हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण -रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव  

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है भारतकोश का नहीं।
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लेखक- प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव

          राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका की बात को आज समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक समान रूप से स्वीकार करने लगे हैं। यह बात इसलिए भी महत्व की है कि भाषा अगर एक ओर राष्ट्रीय एकीकरण का महत्वपूर्ण उपादान बन सकती है तो वहीं दूसरी ओर वह समाज में तनाव द्वंद, विद्वेष और विघटन की प्रवृत्ति को भी जन्म दे सकती है। अतः यह आवश्यक है कि भाषा की इस दुहरी संभावना को हम सजग भाव से समझें और एक ऐसी भाषा नीति को अपनाएं जो देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सहायक हो, हमारी बहुभाषिक यर्थाथता के अनुकूल हो और जो राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में साधक हो। इधर हाल में अंग्रेजी में प्रकाशित दो लेख सामने आए हैं जिनमें इस समस्या को उठाने का प्रयास किया गया है पर भारत की भाषायी समस्या की पकड़ ढीली होने के कारण जो निष्कर्ष उनमें निकाले गये हैं वे न केवल भ्रांतिपूर्ण हैं बल्कि घातक भी हैं।। इनमें पहला लेख सुनंदा सान्याल का ‘इज़ लेंग्वेज युनाइट पीपुल?’ (1981) है और दूसरा कुलदीप नैयर का है ‘ए गवर्नमेंट शुड नाॅट ग्लोरीफाइ ए लैंग्वेज’ (1982)। इन दानों लेखों की पृष्ठ भूमि में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में हिन्दी अंग्रेजी की भूमिका का प्रश्न रहा है। दोनों ही लेखों की ध्वनि यह रही है कि आज हम हिन्दी को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दे रहे हैं और सरकार द्वारा हिन्दी को दिया जाने वाला समर्थन देश के हित में नहीं है। अपने पक्ष में इन दोनों सिद्धांतों ने कुछ निराले तर्क दिये हैं, जिसकी छानबीन आज आवश्यक है क्योंकि ये ही तर्क प्रायः हमें अन्य व्यक्तियों द्वारा भी सुनने को मिलते रहते हैं।
          सुनंदा सान्याल का यह मत है कि हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा सामाजिक नियंत्रण के कहीं अधिक अवसर प्रदान कर सकती है। और यही कारण है कि आज कोई भी व्यक्ति आने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानें के लिए बेहिसाब खर्च करने में संकोच नहीं करता। उनके मत में अंग्रेजी भी भारत के लिए उसी प्रकार स्वभाषा है जिस प्रकार हिन्दी, अहिन्दी-भाषिओं के लिए। मिसाल के तौर किसी तेलुगु या तमिल भाषी के लिए अगर अंग्रेज़ी परायी भाषा है तो हिन्दी भी उसकी अपनी भाषा नहीं है। यह एक साफ और सीधी बात है। यह कहना केवल एक वाक्छल ही है कि भारतीय भाषा होने के नाते हिन्दी पर अधिकार प्राप्त कर लेना अंग्रेजी के मुकाबले अधिक आसान होना चाहिए। इस तर्क में कोई बल नहीं है। कुलदीप नैयर यह तो स्वीकार करते हैं कि भारत में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या अन्य भाषाभाषियों की तुलना में सबसे अधिक है और लोकतन्त्र में संख्या को महत्व देना ही चाहिए। अतः हिन्दी को अन्ततः राजभाषा बनना ही है। लेकिन उनके अनुसार तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन को सफल बनाने की योजना वस्तुतः आग से खेलने जैसा है क्योंकि इससे भाषायी द्वेष बढ़ने की संभावना है। उनके अनुसार न तो हिन्दी के प्रगामी प्रयोग की दृष्टि से सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए और न ही भाषा को नियोजित करने के लिए प्रयत्न। हमें तो उस दिन की मात्र प्रतीक्षा करनी चाहिए जब दक्षिण के अहिन्दी भाषी प्रदेश स्वतः हिन्दी की स्वीकृति की घोषणा कर दें।
          ऐसा लगता है कि कुलदीप नैयर ‘भाषा नियोजन’ की संकल्पना एवं प्रक्रिया से पूरी तरह अपरिचित हैं और सुनंदा सान्याल उनसे परिचित हैं लेकिन भारत की भाषायी यर्थाथता को जानबूझकर नकारना चाहती हैं उनकी चिंता उस भाषा की खोज और स्थापना की तरफ सिमटी है जो या तो विशाल सभा पर प्रभुत्व रख सके या जो सामाजिक नियंत्रण का साधन और शस्त्र बन सके। संप्रेष्णीयता, संचार और एकीकरण की प्रक्रिया आदि को भाषा नियोजन का लक्ष्य बनाने की अपेक्षा वे राज्यों के लिए प्रभुता संपन्न भाषा की बात उठाते हैं और अंग्रेजी को उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं।
          अंग्रेजी बनाम हिन्दी और हिन्दी बनाम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर विचार करते समय हम प्रायः यह बात भूल जाते हैं कि अंग्रेजी को मात्रभाषा के रूप में ग्रहण करने वालों की संख्या नहीं के बराबर है। 1971 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 548,195,652 है पर अंग्रेजी को मातृभाषा के रूप में घोषित करने वालों की संख्या मात्र 191,595 है। इसके अतिरिक्त हिन्दी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या 208,514005 है। हिन्दी कम से कम 6 राज्यों और 2 संघीय प्रदेशों की प्रमुख भाषा है, यथा राजस्थान (91.73 प्रतिशत), हरियाणा (89.42 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (88.54 प्रतिशत), बिहार (79.77), दिल्ली (75.97 प्रतिशत) और चंडीगढ़ (55.96 प्रतिशत)। हिन्दी भाषी प्रदेशों मुख्यमंत्री अगर अपने क्षेत्रों में भाषा और संप्रषण की समस्या, उसके मानकीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तथा अन्य भाषाओं के साथ उसके सम्बंध के बारे में विचार करने के लिए किसी समय मिलते हैं तब कुलदीप नैयर ऐसे विद्वान चिंतित क्यों हो उठते हैं ? क्या उन्हें यह भय है कि बहुसंख्यक होने के बावजूद हिन्दी, जो अब तक प्रभुता-संपन्न अंग्रेजी के नीचे दबी सिसक रही थी, अपना नया व्यक्तित्व ग्रहण कर लेगी ?
