतरणी नदी। फिर भी प्रमुख रूप से ये बिहार के संताल परगना ज़िले में ही बसे हैं। छुटपुछ रूप से ये बिहार के भागलपुर, मुंगेर, सिंहभूम, बंगाल के बर्दमान, बांकुड़ा, मिदनापुर तथा आसाम के जलपाइगुड़ी में भी जा बसे हैं। संताली में हिन्दी के चार-चार परंपरित कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य तथा ओष्ठ्य वर्णों का प्रचलन है और प्रत्येक वर्ण के अंत में अनुनासिक व्यंजन मिलता है। साथ ही, हिन्दी के समान वर्णों का क्रम भी अल्पप्राण के बाद महाप्राण है अर्थात् प्रत्येक वर्ग के वर्ण न तो लगातार महाप्राण हो सकते हैं और नही अल्पप्राण ही। चूँकि संताली भाषा-भाषी आज बिहार, बंगाल और आसाम के विभिन्न क्षेत्रों में बसे हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से परस्पर सांस्कृतिक संपर्क के कारण संतालों ने कार्यभाषा के बहुतेरे शब्दों को अपना लिया है। इसीलिए हिन्दी का तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों के यथातथ्य रूप संताली में मुक्त रूप से प्रचलित है। ऐसे शब्दों की संख्या तो बहुत है, किंतु साम्य-दिग्दर्शन हेतु कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

तत्सम ईश्वर, आरसी, ऋषि, कथा, खंड, तुला, तेज, दया, गुरू, विष आदि।
तद्भव आधा, उपास, ओदा, ऊँट, कर्जा, घोड़ा, मुती, आचार, विचार, भितरी आदि।
देशज आलू, काबू, चाभी, लोटा, घानी आदि।
विदेशी आमदनी, इंजिन, इंसाफ, इनाम, एलान, कायदा, कारखाना, किस्सा, खुशामद, तारीख, मतलब आदि।

संताली भाषा में ऐसे शब्द भी प्रचलित हैं जिनका प्रचलन तो हिन्दी भाषा में नहीं है, किंतु विकल्प से उनसे ध्वनिगत समान शब्द हिन्दी भाषा वर्तमान है। वस्तुत: मूल रूप से ऐसे शब्द संताली से हिन्दी में आए हैं और स्वतंत्र रूप से मुंडा भाषा-परिवार में विकसित होने के कारण आज ध्वन्यात्मक रूप से ये हिन्दी से भिन्न प्रतीत हो रहे हैं। भाषा की परिवर्तनशीलता की तुला पर हिन्दी और संताली के रूप-भेद का दिशा-निर्देश सहज रूप से सम्भव है-

1. अल्पप्राण – महाप्राण
अल्पप्राण से महाप्राण
हिन्दी संताली
ऊँट ऊँठ
तम्बाकू तंमासुर
तरबूज तारभुज
महाप्राण से अल्पप्राण
ढिबरी डिबरी
फल पाल
हाथी हाती
दुख दुक
2. घोष - अघोष
अघोष से घोष
हिन्दी संताली
जुटाना जुड़ाव
शुक्रतारा भुरका
सस्ता साहता
मस्जिद महजिद
घोष से अघोष
अवसर अपसर
दिमाग दिमाक
जुलान जुलाप
नारियल नारकोड़
बालिग बालोक
3. आगम (स्वर)
आदि हिन्दी संताली
अपमान औपमान
अमीन आमीन
खजूर खिजूर
जटा जाटा
वारिस ओवारिस
मध्य उमर उमेर
टुअर टुआर
उलट उलाट
तुरत तुरान्त
कारण कारोम
अंत इंच इंची
ताड़ ताड़े
चाँद चांदी
3. आगम (व्यंजन)
मध्य हिन्दी संताली
कैंची कापची
केला कापरा
चुनौटी चुनायटी
छिलका चोकलाक
अन्त चूड़ी चुरली
छाता छातार
थैली थैलार
साढू साड़गे
भादो भादोर
4. लोप (स्वर)
आदि हिन्दी संताली
उधार धार
आंदोलन अंदोलन
अरहर रोहड़
अन्त टिकुली टिकुल
मिरचाई मरिच
4. लोप (व्यंजन)
आदि हिन्दी संताली
स्टेशन टिसान
श्मशान मसान
मध्य कोयल कोल
किफायत किफात
सावन सान
मध्य चाय चा
बटेर बाटा
5. विपर्यय
हिन्दी संताली
रूमाल उरमाल
कहानी काहनी
अखाड़ा आखड़ा
बयाना बायना
6. पार्श्विक ध्वनि का लुंठित ध्वनि में परिवर्तन
हिन्दी संताली
अंचल आँचार
काजल काजार
तालु तारू
तुलसी तुरसी
तलवार तारवाड़ी
7. लुंठित का पार्श्विक ध्वनि में परिवर्तन
हिन्दी संताली
कारीगर कारीगोल
पत्थर पत्थल
मन्दिर मन्दिल
8. अनुनासिक का पार्श्विक ध्वनि में परिवर्तन
नींबू लेम्बो
नालिश लालिस
नुकसान लोकसान
नोटिस लुटिस

