राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति -डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति  

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लेखक- डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति

स्वतंत्रता प्राप्ति के पैंतीस वर्ष के बाद भी देश की राजभाषा विषयक समस्या को लेकर विचार मंथन क दिशा में अग्रसर होने की हमारी प्रवृत्ति अभी अवशिष्ट ही रह गई है, यह कोई प्रसन्नता और संतोष का विषय नहीं कहा जा सकता। कोई तकपूर्ण शैली में यह नहीं कहा कह सकता कि एक बड़े देश के लिए पैंतीस वर्ष का समय नगण्य हैं, कुछ नहीं है। परंतु यह बात भी सत्य है कि इतने समय की मानवीय शक्ति तथा राष्ट्रीय धन निरर्थक भी नहीं होना चाहिए। स्वराज्य या स्वातंत्रय का प्रयोजन जनराज्य या लोकतंत्र है तो सरकार का कामकाज भी जनभाषा में होना चाहिए, यह सर्वथा तर्कसंगत है। महात्मा गांधी जी की यह उक्ति यहाँ स्मरणीय है- ‘अगर हमारे देश का स्वराज्य अंग्रेज़ी बोलने वाले भारतीय का और उन्हीं के लिए होना वाला है, तो निःसंदेह अंग्रेज़ी ही राजभाषा होगी, लेकिन अगर हमारे देश के करोड़ों भूखों मरने वालों, करोड़ों निरक्षर बहनों और दलित जनों का है और इन सब के लिए होने वाला है तो हमारे देश में हिन्दी का एकमात्र राजभाषा हो सकती है।’ देश की राजभाषा के संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार कर हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान में अनेक उपबंध किए हैं। इन उपबंधों का सही कार्याचरण करने से हमारे वांछित उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। भारतीय संविधान के अनुसार उपर्युक्त विषयक जो अनेक उपबंध है, उनको सार रूप में इस प्रकार बताया जा सकता है।

  1. संघ की राजभाषा, राष्ट्रपति के आदेश, राजभाषा आयोग, राजभाषा अधिनियम तथा राज्यों की राजभाषाएँ।
  2. संसद में प्रयोग होने वाली भाषा
  3. कानून बनाने के लिए तथा उच्चतम और उच्च न्यायालयों आदि की भाषा।

प्रस्तुत विषय के प्रतिपादन के लिए उपर्युक्त बातों का किंचित विवरण भी अपेक्षित होता है।

संघ की राजभाषा

अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा के संबंध में जो कहा गया है, उसका सार यह है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष के लिए सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग के विषय में उस अनुच्छेद के खंड 2 में तथा उस कालावधि के पश्चात् अंग्रेजी भाषा के प्रयोग और अंकों के देवनागरी रूप के प्रयोग के विषय में उसी अनुच्छेद के खंड 3 में बताया गया है। खंड 1 में ही राजभाषा के संबंध में बताने के साथ साथ भारतीय अंकों के अंतराष्ट्रीय रूप के प्रयोग के बारे में भी बताया गया है।
उपर्युक्त अनुच्छेद 343 के खंड 2 के अधीन राष्ट्रपति का एक आदेश 1952 में जारी किया गया, जिसमें राज्यों के राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के नियुक्ति अधिपत्रों के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त देवनागरी के अंकों के प्रयोग को प्राधिकृत किया गया एवं 1955 में जारी किए गए राष्ट्रपति के एक और आदेश के अनुसार संघ के निम्नांकित राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत किया गया -

  1. जनता के साथ पत्र व्यवहार
  2. प्रशासनिक रिपोर्ट, सरकारी पत्रिकाएँ और संसद में प्रयुक्त की जाने वाली रिपोर्ट
  3. सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियम
  4. जिन राज्य सरकारों ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपना लिया है उनके साथ पत्र-व्यवहार
  5. संधियाँ और करार
  6. अन्य देशों की सरकारों और उनके दूतों और अंतराष्ट्रीय संगठनों के साथ पत्र व्यवहार
  7. राजनीयिक तथा कौंसली अधिकारियों और अंतराष्ट्रीय संगठनों में भारत के प्रतिनिधियों को जारी किए जाने वाले औरचारिक कागज पत्र।