          इस तथ्य की ओर भी ध्यान देना होगा किसी भाषा का अपना अखिल भारतीय रूप क्या है? संख्या की दृष्टि से हिन्दी पंजाब (20.01 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (6.13 प्रतिशत), अंडमान निकोबार (16.07 प्रतिशत) में दूसरी प्रमुख भाषा के रूप में है और कम से कम पांच प्रदेशों में तीसरे स्थान पर है, यथा जम्मू-कश्मीर (15.07 प्रतिशत), असम (5.34 प्रतिशत), महाराष्ट्र (5.02 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (2.28 प्रतिशत) एवं त्रिपुरा (1.48 प्रतिशत)। अंग्रेजी की शक्ति भारत में द्वितीय भाषा के रूप में है, यद्यपि उसके मात्रभाषियों की संख्या नगण्य है। पर भारत के द्विभाषिक समुदाय के 25.7 प्रतिशत लोग अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। इस दृष्टि से हिन्दी पिछड़ी भाषा नहीं है क्योंकि द्वितीय भाषा के रूप में इसको अपनाने वालों की संख्या 26.8 प्रतिशत है। इस संदर्भ में हमें अंग्रेजी और हिन्दी के आधार पर जन्मी द्विभाषिकता की प्रकृति पर भी ध्यान देना चाहिए जिसकी ओर सुनंदा सान्याल पूरी तरह बेखबर हैं (भले ही वह समाजभाषा वैज्ञानिकों के मत से अपनी बात को पुष्ट करना चाहते हैं) हिन्दी, प्रमुखतः आधारभूत द्विभाषिकता, सामाजिक संप्रेषण व्यवस्था के उस स्तर से संबंध रखती है जो जन जीवन की अपनी दैनिक आवश्यकताओं का परिणाम होता है। इस टाइप की द्विभाषिकता की जननी सामाजिक आवश्यकताओं का वह स्तर है जो न किसी औपचारिक भाषा शिक्षण की अपेक्षा रखता है और न ही किसी लिखित भाषा या साहित्यिक मानदंड का। हम इस अन्तर्राज्यीय बस अड्डों, रेलवे प्लेटफार्मों, विभिन्न धार्मिक स्थलो आदि पर समान व्यवहार की भाषा के रूप में फलते फूलते देख सकते हैं। इसके विपरीत अंग्रेजी जिस संभ्रात टाइप की द्विभाषिकता को जन्म देती है, वह दो भाषाओं के मानक रूप की अपेक्षा रखती है। यह बहुत कुछ औपचारिक परिस्थितियों के बीच दूसरी भाषा के सीखने का परिणाम होती है। स्पष्ट है हिन्दी की शक्ति, भारतीय जनजीवन की अपनी आवश्यकता और सामान्य जीवन की संप्रेषण संबंधी अनिवार्यता के साथ है जब कि अंग्रेजी की शक्ति (?) बौद्धिक चिंतन और संभ्रांत व्यक्तियों के लिए ‘प्रभुता’ स्थापन में निहित है।
          यह भी ध्यान देने की बात है कि भारत एक बहुभाषीय देश है। इसीलिए राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी भाषायी समस्या जटिल रूप में हमारे सामने उभरती है। प्रायः हम इन दोनों भाषा प्रकार्यों के अंतर को पकड़ नहीं पाते इसलिए यह आवश्यक है कि हम संक्षेप में बहुभाषी देशों के संदर्भ में राजभाषा बनाम राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर विचार कर लें।
          बहुभाषी देश की संप्रेषण व्यवस्था अनिवार्यतः संपर्क भाषा अर्थात बृहत्तर परिणाम पर ‘लिंगुआ फ्रैंका’ को जन्म देती है। राष्ट्रीय संदर्भ में कभी इसका रूप राजभाषा को जन्म देता है और कभी राष्ट्रभाषा को। राजभाषा का संबंध राष्ट्रवादिता (नेशनेलिज़्म) से रहता है, वह राष्ट्र को राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से एक सूत्रता में बांधने के काम में आने वाली प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा होती है। इसके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह भाषा अपने देश की ही हो। राष्ट्रभाषा का संबंध राष्ट्रीयता (नेशनेलिज़म) से रहता है, उसके पीछे जातीय प्रमाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ की शक्ति काम करती है और उसके सहारे समाज राष्ट्र के स्तर पर समाज और संस्कृति के संदर्भ में तादातम्य स्थापित करता है और अपनी सामाजिक अस्मिता सिद्ध करता है।[1] प्रत्येक देश राष्ट्रीयता और राष्ट्रवादिता के द्वंद का समधान अपने ढंग से करता है। उदाहरण के लिए, घाना और गौंबिया ने राष्ट्रवादिता की प्रवृत्ति से प्रेरित होकर उस भाषा को देश की लिंगुआ फ्रैंका का स्तर दिया जो स्वतंत्रतापूर्वक शासकों (विदेशियों) की भाषा थी। इज़रायल, थाइलैंड, सोमालिया, इथोपिया आदि देशों ने राष्ट्रीयता से अनुप्राणित होकर अंतरक्षेत्रीय स्तर पर फैली अपनी देश की लिंगुआ फ्रैंका को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया। पर भारत, श्रीलंका, मलेशिया आदि ऐसे देशों के सामने सामस्या जटिल थी क्योंकि परंपरा अर्जित और संस्कृति-समर्थित इसमें कई समुन्नत भाषाएं राष्ट्रभाषा की दावेदार बनकर आईं। इन देशों ने अपना दूसरा ही रास्ता अपनाया।