संताली अपने क्षेत्र-विशेष में प्रचलित हिन्दी की विभाषाओं से विशेष रूप से प्रभावित रही है। इस प्रकार बिहार में इस बिहारी विभाषा का प्रभाव स्पष्ट है। रस्सा, दिवाली, बर्त्तन, कसम, हिस्सा, अच्छा आदि जैसे सैंकड़ों शब्द के विकल्प रूप में बिहारी विभाषा में जो शब्द प्रचलित हैं, उनसे संताली की समता है-

हिन्दी संताली बिहारी
रस्सा बाराही बरहा
दिवाली सोहराय सोहराइ
बर्त्तन खण्डा खण्डा
कसम किरिया किरिया
हिस्सा बाखरा बखरा
अच्छा बेस बेस

जीविका की खोज में मुंडा आदिवासी बंगाल और आसाम के विभिन्न भागों में जा बसे हैं। आसाम के जलपाईगुड़ी में बहुत बड़ी संख्या में मुंडा आदिवासी कुली के रूप में प्रतिनियोजित हैं। इसलिए संताली शब्दों पर बंगला और असमिया का प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से परिलक्षित है। इसका, प्रमाण है- ‘अ’ की वर्तुलाकार ध्वनि। चूँकि यह वर्तुलाकार उच्चारण संताली भाषा की मौलिक नहीं, अनुकरण पर आधारित है, इसलिए इस भाषा की लिपि में भी ‘अ’ की ओकार ध्वनि से निर्मित शब्द मुक्त रूप से प्रचलित हो गए हैं।यथा -

हिन्दी लिखित बंगला उच्चरित बंगला संताली
अन्तर्मन अन्तर्मन ओन्तोरमोन ओन्तोरमोन
जलपान जलपान जोलपान जोलपान
जंतर जंतर जोन्तोर जोन्तोर
जंजाल जंजाल जोंजोल जोंजोल
कष्ट कष्ट कोष्टो कोष्टो

संताली के वाक्य-विन्यास भी हिन्दी और इसकी विभाषाओं के इतने निकट हैं कि बड़े साधारण प्रयास से उन्हें समझा जा सकता है। कुछ वाक्यों से इस कथन की पुष्टि हो जाती है।

संताली हिन्दी
जान्तेरे दाल को रीदा जाँते में दाल पीसी जाती है।
बंगाली आसोकायते हाकोकी जाम कोआ बंगाली विशेष रूप से मछली खाते हैं।
ढाक वासाड़ एना, चावले खादले में पानी गरम हो गया, चावल डालो

इस प्रकार संताली में प्रचलित शब्दों, उनकी रूपरचना, वाक्य-विन्यास का भाषावैज्ञानिक विश्लेषण करने पर यह बात सर्वथा स्पष्ट हो जाती है कि संताल आदिवासी आर्यभाषा संस्कृति में इतने अधिक घुलमिल गए हैं कि दोनों भाषाओं में पार्थक्य की अपेक्षा मैलिक समता की मात्रा बहुत अधिक है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
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4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
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23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
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