मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी -डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी  

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लेखक- डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी

          किसी भी राष्ट्र अथवा देश में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता रहती है जो विभिन्न व्यवहार क्षेत्रों में संप्रेषण साधन की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि वह भाषा क्षेत्रीय तथा सामाजिक विविधिताओं से ऊपर उठकर सर्वग्राह्य और सर्वमान्य हो। वैसे तो किसी भी समाज की संप्रेषण व्यवस्था सर्वमान्य और सर्वग्राह्य भाषा को अपनी सामाजिक प्रक्रिया के भीतर ढूंढ लेती है किंतु उसके सम्यक विकास और प्रसार के लिये उसके नियोजन की भी आवश्यकता पड़ती है-भाषा नियोजन का यह कार्य दो दिशाओं में प्रवृत्त होता है-एक, मानकीकरण और दूसरा, आधुनिकीकरण। इन दानों के लक्ष्य और साध्य तो एक होते है किंतु इनके उपकरण व साधन अलग अलग होते हैं मानकीकरण रूपात्मक एकीकरण की प्रक्रिया है जिसमें व्याकरणिक रूपों को अनेकता में एकता के आधार पर मानक बनाया जाता है और आधुनिकीकरण प्रकार्यात्मक विविधता की प्रक्रिया है जिसमें भाषिक रूपों को विभिन्न संदर्भों में लाने का प्रयास रहता है। इससे भाषा को आदर्श रूप प्राप्त होता है और वह संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होत है। भाषा के इसी आदर्श रूप को मानक भाषा कहा जाता है।
          मानक भाषा पर विचार करने से पहले मानक भाषा और मानकीकृत भाषा के अंतर विचार करना समीचीन होगा, क्योंकि आजकल विद्वान् इनमें भेद करते पाए जाते हैं। वास्तव मेें मानक भाषा अपने प्रयोक्ताओं की उस प्रतीकात्मक भावना को व्यक्त करती है, जिसका संबंध एकीकरण, विशिष्टीकरण और प्रतिष्ठा के साथ होता है। यह भाषा अपने भाषा समुदाय को एकीकृत करती है, उसके प्रयोक्ताओं को अभिव्यक्ति प्रदान करती है और उन्हें पद प्रतिष्ठा से युक्त करती है। हिन्दी और ब्रज का उदाहरण लें तो हमें हिन्दी में उपर्युक्त तीनों बाते मिल जाएंगी। जहां तक मानकीकृत भाषा का संबंध है, वह भाषा रूपों के विकल्पों के भीतर से किसी एक के चयन तथा उसको मानक रूप में प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया है। इसमें भाषा का एक प्रकार से नियमन (कोडीकरण) होता है। और इसके व्याकरणिक रूप परिष्कृत एवं परिनिष्ठित होते हैं। चूंकि भाषा में प्रयोग के कई विकल्प होते हैं जिसमे से मानकीकृत भाषा किन्हीं एक दो मानक रूप में स्वीकार कर लेती है और शेष रूपों को अमानक या मानकच्युत मानकर पीछे छोड़ देती है, इसीलिए यह भाषा रूप अपने प्रयोग क्षेत्र में (विशेषकर शिक्षा के संदर्भ में) शुद्ध माना जाता है और शेष रूप प्रायः अशुद्ध घोषित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसका मापदंड मानकीकरण के अनुपात और लेखन में उसके उपयोग के आधार पर किया जाता हैै इसलिए मानकीकृत भाषा मानक भाषा का एक रूप हीे है जिसमें संरचनात्मक एकरूपता के साथ साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी मिलती है। वास्तव में भाषा की मानकता मुख्य रूप से सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी है न कि संरचनात्क एकरूपता से, क्योंकि इस मानक प्रयोग का आधार शिक्षित व्यक्तियों का शिष्ट भाषा प्रयोग होता है।