          यह ध्यान देने की बात है कि यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार ‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी’ होगी’ पर उसी अनुच्छेद के खंड 2 के अनुसार संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए वह पहले से ही प्रयोग की जाती थी। ऐसा बताया जाता है कि अंग्रेजी के स्थान पर प्रशासनिक व्यवहार क्षेत्र में तत्काल प्रयोग में लाने के लिए हिन्दी भाषा को न तो समर्थ माना गया और न ही उतनी विकसित। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इस एकाएक परिवर्तन से अहिन्दी भाषिओं को काफ़ी असुविधा होगी जिससे प्रशासन तंत्र मे काफ़ी लंबी दरार पड़ जाएगी। इन सब बातों को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था की गई कि 1965 तक स्थिति यथावत् बनी रहे ताकि एक तरफ हिन्दी को समृद्ध कर उसे प्रशासनिक प्रयोजनों की समर्थ भाषा भी बना लिया जाए और अहिन्दी भाषिओं को इतना समय भी मिल जाए कि वे अन्य भाषा के रूप में हिन्दी में व्यावहारिक दक्षता प्राप्त कर लें।
          संविधान के अनुच्छेद 344 (2) के अनुसार राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि ‘संघ के राजकीय प्रयोजनो के लिए हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग’ और ‘संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी एक के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्वंधन (रिस्ट्रिकश्न)’ के लिए आयोग संसदीय समिति का गठन करे। इस आधार पर सन 1955 में एक राजभाषा आयोग और उसकी सिफारिश पर विचार करने के लिए सन 1957 में एक संसदीय समिति का गठन किया गया। पूरी वस्तुस्थिति और सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखते हुए सन 1965 में आयोग और संसदीय समिति ने यह सिफारिश की कि अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी यथावत् बना रहे और हिन्दी की समृद्धि और विकास में और गति लाने के लिए सरकार प्रयत्न करे। इन सिफारिशों को व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए संसद ने 1963 में एक राजभाषा अधिनियम पारित किया। इस राजभाषा अधिनियम की धारा 3 के अनुसार उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की बात कही गई जिनमें वह प्रयुक्त होती आई थी। चार वर्ष बाद सन 1967 में राजभाषा (संशोधन) अधिनियम पारित हुआ। इस संशोधित अधिनियम के अनुसार यह छूट दी गई कि सरकारी कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में काम कर सकता है। जो क्षेत्र द्विभाषिकता के लिए अनिवार्य माने गये (जिनमें हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के प्रयोग को अनिवार्य माना गया है) वे हैं -
(क) संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचना, तथा प्रेम विज्ञप्ति
(ख) संसदीय रिपोर्ट तथा सरकारी कागज पत्र और
(ग) संविदा, करारनामा, लाइसेंस, परमिट, टेंडर, नोटिस, और सरकारी फार्म।
          राजभाषा संशोधन अधिनियम ने हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषिक स्थिति की ही पुष्टि की है। इस अधिनियम ने यह भी निर्धारित किया है कि केंद्र सरकार के जितने भी कार्यालय व मंत्रालय हैं वे आपस में हिन्दी भाषा में पत्राचार कर सकते हैं लेकिन उनके अंग्रेजी का अनुवाद तब तक संलग्न कर भेजा जाए जब तक संबद्ध मंत्रालय या कार्यालय के अधिकारी हिन्दी की व्यावहारिक दक्षता प्राप्त नहीं कर लेते। संविधान के अनुच्छेद 347 के अनुसार एक राज्य तथा दूसरे राज्य तथा किसी राज्य और भारत संघ के बीच संप्रषण माध्यम के लिए वह भाषा, राजभाषा के रूप में व्यवहार में लाई जाएगी जो संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए उस समय प्राधिकृत भाषा होगी। लेकिन इसके साथ उसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि यदि दो या अधिक राज्य इस बात का करार करते हैं कि ऐसे राज्यों के बीच परस्पर संप्रेषण व्यवस्था के लिए भाषा हिन्दी होगी तो संप्रेषण में लिए हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जा सकेगा। सन 1967 के राजभाषा संशोधन अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच पत्र व्यवहार अंग्रेजी में तब चलता रहेगा जब तक अहिन्दी भाषी राज्य हिन्दी में पत्र व्यवहार करने के लिए स्वयं निर्णय नहीं ले लेते। ऐसी स्थिति में अगर एक राज्य दूसरे राज्य के साथ हिन्दी में पत्राचार करता है तो उसके साथ अंग्रेजी अनुवाद की प्रति भेजना आवश्यक है।
