मारिशस का हिन्दी साहित्य -डॉ. लता  

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लेखक- डॉ. लता

मारिशस विश्व के रंगमंच पर सुपरिचित और महत्त्वपूर्ण राष्ट्र है। इस देश की संस्कृति संश्लिष्ट है। यहाँ अधिकांश निवासी भारतीय मूल के हैं। हिन्दी में इनका कृतित्व उल्लेखनीय हैं। इन लेखकों की लगभग दो सौ कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें साहित्य, इतिहास, संस्कृति और धर्म विषयक सभी प्रकार की रचनाएँ हैं। इन कृतियों में मारिशस के जीवन मूल्यों का भी पता चलता है। इन्हीं प्रवासी भारतीयों के द्वारा हिन्दी साहित्य का सर्वाधिक सृजन हुआ है। यह साहित्य हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के प्रति सजग है। यह अपने परिवेश के प्रति भी प्रतिबद्ध है। भारतीय पाठकों के प्रति भी प्रतिबद्धता इस साहित्य की विशेषता है। अत: इस साहित्य की अपनी अलग अस्मिता है।
डॉक्टर रामेश्वर ओरी ने अपने भाषा वैज्ञानिक सर्वेक्षण में यहाँ बोली जाने वाली ग्यारह भाषाओं का उल्लेख किया है। इस देश में भारत, चीन, इंग्लैंड, फ्रांस, सेशल, रेयुनियन, मोजाबिक, पूर्व अफ्रीका और पश्चिम अफ्रीका इन नौ देशों की संस्कृतियों का संश्लिष्ट रूप मिलता है। केवल 61 किलोमीटर लंबे और 47 किलोमीटर चौड़े मारिशस में इतनी विविधता को समेटना मानवीय सौहार्द्र की अभूतपूर्व उपलब्धि है।
साहित्य सर्जन या तो शासकों की भाषा में हुआ है या सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सजग प्रवासियों की भाषा में। हिन्दी का साहित्य दूसरे वर्ग में है। क्रियोली और भोजपुरी यहाँ की संपर्क भाषाएँ रही हैं। वर्तमान भाषा स्थिति यह है कि क्रियोली भोजपुरी की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। भोजपुरी का स्थान हिन्दी खड़ीबोली ने ले लिया है। फिर भी भोजपुरी पुरानी पीढ़ी की भाषा के रूप में जीवित है। यही कारण है कि वहाँ की हिन्दी का अधिकतर रचनात्मक साहित्य खड़ीबोली में है। काव्य, उपन्यास, कहानी और नाटक अधिक लिखे गए हैं। इस साहित्य का विकास पिछले 50 वर्षों में हुआ है। इसमें भी 1960 तक विकास की गति बहुत मंद रही है। कारण यह था कि हिन्दी मारिशस में शोषित मज़दूरों की भाषा रही।

के. हज़ारी सिंह ने अपने ग्रंथ 'मारिशस में भारतीयों का इतिहास' में जिस दर्दनाक इतिहास पर से परदा उठाया है वह विस्मयकारी है। इतने उग्र दमन और और प्रतिरोध के बावजूद भारतीय संस्कृति मरी क्यों नहीं? भारत में आर्य समाज ने देश में पुनर्जागरण में जो योगदान दिया था, उसकी चिनगारी मारिशस में भी प्रज्ज्वलित रखा और इसकी रोशनी में हिन्दी साहित्य लिखा गया। प्रारंभिक साहित्यकारों में प्रो. वासुदेव विष्णुदयाल, जयनारायण राय तथा ब्रजेंद्र जगत मधुकर रहे। वस्तुत: यह त्रयी ही मारिशस में हिन्दी साहित्य की प्रारंभिक कर्णधार है। अन्य हिन्दी सेवकों की भूमिका भाषा प्रचारक की रही। पाठक तैयार करने और हिन्दी प्रसार के लिए ये भी स्मरणीय हैं। स्वाधीनता के पूर्व ही कुछ और साहित्यकारों का उदय हो गया था। स्वाधीनता के पश्चात् तो रचनाकारों की बाढ़ सी आ गई। विविध विधाओं में लेखन होने लगा। इधर महात्मा गांधी संस्थान की 'वंसत' पत्रिका ने नई पत्रिकाओं को प्रोत्साहन दिया, पुरानी पत्रिकाओं में 'अनुराग' की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
 