संघ की राजभाषा हिन्दी के विकास के लिए अनुच्देद 351 में जो निर्देश दिया गया है, वह इस प्रकार है - “हिन्दी भाषा की प्रसार, वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृतिक के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अष्टम अनुसूची में (अष्टम अनुसूची में उल्लिखित भाषाएँ हैं- तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, असमिया, उड़िया, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, मलयालम, संस्कृत, और हिन्दी)” उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप में शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए जहाँ आवश्यक या वांछित हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा। हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बधरों के लिएसंचार की भाषा के संबंध में निर्णय करने के लिए तथा संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अनुच्छेद 344 में एक आयोग गठित करने तथा तदनुसार आदेश जारी करने का अधिकार ‘राजभाषा आयोग ’ है। उसके तीस सदस्यों में बीस सदस्य लोकसभा के तथा दस सदस्य राज्यसभा के सदस्यों द्वारा अनुपाती प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित हुए। उक्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राष्ट्रपति ने 1960 में एक आदेश जारी किया, जिसमें निम्नांकित महत्वपूर्ण बातें हैं

  1. वैज्ञानिक तक तकनीकी शब्दावली केनिर्माण के लिए शिक्षा मंत्रालय को एक स्थायी आयोग स्थापित करना चाहिए।
  2. शिक्षा मंत्रालय सांविधिक नियमों, विनियमों और आदेशों के अतिरिक्त सभी मैन्युअलों तथा कार्य विधि साहित्य का अनुवाद अपने हाथ में ले ले और भाषा में एक रूपपता सुनिश्चित करने की आवश्यकता की दृष्टि से यह काम केवल एक ही अभिकरण को सौंपा जाए।
  3. एक मानक विधि शब्दकोष बनाने, हिन्दी में विधि के पुनः अधिनियम और विधि शब्दावली के निर्माण के लिए विभिन्न राष्ट्रीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कानून के विशेषज्ञों का एक स्थायी आयोग स्थापित किया जाए।
  4. तृतीय श्रेणी के नीचे के कर्मचारियों, औद्योगिक संस्थाओं के कर्मचारियों और कार्य प्रभारित कर्मचारियों को छोड़कर उन सभी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी का सेवाकालीन प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया जाए जिनकी आयु दिनांक 1-1-61 को 45 वर्ष से कम हो। गृह मंत्रालय टंकणों और आशुलिपिकों को हिन्दी टंकण तथा आशुलेखन का प्रशिक्षण देने के लिए भी प्रबंध करें।