          राजभाषा संशोधन अधिनियम नें द्विभाषिक प्रक्रिया को बढ़ावा ही दिया। यह गौर करने की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी तथा मान्य कांग्रेसी नेता (महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि) सभी यह मानते रहे कि भारतवर्ष की राजभाषा के लिए यदि कोई भाष सर्वाधिक उपयुक्त है तो वह एकमात्र हिन्दी ही है। महात्मा गांधी ने तो दूसरे गुजरात शिक्षा सम्मेलन के सभापति पद से बोलते हुए 1917 में यह कहा था कि राष्ट्रीय भाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो, जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र मे माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो जिसको बोलने वाले बहुसंख्यक हों और जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो अंग्रेजी किसी भी तरह इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। उनके अनुसार हिन्दी ही एकमात्र वह भाषा थी जो उनके द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करती थी जहां तक हिन्दी भाषा की व्यापकता और व्यवहार शक्ति की क्षमता का सवाल है गांधी जी के 1917 के भारत की स्थिति यह थी ‘हिन्दी बोलने वाला जहां भी जाता है हिन्दी का प्रयोग करता है और कोई व्यक्ति इस पर आश्चर्य व्यक्त नहीं करता। हिन्दी बोलने वाले हिन्दू धर्मोपदेश और उर्दू बोलने वाले मौलवी संपूर्ण भारतवर्ष में धर्म और आचरण संबंधी अपने भाषण हिन्दी या उर्दू में देते पाये जाते हैं। औरों की बात तो दूर यहां तक कि अशिक्षित बहुसमाज भी उन्हें समझ लेता है। यह भी स्थिति है कि जब एक अशिक्षित गुजराती उत्तर भारत में आता है तो वह टूठी फूटी हिन्दी बोलने की कोशिश करता पाया जाता है पर जब उत्तर भारत का कोई भइया बंबई में दरबान का काम करता है, वह बंबई के सेठों से गुजराती में बात करने से इंकार कर देता है और ये उनके मालिक गुजराती सेठ हैं जो टूटी फूटी हिन्दी भाषा में उनसे बात करते पाए जाते हैं। गांधी जी के अनुसार यह कहना गलत है कि मद्रास में भी बिना अंग्रेजी के काम नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने हिन्दी के सहारे मद्रास में भी सफलतापूर्वक अपना काम चलाया।
          गांधी जी या अन्य कांग्रेसी नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाए जाने की कोेशिश की। राष्ट्रभाषा यदि राष्ट्रीयता की भावना के सूचक रूप में सिद्ध होती है तब उसके दो लक्षण आपस में गुँधे रूप में मिलते हैं भीतरी तौर पर देश को एकताबद्ध करने की प्रवृत्ति और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाह्य रूप में देश को विशिष्ट सिद्ध करने की प्रवृत्ति। हाॅगन (1966) किसी भी अन्य इकाई की तरह राष्ट्रभाषा का भी काम आभ्यंतर अंतर और और विभेद को कम करना ओर बाह्य अंतर और विभेद को उभारना होता है। इसका आदर्श होता है अभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता। आभ्यंतर एकता के लिए अगर बहुभाषी देशों में यह आवश्यक हो जाता है कि मातृभाषा के साथ ही एक अन्य भाषा ‘लिंगुआ फ्रैंका’ के रूप में उभरे तो बाह्य विशिष्टता के लिए यह भी ज़रूरी है कि ‘लिंगुआ फ्रैंका’ के रूप में राजभाषा का दर्जा पाने वाली भाषा स्वदेशी हो।
          अभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता के रूप में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का प्रयत्न स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले भी होता रहा और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का यह कहना था कि ‘यह सच है कि कोई भी देश अपनी मातृभाषा के द्वारा ही आगे बढ़ सकता है। हम दूसरी भाषा सीख सकते हैं, बोल सकते हैं, लेकिन नये विचार उससे पैदा नहीं होेते। नए विचार केवल अपनी मातृभाषा के द्वारा ही निकल सकते हैं। इसलिए हमें भारत की सभी भाषाओं को आगे बढ़ाना है, प्रोत्साहन देना है और हिन्दी का तो एक विशेष स्थान है ही। हम चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी भारत के सभी लोग अगर हिन्दी न बोल सके तो कम से कम समझ तो सके मैं समझतीं हूं, यह काम आगे बढ़ रहा है। इतने बढ़े देश में, जहां इतनी भाषाएं हैं वहां देश की एकता के लिए आवश्यक है कि कोई भाषा ऐसी हो, जिसे सब बोल सके, जो एक कड़ी की तरह सबको मिला जुला कर रख सके। इसीलिए हिन्दी को बढ़ाना हम सब का काम है’।