मानक भाषा का स्वरूप और प्रकृति

          मानक भाषा संरचनात्म दृष्टि से अपनी भाषा के विभिन्न रूपों में से किसी एक रूप या एक बोली पर आधारित होती है। इसके मानक बनते ही इसकी बोलीगत विशेषताएं लुप्त होने लगती हैं और वह क्षेत्रीय से अक्षेत्रीय हो जाती है। इसका कोई निर्धारित सीमा क्षेत्र नहीं होता और न ही वह किसी भाषाभाषी समुदाय की मातृभाषा कहलाती है। हमारे सामने हिन्दी का मानक रूप है। यह मानक रूप हिन्दी की खड़ी बोली से विकसित हुआ है। इस रूप में खड़ी बोली की बोलीगत विशेषताए लुप्त हो गई हैं और यह रूप खड़ी बोली से उतना ही अलग जान पड़ता है जितना वह भोजपुरी, अवधी, ब्रज आदि अन्य बोलियों से। इसके अतिरिक्त खड़ी बोली, भोजपुरी ब्रज, अवधी आदि के अपने भाषाभाषी समुदाय हैं और इनका अपना सीमा क्षेत्र है और इनके बोलने वाले इन्हें अपनी मातृ भाषा के रूप में स्वीकार करते हैं किंतु हिन्दी के मानक रूप के संबंध में इस प्रकार की संकल्पनाएं कुछ अलग सी हैं। हिन्दी क्षेत्र में विभिन्न बोलियों के बोलने वाले उसे उसी प्रकार की मातृभाषात् अवश्य मानते हैं अर्थात वे उसे ‘सहमातृभाषा या प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार करते है।
          संरचना की दृष्टि से मानक भाषा में आंतरिक संशक्ति होती है और वह प्रयोग की दृष्टि से काफ़ी व्यापक होती है। इन दोनों अभिलक्षणाों से मानक भाषा का स्वरूप स्पष्ट होने लगता है। वास्तव में मानक भाषा का प्रयोग क्षेत्र जितना विस्तृत होता जाएगा उसकी संरचना में अधिकतम समरूपता बनी रहेगी। इसीलिए व्यापक क्षेत्र में प्रयुक्त होने के कारण इसकी आंतरिक संशक्ति की अपेक्षा रहती है। शब्दोच्चारण, शब्दरूपों और वाक्य विन्यास को स्थिरता देने का प्रयास रहता है। इसमें एक शब्द का एक ही उच्चारण और एक ही वर्तनी की अपेक्षा रहती है। इसका एक ही व्याकरणिक ढांचा होता है। इस आंतरिक संशक्ति या भाषिक एकरूपता से संप्रेषणीयता में व्याघात उत्पन्न नहीं होता और इसीलिए वह सामाजिक प्रतिष्ठा को प्राप्त करती है। किंतु यह एकरूपता तभी संभव होती है जब भाषा के रूप में स्थिरिता पाई जाए और उसमें भाषायी परिवर्तन कम से कम हों। यदि व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो जीवंत भाषा का अपरिवर्तनशील रहना संभव नहीं है। वास्तव में संरचनात्मक एकरूपता और प्रयोगात्मक बहुरूपता एक दूसरे की विपरीत स्थितियां हैं और वे दोनों एक दूसरे के लिए बाधा उत्पन्न करतीं हैं। संरचनात्मक एकरूपता या स्थिरता भाषा के व्यवहार क्षेत्र को सीमित करने का प्रयास करती है और विस्तृत व्यवहार क्षेत्र संरचना की एकरूपता को खंडित करने में अग्रसर रहता है हमारे सामने उदाहरण है संस्कृत का। संस्कृत की संरचनात्मक एकरूपता को लाने से उसकी जीवंतता समाप्त हो गई और उसका व्यवहार क्षेत्र सीमित हो गया। इधर हिन्दी का व्यवहार क्षेत्र व्यापक हो जाने से इसके कई रूप उभरने लगे हैं। कहीं बंबईया हिन्दी के दर्शन होते हैं, तो कही कलकतिया हिन्दी के। कहीं पंजाबी से प्रभावित हिन्दी दिखाई देती है तो कहीं भोजपुरी से। इसी दृष्टि में ये दोनों स्थितियां भाषा को