नेपाल में हिन्दी और हिन्दी साहित्य -सूर्यनाथ गोप  

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लेखक- सूर्यनाथ गोप

भारत के उत्तर में लगभग 500 मील की लम्बाई में पूरब से पश्चिम तक फैला नेपाल जहाँ अपनी नैसर्गिक सुषमा और संपदा के लिए एशिया का स्विटजरलैंड कहा जा सकता है, वहीं अपने शौर्य एवं वीरता तथा सांस्कृतिक चेतना के लिए हिमालय की गोद में पला यह राष्ट्र हिमालय की ही तरह एशिया का सजग प्रहरी भी कहा जा सकता है। इस राष्ट्र ने अपनी सजगता का परिचय बारहवीं शताब्दी से ही देना शुरू कर दिया था, जब भारत पर पश्चिम से लगातार आक्रमणों का नया दौर प्रारंभ हुआ था। तब से लेकर भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना तक अनेक हिन्दू राजाओं जैसे हरिसिंह देव, भारत में अंग्रेज़ी उपनिवेश के विरुद्ध लड़ने वालों, जैसे तात्या टोपे, बेगम हजरत महल आदि प्रमुख व्यक्तियों का शरणास्थल भी यह देश रहा है।
इस देश में अनेक छोटे-बड़े राजा थे, जो आपस में लड़ते रहते थे। भावी अनिष्टों की कल्पना तथा भारत में लगातार हिन्दू राज्यों की पराजय से शिक्षा लेकर वर्तमान शाहवंशीय शासकों में प्रथम तथा दूरदर्शी नरेश पृथ्वी नारायण शाहदेव ने आज के नेपाल का एकीकरण किया था। यह एक सुखद आश्चर्य की बात है कि जिस महाराजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को एक सूत्र में बाँधा, वह नाथ संप्रदाय के उन्नायक हिन्दी के सुपरिचित कवि, उत्तर भारत में हिन्दू संस्कृति एवं धर्म के महान् रक्षक योगी गोरखनाथ के बड़े भक्त ही नहीं, वरन् स्वयं हिन्दी के अच्छे कवि भी थे। उनके भजन अभी भी रेडियों नेपाल से प्राय: सुनाई पड़ते हैं। उदाहरण के लिए उनका एक भजन यहाँ प्रस्तुत है-
बाबा गोरखनाथ सेवक सुष दाये, भजहुँ तो मन लाये।
बाबा चेला चतुर मछिन्द्रनाथ को, अधबधु रूप बनाये।।
शिव में अंश शिवासन कावे, सिद्धि माहा बनि आये।। बाबा 1 ।।
सिंधिनाद जटाकुवरि, तुम्बी बगल दबाये।।
सम्रथन बांध बधम्बर बैठे, तिनिहि लोक वरदाये।। 2 ।। बाबा ।।
मुन्द्रा कान में अति सोभिते, गेरूवा वस्त्र लगाये।
गलैमाल कद्राच्छे सेली, तन में भसम चढ़ाये।। 3 ।। बाबा ।।
अगम कथा गोरखनाथ कि महिमा पार न पाये।।
नरभूपाल साह जिउको नन्दन पृथ्वीनारायण गाये।। 4 ।।
बाबा गोरखनाथ सेवक सुख दाये, भजहूँ तो मन भाये।।
 

हिन्दी का एक विशाल क्षेत्र नेपाल

अनुसंधान एवं अध्ययन ही नहीं बल्कि अन्य भी कई दृष्टियों से नेपाल हिन्दी का एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जिससे हिन्दी जगत् अब तक लगभग अपरिचित सा रहा है। यहाँ के हिन्दी साहित्य का थोड़ा परिचय सर्वप्रथम महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने दिया, जब उन्होंने विद्यापति की कीर्तिलता एवं कुछ पदों को वहाँ से ढूँढ निकाला था। राहुल सांकृत्यायन ने भी उन व्यक्तियों की थोड़ी-बहुत चर्चा की है, जिन्होंने वहाँ हिन्दी के भंडार में योगदान दिया है। उनमें राजगुरु हेमराज शर्मा उल्लेखनीय हैं। सच कहा जाए तो नाथ संप्रदायी योगियों से लेकर जोसमनी संतों तक, मल्लकालीन राजाओं से लेकर शाहवंशीय नरेश एवं राजकुल के अनेक सम्मानित व्यक्तियों, सदियों से तिब्बत और भारत के साथ समान रूप से व्यापार करने वाली वहाँ की विशिष्ट नेवार जाति से लेकर पर्वतीय प्रदेश में रहने वाले विद्वान् ब्राह्मण वर्ग और वहाँ के शूरवीर श्रेष्ठ क्षत्रीय वर्ग तथा सेना आदि में काम करने वाली अन्य कई जातियों ने हिन्दी की साहित्य धारा और भाषायी प्रवाह को वहाँ सदा गतिशील बनाये रखा। यह ठीक है कि हिन्दी इस विकास धारा के साथ साथ उनकी अपनी मातृभाषा, ख़ासकर नेपाली और नेवासी भी विकसित होती गई है। परंतु विकास ने हिन्दी के साथ उनके संबंध को और गहरा बनाया है। इसके पीछे संस्कृति और धर्म आदि की वह समान धुरी काम कर रही है, जिससे दोनों ही देशों के साहित्यिक चक्र बराबर जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि नेपाल उस संस्कृति, धर्म और साहित्य की रक्षा में भारत का सदा से हाथ बँटाता रहा है, जिसे विदेशी आक्रमणकारी तलवार और साजिश के बल पर नष्ट करने में लगे रहे। नेपाल के संग्रहालय, सरकारी व निजी पुस्तकालयों तथा व्यक्तियों के पास सुरक्षित अनेक हस्तलिखित और प्रकाशित सामग्री इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
 

नेपाल में हिन्दी का व्यवहार किन-किन स्तरों पर

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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