          यह गौर करने की बात है कि स्वतंत्रता पूर्व के सभी प्रयत्न राष्ट्रभाषा के लिए थे जो भाषा (हिन्दी) के माध्यम से देश को एकताबद्ध कर उसे अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित करे के लिए थे। इसके भीतर अखिल भारतीय प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए सिद्ध भाषा प्राकार्य भी थे और संपूर्ण भूभाग की सांस्कृतिक एकता को एक ही सूत्र में आबद्ध करने वाले तत्व भी समाहित थे। पर भारतीय संविधान ने भाषा के संदर्भ में एकसूत्रता की कल्पना को केवल प्रशासनिक प्रयोजनों तक सीमित कर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास को संघ की राजभाषा मात्र तक सीमित कर दिया। भारतीय संविधान में जहां भी अखिल अखिल भारतीय स्तर पर संघ की भाषा के रूप में हिन्दी की बात की गई है उसे राजभाषा ही घोषित किया गया है। सच तो यह है कि हिन्दी के रूप में सिद्ध आभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता की राष्ट्रीय चेतना पर स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही दुहरा दबाव पड़ा जिसके प्रभाव से भारतीय संविधान के भाषा संबंधी अधिकनियम भी सर्वथा मुक्त नहीं कहे जा सकते।
          यह तथ्य भाषा की अन्तर्निहित संकल्पना के भीतर है कि भाषा अपने भाषायी समाज के सदस्यों के भीतर सामाजिक अस्मिता की भावना को प्रश्रय देती है। हर भाषा न केवल विभिन्न बोलियों को अपने भीतर समेट कर एक समग्र इकाई के रूप में उभरती है वरन् मात्रभाषा के रूप में बोलियों को स्वीकृति देते हुए भी सामाजिक धरातल पर उनके बोलने वालों के बीच न केवल संपर्क साधन का काम करती है वरन् उनके भीतर तादात्म्य भाव पैदा कर एक समाज के सदस्य होने की धारणा को चेतनाबद्ध करती है। सामाजिक स्तर पर एक होने की यह चेतनाबद्ध धारणा भी ‘आभ्यंतर एकता अर्थात विभिन्न बोली भेद (अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी आदि) के बावजूद भी एकभाषी (हिन्दी) होने की धारणा और बाह्य विशिष्टता अर्थात एक ही भूभाग की अन्य भाषाओं (तमिल, बंगला, गुजराती आदि) से भिन्न सिद्ध करने की प्रवृत्ति। बाह्य विशिष्टता जनपदीय उन समूहगत लक्षणों को उभारने का प्रयत्न करती है जो स्थानीय संस्कृति और साहित्य के धरोहर होते हैं और जो उस भाषायी समाज की सुख समृद्धि की संकल्पना को साकर करने में सहायक होते हैं। इसीलिए जब प्रशासन की सुविधा के लिए भारत को विभिन्न जनपदीय प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित कने का प्रयास हुआ तब उसके इस भाषायी आधार की उपेक्षा न की जा सकी। प्रदेशों का भाषायी आधार क्या रहा है उसके बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। हां, यह तथ्य अवश्य हमारे सामने है कि वे सभी प्रदेश बहुभाषी हैं। पर प्रदेशों के गठन और सीमा निर्धारण के समय ‘डामिनेंट’ भाषा की संकल्पना से हम कभी अपने को मुक्त नहीं कर सके हैं। यही कारण है कि जब किसी विकसित चेतना वाले भाषायी समाज को गौण स्थान मिला है और डामिनेंट भाषा का भाषायी समाज उसके प्रगति मे बाधक हुआ है। भाषायी दंगे का वीभत्स रूप भी सामने उभरा है।[2]
          संविधान की अष्टम अनुसूची में इस प्रकार आज 15 मान्य प्रादेशिक भाषाएं हैं। जिनमें से अधिकांश भाषायी समाज की अस्मिता की साधक हैं और बाह्य विशिष्टता के रूप में अपने स्वतंत्र अस्तित्व की आकांक्षी हैं। इतिहास की जनपदीय सह-अनुभूतियां ओर साहित्य की भाषाबद्ध चेतना उनकी आकांक्षाओं में अपना रंग भरती है। स्थानीय सुख समृद्धि की लालसा और क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक सुरक्षा की भावना उनकी अपन अस्मिता में प्राण फूंकती है। इसलिए जब कभी भी अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय भाषा के रूप में किसी एक भाषा (भले ही बृहत्तर भागों में समझी जाने वाली और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के समय सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली हिन्दी भाषा ही