मारिशस की हिन्दी कविता

मारिशस बाहरी देशों के निवासियों के द्वारा बसाया गया देश है। यही कारण है कि प्रत्येक प्रवासी अपने देश के संस्कारों से जुड़कर लिखता रहा है। बड़ी-बड़ी शास्त्रीय परिभाषाओं और वादों के मानदंडों पर यहाँ के हिन्दी काव्य को जाँचना अन्याय होगा। यहाँ लोगों ने हिन्दी में काव्य सृजन के उद्देश्य से कविताएँ लिखी हैं। अभी तक एक भी महाकाव्य या खंडकाव्य यहाँ के कवियों ने नहीं लिखा है। यहाँ के कवियों की बंधी कलम से अब तक यह सम्भव भी नहीं था पर भविष्य का क्षितिज आशा की अरुणिमा लिए हुए है।
ठाकुर प्रसाद मिश्र की एक कथा कविता 1962 में छपी है। इसका रचना काल द्वितीय विश्व युद्ध का रहा है। 'दीपावली' शीर्षक यह रचना देवी भगवती की वंदना के रूप में है। ब्रजेंद्र भगत मधुकर ने पहली बार सामान्य मानव को कथा काव्य का नाटक बनाकर 'एक कहानी कुली की' लिखी। सर शिवसागर रामगुलाम पर भी लंबी कविताएँ लिखी गई हैं। फ्रेंच से अनूदित एक लंबी कविता 'सीता' भी मिलती है। कुछ लंबे जीवनीपरक भोजपुरी गीत भी हैं।
यदि प्रकाशन तिथि को मापदंड मानें तो मुनीश्वरलाल चिंतामणि ने अपनी पुस्तक 'मारिशस का हिन्दी साहित्य तथा अन्य निबंध' में लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी की 'रस पुंज कुंडलियाँ' (1923) को पहला काव्य संग्रह माना है। परन्तु मुझे लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी को मारिशसीय हिन्दी का कवि मानना ठीक नहीं लगता। वे कुछ दिनों के लिए ही भारत से मारिशस गए थे। वास्तव में मारिशस की भूमि पर जन्मा पहला कवि मुसलमान था। इसका नाम अज्ञात है। इसने 1890 के तूफान पर हिन्दी कविता लिखी थी। वहाँ की जनता में आज भी उसका नाम 'साइक्लोन मियाँ' के रूप में है। मुनीश्वरलाल चिंतामणि के निबंध में इसका उल्लेख है।
प्रकाशित कविताओं का पहला संग्रह 'मधुपर्क' है। मधुकर जी की यह रचना अब अप्राप्य है। इसका काल चिंतामणि ने 1942 तथा सोमदत्त बखौरी ने 1948 बताया है। इस कवि के कोई बीस कविता संग्रह हैं। ये यहाँ की हिन्दी के प्राचीनतम कवि हैं। रणभेरी, स्वराज्य, गीतांजलि, मधुमास, रसवन्ती, हिन्दी गौरववान आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। मारिशसीय हिन्दी का राष्ट्र कवि, स्वाधीनता आंदोलन का यह अग्रणी कवि नेता अपने ओजस्वी गीतों के कारण अमर है। इन्होंने भोजपुरी में भी राष्ट्रीय गीत लिखे हैं। इनकी सभी रचनाएँ छंदोबद्ध है।
मुक्त छंद की कविता का आरंभ 1961 में मुनीश्वरलाल चिंतामणि की कविता 'शांतिनिकेतन की ओर' से माना जा सकता है। सोमदत्त बखौरी के दो संग्रह प्रकाशित हुए- 'मुझे कुछ कहना है' (1967) और 'बीच में बहती धारा' (1971)। ये मुक्त छंद के प्रौढ़तम कवि हैं। अब तो अभिमन्यु अनत भी इस विधा के सशक्त रचनाकार हैं। हरिनारायण सीता, गिरिजानन रंगू, रविशंकर कौले सर, पूजानंद नेमा, सूर्यदेव सिवरत आदि भी नए खेवे के कवि हैं।
पहला काव्य संकलन 1966 में प्रकाशित हुआ जिसमें कवियों की कविताएं संकलित हैं। 1970 में 'आकाशगंगा', 1971 में प्रावासी स्वर, 1975-86 में 'तरंगिणी' और 'मारिशस की हिन्दी कविता' नामक सामूहिक संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कुछ बालगीतों के भी संग्रह निकले हैं। वसंत पत्रिका में भी बहुत से नए हस्ताक्षर आ रहे हैं। कौन कितना टिकेगा, कहना मुश्किल है। गजल लिखने वालों में मुकेश जी बोध अपना स्थान बना चुके हैं।
मारिशस के कवि विषय और शिल्प दोनों के प्रति सतर्क हैं। जहाँ संतुलन है वहाँ रचना उत्कृष्ट है। इनकी रचनाओं में आशा, आस्था और विश्वास के स्वर प्रमुख हैं। मारिशस के कवि भारतीय संस्कारों के प्रति विशेष निष्ठावान हैं। बदलते मूल्यों से तालमेल बिठाना कठिन है। ठाकुरदत्त पांडेय इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। शोषण के बदलते संदर्भ और हथियार के बारे में अनत का कहना है।

धूप की जलती सलाखों को

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
1. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव
2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
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15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
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20. हिन्दी का सरलीकरण आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा
21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
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23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
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26. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी श्री जीवन नायक
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28. हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या प्रो. प. बा. जैन
29. देवनागरी लिपि की भूमिका डॉ. बाबूराम सक्सेना
30. देवनागरी लिपि (कश्मीरी भाषा के संदर्भ में) डॉ. मोहनलाल सर
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32. विश्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ डॉ. कामता कमलेश
33. विदेशों में हिन्दी:प्रचार-प्रसार और स्थिति के कुछ पहलू प्रो. प्रेमस्वरूप गुप्त
34. हिन्दी का एक अपनाया-सा क्षेत्र: संयुक्त राज्य डॉ. आर. एस. मेग्रेगर
35. हिन्दी भाषा की भूमिका : विश्व के संदर्भ में श्री राजेन्द्र अवस्थी
36. मारिशस का हिन्दी साहित्य डॉ. लता
37. हिन्दी की भावी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा
38. अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद
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53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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