हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप -विजयेन्द्र स्नातक  

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लेखक- प्रो. विजयेन्द्र स्नातक

संविधान और हिन्दी

भारतवर्ष विश्व का सबसे बड़ा जनतांतत्रक, बहुभाषा भाषी देश है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली बोलियां (डाइलेक्ट्रस) की संख्या तो शताधिक है किंतु संविधान में स्वीकृत भाषाओं की संख्या चौदह है, इनमें संघ की राजभाषा हिन्दी है और उसकी लिपि देवनागरी है। इस संघीय राजभाषा हिन्दी को अपने विकास और संवर्धन के लिए आवश्यकता होने पर मुख्यतः संस्कृत तथा गौणतः अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की पूरी छूट है। संविधान में हिन्दी के प्रचार प्रसार, संवर्धन की तो व्यवस्था है किंतु सहभाषा के रूप में नियत कालावधि तक स्वीकृत अंग्रेजी के विकास, प्रचार, प्रसार या समृद्धि का कोई संकेत नहीं है। संविधान निर्माताओं ने तात्कालिक कार्य संचालन के लिए अंग्रेजी को सहभाषा का दर्जा देते हुए भी उसके संवर्धन के लिए किसी प्रकार की सुविधा प्रदान करने का प्रावधान संविधान में नहीं किया। प्रत्युत आशा यह की गई थी कि सन् 1965 तक हिन्दी सम्पूर्ण राष्ट्र में राजभाषा का उपयुक्त स्थान ग्रहण कर लेगी और अंग्रेजी के सहयोग की उसे आवश्यकता नहीं रहेगी।
मेरी मान्यता है कि संविधान निर्माताओं की दृष्टि हिन्दी (राजभाषा), अंग्रेजी और प्रादेशिक मातृभाषाओं के संबंध में अत्यंत स्वच्छ और स्पष्ट थी। वे अंग्रेजी को विदेशी भाषा ही मानते थे और यह भी जानते थे कि दो प्रतिशत जनता की यह भाषा इस विशाल राष्ट्र की लोकप्रिय भाषा नहीं बन सकती। लेकिन विगत 32 वर्षों का इतिहास बताता है कि संविधान का पालन जिस पद्धति से हुआ वह अंग्रेजी और अंग्रेज़ियत को हमारे देश से दूर करने में सफल नहीं हो सका। राष्ट्रभाषा ओर राष्ट्रीय भाषा को हम वो स्थान नहीं दे सके जो स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद उसे मिलना चाहिए था। अंग्रेजी के प्रचार के साथ अंग्रेज़ियत का भी प्रचार हमारे देश में हुआ। अंग्रेज़ियत एक संस्कृति है, एक संस्कार है जो भारतीय जनता को बड़े आकर्षण के साथ आधुनिकता और विज्ञान के नाम पर सिखाया जा रहा है। अंग्रेज, अंग्रेजी और अंग्रेज़ियत इन तीनों में सबसे अधिक घातक भारतीय जनता के लिये अंग्रेज़ित ही है, जो हमारे जातीय संस्कार और राष्ट्रीय गौरव को ठेस पहुंचा कर हमें अस्मिता शून्य बनाने में सक्रिय है। महात्मा गांधी इसीलिए अंग्रेज़ियत और अंग्रेजी को भारत से बहिष्कृत करना चाहते थे। वे जानते थे कि अंग्रेजों के भारत से विदा लेने के बाद अंग्रेजी और अंग्रेज़ियत यहां बनी रही तो हमारे देश में स्वभाषा, स्वसंस्कृति ओर स्वदेशाभिमान कभी उत्पन्न नहीं हो सकेगा।

राष्ट्रभाषा और हिन्दी

स्वतंत्र राष्ट्र में राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय वेश तो प्रतीकात्मक रूप से राष्ट्र की पहचान है, वास्तव में राष्ट्रभाषा ही राष्ट्र की धमनियों में संचारित होने वाली राष्ट्रीयता की जीवंत धारा, रुधिर धारा है। राष्ट्रभाषा के बिना जन जन का न तो पारस्परिक संपर्क सम्भव है और न देशवासिओं में एकता की भावना ही पनप सकती है। राष्ट्र कर भावात्मक एकता की बात करने वाले उपदेष्टा राजनीतिज्ञों को स्मरण रखना चाहिए कि विदेशी भाषा के माध्यम से स्वेदेशी भावना का प्रचार आकाश कुसुम सूंघने का प्रयास करना है। इस तथ्य से परिचित होने के कारण ही सन् 1925 में कानपुर के कांग्रेस अधिवेशन में अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी भाषा के प्रयोग का प्रस्ताव पारित किया था। उस समय सभी प्रदेशों के सदस्यों और भारत के विभिन्न भाषा भाषिओं का वहां जमावड़ा था और सर्वसम्मति से हिन्दी को राष्ट्रभाषा पद का गौरव देकर कांग्रेस कमेटी ने अखिल भारतीय व्यवहार की भाषा ठहराया था। यह कार्य जिस प्रेम, सद्भाव विश्वास और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर किया गया वह आज भी हमें प्रेरणा प्रदान करता है। यह राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीय अस्मिता की सही पहचान थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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