क्यों न हो) को मान्यता देने की बात उठी है, अन्य भाषायी समाज ने इस शंकालुभाव से देखा है। कहीं इससे उनके भाषायी समाज की विशिष्टता खंडित तो नही हो रही ? कहीं इसके परिणाम स्वरूप उनके समाज से आर्थिक विकास का रास्ता अवरुद्ध तो नही हो रहा ? कहीं कोई और भाषायी समाज बढ़कर उनकी जातीय चेतना की हीन सिद्ध तो नहीं कर रहा है ? दूसरी भावना यह भी सामने उभरी है कि भारत अगर एक राष्ट्र है तो जिस प्रकार ‘हिन्दी भाषायी समाज’ उसका एक अंग है, उसी प्रकार हम भी उसके एक अंग हैं, फिर एक अंग की भाषा पूरे राष्ट्र का प्रतीक बन ‘राष्ट्रभाषा’ कैसे और क्यों न बने ? यह भी तर्क उभारा गया है कि जिस प्रकार किसी राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नही है कि उसके सभी सदस्य एक धर्म के मानने वाले हों, उनके खान पान, रीति-रिवाज और आचरण विचार रूढि़यां एक हों, इसी प्रकार उसके लिए यह भी ज़रूरी नहीं कि उसके लिए एक ही राष्ट्रभाषा (भाषा नहीं ?) हो। पर यह भी सच है कि भाषाओं की इस भिन्नता और सामाजिक अस्मिताओं के भेद के बावजूद यह हमेशा अनुभव किया जाता रहा है कि अलग अलग भाषाओं के बीच कड़ी के रूप में कोई भाषा अवश्य होनी चाहिए। प्रशासन की सुविधा और अखिल भारतीय स्तर पर संप्रेषण व्यवस्था के लिए एक संपर्क भाषा देश की नियति है। इसलिए हिन्दी को एकनिष्ठ ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में मान्यता देने के पक्ष के समर्थक भी अधिकांशतः उसे प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए सिद्ध ‘राजभाषा’ का दर्जा देने के लिए सहमत हो गये।
          लेकिन इसके साथ पाश्चात्य शिक्षा के वातावरण में पला और स्वतंत्रता पूर्व की विदेशी प्रशासन व्यवस्था का संस्कारग्रस्त व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग भी है जो राष्ट्रभाषा या राजभाषा की समस्या को हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं के संबंधों में न ढूंढकर हिन्दी और अंग्रेजी की प्रतिद्वद्विता के रूप में उभारना चाहता है। उनके तरकश के तीर रहे है अंतर्राष्ट्रीय संबंध, वैज्ञानिक उपलब्धियां, आर्थिक विकास, विकसित भाषा रूप आदि। इनके साथ उनका यह भी कहना है कि राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से राष्ट्र को एक होने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि उसकी राजभाषा, उस देश की ही कोई भाषा है। आखिर स्विट्जरलैंड में तीन राजभाषाएं हैं और उनमें से कोई भी उस देश की नहीं है। इसी प्रकार बेल्जियम की स्वीकृत दानों राजभाषाओं में से दोनों ही तो उस देश की अपनी भाषाएं नहीं हैं और मान भी लें कि राजभाषा, उसी देश के बोलने वालों की कोई भाषा हो, तो अंग्रेजी भाषा को अब भारत की एक भाषा के रूप में ही मान लेना चाहिए क्योंकि एक ओर तो अखिल भारतीय स्तर पर प्रशासन के लिए यह पहले से ही सिद्ध भाषा है और दूसरी ओर यह भारतवर्ष के पूरे बुद्धिजीवी वर्ग की वह भाषा है जिसके माध्यम से वह आधुनिकतम ज्ञान ग्रहण और अभिव्यक्त करती है (ये सभी तर्क समस्या के एक आंशिक पक्ष को उभारते हैं और सोंचने समझने की एक भ्रामक दिशा के परिणाम है।) यह अन्यत्र[3] दिखलाया जा चुका है। यहां इतना कहना ही अलग होगा कि ये सभी तर्क उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक बहुत ही सीमित वर्ग की अधिकार रक्षा और प्रभुता शक्ति को अपने स्वार्थ हितों तक बांध रखने की भावना से मूलतः प्रेरित हैं। शासन तंत्र का प्रसार कर अगर उसमें जनता के अधिक से अधिक सहयोग लेने और उससे संबंध स्थापित करने की बात लोकतन्त्र की ध्वनि में है तो किसी ऐसी ही भाषा को राजभाषा के पद पर उठाना होगा जिसके बोलन समझने वाले सबसे अधिक हों और जिसका प्रचार और प्रसार बहुआयामी हो। आज की स्थिति में वह हिन्दी भाषा ही है। पर इसके साथ यह भी सच है कि उच्च शिक्षा प्राप्त यह अधिकारी वर्ग ही भारतीय प्रशासन की धुरी बना बैठा है और मात्र हिन्दी को राजभाषा का माध्यम बनाने से अगर किसी के हितों पर सबसे करारी चोट पड़ेगी तो वह यही वर्ग होगा। शासनतंत्र की व्यावहारिक सुविधा के लिए ही मूूलतः हिन्दी अंग्रेजी की द्विभाषिक स्थिति संवैधानिक आवाज की विडंबना के रूप में सुनी जा रही है।