राष्ट्रपति के उपर्युक्त आदेश के तथा राजभाषा अधिनियम, 1963 जो 1967 में संशोधित हुआ और राजभाषा नियम, 1976 के अनुसार हिन्दी को संघ की राजभाषा के आसन पर पूर्णरूपेण आसीन करने का प्रयत्न किया जा रहा है यद्यपि इस प्रयत्न के सभी अंग समान रूप से प्रभावशील और फलकारी सिद्ध नहीं हुए हैं। तमिलनाडु जैसे अहिन्दी राज्य में हिन्दी विरोधी आंदोलन होने से तथा संसद में अहिन्दी भाषी सदस्यों द्वारा आग्रह होने से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए अंग्रेजी को संघ की राजभाषा के रूप में पहले जो स्वीकार किया गया था, वह 1965 के बाद भी जारी रखकर कालावधि की बात ही हटा दी गई अर्थात अनिश्चित काल के लिए संघ की राजभाषा वाला प्रश्न वैसा ही छोड़ दिया गया, इसलिए यह निश्चित नहीं है कि हिन्दी पूर्ण रूप से संघ की राजभाषा के रूप में सहराजभाषा के रूप में नहीं एकमात्र राजभाषा के रूप में कब प्रतिष्ठित होगी। संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच समझकर संविधान के लागू होने से पंद्रह वर्ष की कालावधि तक अंग्रेजी के प्रयोग को स्वीकार करना कोई शुभकर बात नहीं कही जा सकती। जिस प्रकार संविधान निर्माताओं ने प्रारंभ में कालावधि निश्चित की थी उसी प्रकार अहिन्दी भाषाभाषियों को इस संबंध में आश्वासन कालावधि निश्चित करके दिया जा सकता था। वांछित होने पर कालावधि बाद में बढ़ाई जा सकती थी, जैसा कि अन्य मामलों में किया गया है। यह सर्वथा सत्य है कि संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड 2 में राजभाषा आयोग द्वारा लोक सेवाओं के बारे में अहिन्दी भाषाभाषी क्षेत्रों के लोगों के न्यायपूर्ण दावों और हितों की सम्यक रक्षा की बात कही गई है। संपूर्ण देश के हित के विचार से, राजभाषा के निश्चय के विचार से अनिश्चित काल की संज्ञा भ्रमकारक सिद्ध होती है। इस कारण नई भाषा सीखने वालों के मन में एक प्रकार का ढीलापन और ताटस्थ्य भाव उत्पन्न हो जाता है तथा उस भाषा के लोगों के मन में भी विचित्र भावों की शबलता दृष्टिगोचर होने लगती है। आज दिन तो हम ये सब देख रहे हैं। यह मानते हुए भी कि हिन्दी के विकास के लिए अनेक योजनाएँ कार्यान्वित हो रही हैं, सरकारी कार्योलयों में उसकी बढ़ोत्तरी के प्रयन्त हो रहे हैं, तथा देश के नेता और गण्यमान व्यक्ति उसके संबंध में अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। यह भी मानना पड़ेगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व हिन्दी के प्रति जो निष्ठा थी, हिन्दी के प्रति जो प्रेम था, अहिन्दी प्रदेशों में हिन्दी सीखने के लिए जो अदम्य उत्साह था और हिन्दी का कार्यक्रम एक राष्ट्रीय कार्यक्रम समझकर उसमें प्रवृत होने की जो मनोभावना थी, वह आज नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व जैसे कुछ लोग कहते थे कि हमारे समय में देश आजाद नहीं होगा, वैसे ही आज कुछ लोग, गई हिन्दी प्रेमी सेवक यह बताते हैं कि हमारे जीवनकाल में हिन्दी राजभाषा के आसन परपूर्ण रूप से प्रतिष्ठित नहीं होगी और यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रतिष्ठित होगी भी या नहीं। यह नैराश्य काअपस्वर नहीं है, बल्कि वस्तुस्थिति का अवलोकन है। ताप्या से सब कुछ मिलता सकता है, भाषा भी एक तपस्या है, उसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ेगी, राजभाषा हिन्दी के लिए की जाने वाली हमारी तपस्या व्यर्थ नहीं होगी, यह भावना भी कई लोगों के मन में है। जहाँ तक राजभाषा का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि हम लोग संधिकाल में हैं। अस्तु, सरकार के द्वारा कार्यान्वित किए जा रहे कार्यक्रमों के संबंध में विचार करने के पहले राजभाषा अधिनियम के संबंध में तथा अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में अंगीकृत कुछ महत्वपूर्ण बातों के विषय में विचार करें।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
1. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव
2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
हिन्दी का विकासशील स्वरूप
14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
17. मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी
18. राजभाषा के रूप में हिन्दी का विकास, महत्त्व तथा प्रकाश की दिशाएँ श्री जयनारायण तिवारी
19. सांस्कृतिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास डॉ. त्रिलोचन पांडेय
20. हिन्दी का सरलीकरण आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा
21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
22. जन की विकासशील भाषा हिन्दी श्री भागवत झा आज़ाद
23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
25. हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप प्रो. विजयेन्द्र स्नातक
देवनागरी लिपि की भूमिका
26. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी श्री जीवन नायक
27. देवनागरी प्रो. देवीशंकर द्विवेदी
28. हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या प्रो. प. बा. जैन
29. देवनागरी लिपि की भूमिका डॉ. बाबूराम सक्सेना
30. देवनागरी लिपि (कश्मीरी भाषा के संदर्भ में) डॉ. मोहनलाल सर
31. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी लिपि पं. रामेश्वरदयाल दुबे
विदेशों में हिन्दी
32. विश्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ डॉ. कामता कमलेश
33. विदेशों में हिन्दी:प्रचार-प्रसार और स्थिति के कुछ पहलू प्रो. प्रेमस्वरूप गुप्त
34. हिन्दी का एक अपनाया-सा क्षेत्र: संयुक्त राज्य डॉ. आर. एस. मेग्रेगर
35. हिन्दी भाषा की भूमिका : विश्व के संदर्भ में श्री राजेन्द्र अवस्थी
36. मारिशस का हिन्दी साहित्य डॉ. लता
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विविधा
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47. संस्कृत-हिन्दी काव्यशास्त्र में उपमा की सर्वालंकारबीजता का विचार डॉ. महेन्द्र मधुकर
48. द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन : निर्णय और क्रियान्वयन श्री राजमणि तिवारी
49. विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का स्थान डॉ. रामजीलाल जांगिड
50. भारतीय आदिवासियों की मातृभाषा तथा हिन्दी से इनका सामीप्य डॉ. लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा
51. मैं लेखक नहीं हूँ श्री विमल मित्र
52. लोकज्ञता सर्वज्ञता (लोकवार्त्ता विज्ञान के संदर्भ में) डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा
53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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