मानक रूप देने में बाधा उत्पन्न करती हैं अतः मानकीकरण की प्रक्रिया में संरचनात्मक एकरूपता और प्रयोगात्मक बहुरूपता में संतुलन बानए रखना महत्वपूर्ण है। यह तभी संभव है यदि मानक भाषा सतत लचीलेपन और तार्किकता के गुण से युक्त है[1]। इससे वह सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों के अनुरूप ढलती चलती है। इस लचीलेपन का आधार बोलचाल की भाषा है बोलचाल की भाषा पर आधारित मानक भाषा क्षेत्रीय बोली से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाती। इसके अतिरिक्त वह औद्योगिक, बहुधर्मी, बहुभाषिक समाज के भीतर विषय एवं शैली की दृष्टि से आदान प्रदान करती है जिससे उसकी स्थिरता का टिक पाना संभव नहीं है। इसलिए इसकी इसकी स्थापना में लचीलेपन की अपेक्षा रहती है ताकि वह ‘परस्पर अनुवादकता’ की स्थिति मे आ जाए[2]
          उपर्युक्त चर्चा से हम देखते हैं कि भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया में चार बातें मुख्य रूप से रहती हैं -
(1) चयन
(2) संसक्ति
(3) प्रयोग और
(4) स्वीकृति।
विभिन्न भाषारूपों और बोलियों में किसी एक का चयन किया जाता है। इस चयन के कई कारण होते हैं - शासन का बल, धर्म का आश्रय, साहित्य की श्रेष्ठता आदि। इस चयन में किसी बात का आग्रह या आधार नहीं होता कि किस किस भाषारूप का चयन किया जाए। फिनलैंड में मानक भाषा का आधार वहां की बोलचाल की बाली को अपनाया गया तो इज़रायल में क्लासिकल भाषा हिब्रू को। हिन्दी क्षेत्र में मध्यकाल में ब्रज अवधी धर्म और साहित्य की भाषा थी किंतु आधुनिक काल में खड़ी बोली का चयन किया गया। इसी खड़ी बोली में साहित्य रचना होने से उसके रूप स्थिर होने लगे और वह मानक भाषा के रूप में प्रस्फुुटित होकर अपने क्षेत्र से आगे बढ़कर अक्षेत्रीय होने लगी। बाद में इसे शासन का बल मिला और आज की मानक भाषा जनसाधरण की भाषा बन गई इस चयन में अन्य बोलियों को अपना बलिदान करना पड़ता है और वे बेचारी अपने क्षेत्र तक सीमित रह जाती हैं। किंतु मानक भाषा को उनका सहयोग लेकर चलना पड़ता है ताकि उसका शब्द भंडार समृद्ध हो जाए और वह अक्षेत्रीय होकर राष्ट्रभाषा के पद तक पहुंच पाने की स्थिति में आ जाए।
          संरचनात्मक संसक्ति में लेखन का महत्वपूर्ण कार्य होता है। यह न केवल भाषा में स्थायित्व लाता है वरन् व्याकरणिक रूपों में एकरूपता बनाए रखनें में सहायता भी करता है। विभिन्न प्रदेशों एवं क्षेत्रों में बोलियों के प्रभाव से भाषा का उच्चरित रूप समान नहीं हो पाता, अतः लिखित रूप उस विविधिता को मिटाने का प्रयास करता है। इसके अतिरिक्त लिखित रूप व्याकरण से अनुशासित होने के कारण भाषा की संरचना में एकरूपता बनाए रखता है। इंग्लैंड, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, भारत आदि देशों में अंग्रेजी के उच्चरण और व्याकरणिक रूपों में भिन्नता मिल सकती है किंतु उसके लिखित रूप में एकरूपता काफ़ी हद तक दिखाई देती है।