          राजभाषा (प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा) और राष्ट्रभाषा (सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा) के बीच के यर्थाथ साधनों के रूप में हिंडोलें लेती हिन्दी की नियति की यही आवाज संविधान के अनुच्छेद 351 में मिलती है जहां उसकी भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति के माध्यम बनाने की बात की गई पर जिसको औपचारिक दृष्टि से केवल राजभाषा के दायित्व और सूचक तत्व के रूप में मान्यता दी गईं हैं।
          जैसा पहले संकेत दिया जा चुका है, फिशमैन (1971) ने इस नीति निर्णय के आधार पर कि किस भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया जाए राष्ट्रों को तीन वर्गों में विभाजित किया है। उनके अनुसार क-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों का वर्ग है जो जातीय प्रमाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ की शक्ति के दबाव से मुक्त होकर अपने देश को एक सूत्रता में बांधने की ओर प्रवृत्ति हैं। इस वर्ग में उनके बुद्धजीवियों की आवाज़ सुनी जाती है जो ‘आधुनिकता’ से प्रभावित होकर अपने देश को समुन्नत करना चाहते हैं। इसके विपरीत ख-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों का वर्ग अपने चिंतन के पीछे हमेशा जातीय प्रामाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ का दबाव महसूस करता है। यह वर्ग इस विचार से प्रेरित रहता है कि सामाजिक एकता और जातीय सामांजस्य की भावना को जाग्रत करने के लिए कोई एक स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा की दावेदार बना सकती है। ग-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों की चिंतन प्रक्रिया जटिल होती है। ऐसे राष्ट्र यह मान कर चलते है कि क्षेत्रीयता की स्थानिक प्रवृत्ति से प्रेरित सामाजिक वर्ग का युग बीत गया और उससे ऊपर उठने का अर्थ ही होता है द्विभाषिक बनना। इस दृष्टि से द्विभाषिकता की स्थिति आज सामान्य व्यक्ति की ही नियति नहीं है अपितु यह स्थिति पूरे राष्ट्र की है। केवल राष्ट्र के धरातल पर सिद्ध प्रादेशिक (क्षेत्रीय) भाषाओं और अंतर क्षेत्रीय संपर्क सूत्र स्थापित करने वाली भाषा के बीच की द्विभाषिकता ज़रूरी नहीं अपितु देश को आधुनिक बनाने और दुनिया के अन्य देशों से संबंध स्थापित करने के लिए भी यह ज़रूरी है कि किसी एक विदेशी पाश्चात्य भाषा को स्वीकार कर दुहरी द्विभाषिकता को हम बढ़ावा दें।
निश्चय ही भारतवर्ष अगर किसी वर्ग में रखा जा सकता है, तो वह ‘ग-टाइप’ के निर्णय लेने वाले देशों का वर्ग। पर यहां की स्थिति उतनी सरल नहीं जितनी कि फिशमैंन समझते हैं। राष्ट्रभाषा के चुनाव के पीछे यहां अनेक ऐसी प्रवृत्तियां काम करती रहीं है जिनका आपस में तालमेल बैठाना बहुत सरल न था। कम से कम चार निश्चित धाराएं तो सामने उभर कर आतीं हैं:
(1) राष्ट्रीयतावादी धारा यह मानकर चलती है कि संस्कृत भाषा संस्कृति सभ्यता की ही नहीं वरन् अनेक भारतीय भाषाओं की जननी है जिन भाषाओं इसका पारिवारिक संबंध नहीं भी रहा उसको भी यह प्रभावित करती रही है। जातीय प्रामाणिकता के ऐतिहासिक गौरव स्तंभ के रूप में यह भाषा आधुनिक सभी भारतीय भाषाओं का हृतकंपन है इसलिए एक राष्ट्र और उसके हृतकंपन को मूर्तमान करने वाली राष्ट्रभाषा संस्कृत भाषा के रूप में ही सिद्ध हो सकती है।
(2) अंतर्राष्ट्रीयतावादी धारा यह मानकर चलती है कि राष्ट्र को प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से एक तो होना ही है। इसके साथ उसे आर्थिक दृष्टि से समृन्नत और शैक्षिक दृष्टि से सुदृढ़ होने के लिए यह ज़रूरी है कि वह आधुनिक ज्ञान विज्ञान की उपलब्धियो से परिचित हो। ऐसा तभी संभव है जब हम अधिक विकसित और वैज्ञानिक चिंतन प्रणाली को अधिक क्षमता से व्यक्त करने वाली अंग्रेजी भाषा को स्वीकार करें जो अब तक उच्च शिक्षा की माध्यम भाषा होने के कारण शिक्षित वर्ग के लिए सहज ही उपलब्ध है। इस विचारधारा के अनुसार आज कोरी राष्ट्रीय भावुकता से काम नहीं चल सकता। संपर्क और सहयोग के कारण अब तक विभिन्न राष्ट्रों से समूह के रूप में फैला संसार अब सिमटता जा रहा है और अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के बिना आज किसी भी राष्ट्र के विकास की संभावना दुःस्वप्न मात्र है। इसके लिए हमें जो राष्ट्रभाषा चुननी है उसको एक आयाम पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर को भी छूने की शक्ति रखनी चाहिए।
(3) क्षेत्रीय धारा वाले राष्ट्र का राजनीतिक इकाई मानते हैं और उसे इकाई मानते हुए भी अपनी प्रादेशिकता सत्ता और क्षेत्रीय अधिकारों के प्रति सजग और सतर्क हैं, उनके अनुसार जिस प्रकार भारतवर्ष अनेक धर्मों और अनेेक प्रजातियों का देश है उसी प्रकार वह ऐसा बहुभाषायी देश भी जहां अनेक भाषाएं अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक संपदा के साथ फल फूल रहीं हैं। इन सभी को अपनी सार्थकता है, अपने संदर्भ हैं और ये सभी राष्ट्रीय चेतना के सिद्ध रूप हैं। इनमें से किसी एक को राष्ट्रपद पर बैठाने पर अन्य सभी भाषायी समाजों के अपने विकास का रास्ता सापेक्षतया कठिन हो जाएगा। भारतवर्ष ऐसे लोकतांत्रिक देश में ऊपर उठने के लिए सबको समान सुविधा मिलनी चाहिए। इसलिए निष्कर्षतः इस धारा के समर्थक यह मानते पाए जाते हैं कि सभी प्रादेशिक भाषाएं भारत की राष्ट्रीय भाषाएं हैं।
(4) लोकवादी जनतांत्रिक धारा यह मानती है कि भारतवर्ष अनेक प्रदेशों का एक समुच्चय है पर इस समुच्चय की सिद्धि एक संघ के रूप में है। यह संघ ही है जो एक ओर भारत को राजनीतिक इकाई का रूप देता है और दूसरी ओर राज्यों के अंतससंबंधों के बीच कड़ी का काम भी करता है। इसी प्रकार प्रादेशिक भाषाओं की सता और सार्थकता को स्वीकार करती हुई वह उसके बीच कड़ी के रूप में सिद्ध होने वाली एक भाषा की धारणा को बढ़ावा देता है। उसके अनुसार भारत लोकतंत्र के सिद्धांत का प्रबल समर्थक भी है, अतः अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क सूत्र के रूप में स्वीकृत वही भाषा हो सकती है जिसके सामाजिक आयाम बहुमुखी और बहुस्तरीय हों, जिसको अन्य भाषा के रूप में बोलने और समझने वालों की संख्या सबसे अधिक हो और जो भारतीय संस्कृति की लोकवादी चिंतन धारा को मूर्तमान करने में सक्षम हो। ऐसी भाषा संप्रति हिन्दी ही है।
          भारतीय संविधान में भाषा संबंधी अनुच्छेदों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माता इन चारों प्रवृत्तियों से अपरिचित न थे और उनका प्रयास यही रहा है कि जहां तक हो सके, इन चारों धाराओं के बीच एक सामंजस्य पैदा कर कम से कम भाषायी तनाव की स्थिति पैदा की जाए। लोकवादी और अन्तर्राष्ट्रीयवादी धारा को एक साथ समेटने को कोशिश का यह परिणाम है कि प्राथमिक राजभाषा के रूप में ‘हिन्दी’ और सहयोगी राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को संविधान में स्वीकृत पाते हैं। इसी प्रकार क्षेत्रीय धारा के साथ समझौता करने के प्रयत्न को हम इस रूप में पाते हैं कि किसी भाषा को यहां तक कि हिन्दी को भी, राष्ट्रभाषा के नाम से संबोधित या परिभाषित नही किया गया है, और अष्टम अनुसूची में स्वीकृत भाषाओं के रूप में संस्कृत, उर्दू और सिंधी के साथ प्रादशिक (राज्य भाषाओं) भाषाओं का नाम लिखा पाते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयतावादी धारा को इसके साथ मिलाकर रखने की प्रवृत्ति को हम अनुच्छेद 351 में पाते हैं जो हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश रूप में यह विचार व्यक्त करता है कि हिन्दी को अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो, वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए विकसित किया जाए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. फिशमैन, 1971
  2. श्रीवास्तव, 1979
  3. श्रीवास्तव 1977
  • नैयर, कुलदीप 1982 ए. गवर्नमेंट शुड नाॅट ग्लोरिफाई ए लैंग्वेज, सेंड वर्ष 10 अंक 4, पृ. 9
  • फिशमैन, जे. ए. 1971 नेशनल लैग्वेज एंड लैंग्वेजि़ज आॅफ़ वाइडर कम्युनिकेशन इन डिवेल्पिंग नेशंज़ देखें लेंग्वेज यूज सोशल चेंज, (सं. विटले) 27-56, आक्सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,
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  • श्रीवास्तव, आर. एन. 1977 इंडियन बाइलिगुंअलिज्मः मिथ एंड रियलटी देखें इंडियन बाईलिंगुआलिज्म (सं. शर्मा और सुरेश कुमार) 57-87 केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा
  • 1979 लेंग्वेज मूवमेंटस अंगेस्ट हिन्दी एज एन ओफिशियल लेंग्वेज, देखें लेंग्वेज मूवमेंट्स इन इंडिया (सं. ई. अन्नामलाई) 80-90, सेंट्रल इंस्टीट्यूल आॅफ इंडियन लेंग्वेजिज़, मैसूर।
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