          जब भाषा का मानक रूप विकास की स्थिति में आ जाता है तो उसके प्रयोग का व्यवहार क्षेत्र में विस्तार होने लगता है। वह विज्ञान, साहित्य, शिक्षा, शासन आदि विभिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होने लगता है। वह लोक साहित्य के ऊपर उठकर वैज्ञानिक एवं तकनीकि साहित्य का भी उसमें सृजन होने लगता है और यहां तक कि मौलिक साहित्य का भी उसमें सृजन होने लगता है। अन्य भाषाओं के साहित्य का अनुवाद होना भी शुरू हो जाता है। हिन्दी का मानक रूप इस समय इसी स्थिति में आ गया है।
          मानक भाषा के विभिन्न प्रयोजनों एवं व्यवहार क्षेत्रों में प्रयुक्त होने से समाज उस रूप को स्वीकार कर लेता है। इस भाषा की विभिन्न बोलियां बोलने वाले अन्य भाषाभाषियों के साथ इसी रूप का प्रयोग करते हैं और आपस में इस रूप का प्रयोग करते हुए प्रतिष्ठा का अनुभव करते हैं। साहित्य, कार्यालय, विधि, विज्ञान, चिकित्सा, पत्रकारिता, वाणिज्य आदि विभिन्न प्रयोजनों में समाज उसका प्रयोग करने लगता हैै इससे उसकी अभिव्यंजना शक्ति में भी वृद्धि होती है। इसके स्वीकार हो जाने से इसे शिक्षा के माध्यम रूप में अपना लिया जाता है।
          मानक भाषा में मानकीकरण की प्रक्रिया केवल कार्य नहीं करती वरन् उसमें ऐतिहासिकता, जीवंतता और स्वायत्ता के लक्षण भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐतिहासिकता से अभिप्राय है कि यह भाषा सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से अर्जित संस्कार के रूप में आती है। इसके निर्माण और विकास में कोई व्यक्ति विशेष नहीं होता वरन् पीढ़ी दर पीढ़ी यह सहज और स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होती आती है। इसमें इसकी अपनी लिखित परंपरा, अपनाजातीय इतिहास और अर्जित संस्कर होता है। भाषा तभी जीवंत होती है जब उसके प्रयोग करने वाले हों और अपनी भाषा के रूप में ग्रहण करते हों। जिस भाषा का अपना समाज नहीं होता और समाज उसे अपनी भाषा स्वीकार नहीं करता तो वह भाषा जीवित नहीं रह पाती। उसका समाज ही उसे जीवित रख सकता है और उसके जीवित रहने में उसका विकास सहज रूप से होता है। इसलिए मानक भाषा में जीवंतता का होना आवश्यक है। यदि भाषा में मानकता, ऐतिहासिकता और जीवंतता होती है तो वह अपने आप विशिष्ट और स्वतंत्र हो जाती है। वह किसी अन्य भाषा व्यवस्था पर आधारित नहीं रहती वरन् अपनी स्वायत्त सत्ता बनाये रखती है। हम देखते हैं कि यदि हिन्दी का मानक रूप मूलतः खड़ी बोली पर आधारित है किंतु वह अपनी भाषिक व्यवस्था और प्रकार्य के संदर्भ में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए हुए हैं। वास्तव में बोली में ऐतिहासिकता और जीवंतता तो होती है किंतु मानकता और स्वायत्ता नहीं होती और क्लासिकल भाषा में मानकता, ऐतिहासिकता और स्वायत्ता होती है किंतु जीवंतता नहीं होती है। बोलचाल की भाषा में ऐतिहासिकता, जीवंतता और स्वायत्ता होती है और जब उसका मानकीकरण हो जाता है तो वह मानक भाषा के पद पर अभिषिक्त हो जाती है।

मानक हिन्दी

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. (गार्विन: 1959)
  2. (फर्ग्युसन: 1968)
  • गार्विन, पी. एल. 1959, ‘दि स्टेंडर्ड लेंग्वेज प्राब्लम्ज’

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