हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति -प्रो. केसरीकुमार  

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है भारतकोश का नहीं।
{{#css:
  1. bodyContent {width: 97%; color:#333333; background-color: #fef5f6; padding:10px; padding-top:none; padding-right:none; border: thin solid #ffa6a6; margin-top:10px;}

hr { background-color: #f44f4f; margin-top:10px; margin-bottom:10px;} }}

लेखक- प्रो. केसरीकुमार

         हमारा देश भारत नाना जातियों, संप्रदायों, दार्शनिक धाराओं, भाषाओं का महादेश है - एक ऐसी चिंतनधारा जिसमें नाना दृष्अियों का घर्षण होने दिया जाता है। फिर भी जिसकी मूलभूत एकता बनी रहती है। जो विदेशी यहां की दार्शनिक धाराओं का पेंचीदा ताना बाना भर देख पाते हैं, जो दैनंदिन जीवन और आत्मा के रहस्य का, काव्य और दर्शन का, व्यंग्य और गीतितत्व का या सामाजिक विश्लेषण और व्यक्ति के आंतरिक अनुसंधान की द्वंद भर देख पाते हैं, वे अवरोधों से आंक्रत होकर रह जाते हैं। और फलतः भारतीय समाज की समूची रचनात्मक ऊर्जा को, जो भारत के सामासिक व्यक्तित्व की महिमा है, नहीं पहचान पाते। आध्यात्मिक झनकार, जो हमारी परंपरा की धुरी है, धर्म से आती है और समन्वय पद्धति जो हमार समाज की सामासिक स्थिति का अनुशासन है, ये दो स्पष्ट विशिष्टताएं भारतीय साहित्य की हैं।

         एक गहरी समाजवैज्ञानिक पहचान भारतीय साहित्य के अध्ययन की एक अन्यतम आवश्कता है क्योंकि इसमें दार्शनिक विचारधाराओं और अंतर्धाराओं का गोपन संभाषण है, जातियों और भाषाओं का संघात है, वर्गोें के हितों और रुचियों का संताप है, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण देशी विदेशी जीवन पद्धितियों और संस्कृतियों का समीकरण है और फलतः प्रत्येक काल की परस्पर अतिगुंफित साहित्यिक धाराएं और दिशाएं हैं, जटिल और बहुमुखी विकास की प्रक्रियायें एवं क्रियाशील तथ्य है।

         हिन्दी में भारतीय साहित्य की ये विशिष्टताएं बदस्तूर बनी हैं बल्कि एक नई जटिलता के साथ क्योंकि इसके प्रणेताओ को दो स्तरों पर काम करना पड़ा: विचारों और अवधारणाओं की अंधरूढ़ियों से मुक्त करने के स्तर पर अैर जन संप्रषण के माध्यम के स्तर पर यानी अपने अविकल, अखंड एवं संपूर्ण अर्थ सत्य को नाना बिंबात्मक उपायों से जनशैली एवं प्रतीकों या अंशतः या संपूर्णतः अपने द्वारा गढ़़ी भाषा में अवतरित करने के स्तर पर। बृहत्तर भारत की (भारत के बाहर भारतीय मूल के निवासियों के जो देश हैं उनको लेकर तथा विदेशों में फैले हुए भारतीय मूल के समुदायों को लेकर) संस्कृति की यही व्यवहार भाषा है।

         हिन्दी तो भारत के आम आदमी की ज़रूरत की भाषा के रूप में जैसे प्रकृति की कोख से पैदा हुई। यह कहना कठिन है कि हिन्दी का जन्म भारत के किस प्रदेश में हुआ। जिस आम आदमी की भाषा के रूप में यह विकसित हुई उस आदमी की संतति हिन्दुस्तान में हर जगह, हर चैराहे और घाट पर, हर बाज़ार और तीर्थ में, श्रमिकों और भिखमंगों की टोल में, क्रंतिकारियों की हर जमात में मिल जाएगी। यह आदमी परिस्थिति और प्रकृति दोंनों से देश की सामासिक संस्कृति का संवाहक रहा है। यह मानना निराधार नहीं है कि हिन्दी का विकास भारत की लोकचेतना का विकास है, रूढ़ियों से मुक्त कर भारतीय संस्कृति की मूल चेतना के संरक्षण का इतिहास है।

         इस भाषा में कुलीनता के रुद्ध द्वार पर पहली दस्तक दी कालिदास के साहित्य में। इतिहास की यह चिंतनीय दुर्घटना है कि कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ के चतुर्थ अंक के उन अपभ्रंशाशों को पुरानी हिन्दी नहीं माना गया, जो उसके प्रथम उत्तराधिकारी हैं। यद्यपि सरहपा[1], स्वयंभू[2] और अबदुर्रहमान (अछहमाण)[3] का हिन्दीपन उनमें विद्यमान है। ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्‌’ में वैदिक और ‘विक्रमोर्वशीयम’ दोहा और सोहर जैस लौकिक छंदों का प्रयोग भी इस तथ्य के समर्थक हैं। कि ऋषि से भिन्न कवि के रूप में कालिदास यदि संस्कृत के प्रथम महाकवि हैं तो वे ही हिन्दी के प्रथम ज्ञात कवि भी हैं।

         इतना तो स्पष्ट ही है कि संस्कृत के समानांतर लोकभषा भी नाना रूपों में विकसित हो रही थी और उसमें लोकसंस्कृति एवं लोकमानस मुंह खोल रहे थे। कालक्रम से यह लोकभाषा संस्कृत के रचनाकारों से मान्यता प्राप्त करती गई। वाचिक स्वरूप के कारण इसका नाम भाषा पड़ा और इसके कवि भाषाकवि कहलाने तथा समादूत होने लगे। सातवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ में अपने परम मित्र भाषाकवि ईशान (भाषाकविरीशानः परंमित्रम्) का आदरपूर्वक उल्लेख किया है।

         यह ‘भाषा’ हिन्दी भाषा और साहित्य को समझने की एक अच्छी कुजी देता है। यह प्रश्न कई कोनों से दुबके छिपे और प्रकट रूप में भी पूछा जाता रहा है कि राजस्थानी के चारणों, मैथिली के विद्यापति, ब्रजभाषा के सूरदास और अवधी के तुलसीदास को हिन्दी के कवि क्यों माना जाता है। इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि न तो चंदबरदाई ने अपने आपको राजस्थानी कवि कहा है, न ही विद्यापति ने अपने को अवधी का कवि स्वीकार किया है। विद्यापति की प्रसिद्ध उक्ति है: बालचंद विज्जावह भाषा। कबीर का महावाक्य है: भाखा बहता नीर। और तुलसीदास का विनम्र निवेदन है - भाषा भनति मोर मति थारी। यह भाषा क्या थी जिसे आज हम हिन्दी कहते हैं। इसे स्पष्ट करते हुए हिंदी के प्रथम महाकवि चंदबरदाई कहते हैं यह षट्भाषा है, यानी यह विभिन्न प्रदेशों और स्रोतों से बनी हुई सामासिक देश की सामासिक भाषा है और इसका कथ्य पुराण और क़ुरआन दोेनों से लिया गया है: षट्भाषापुराणं च क़ुरआनं कथित मया। इस प्रकार यह भाषा एक ऐसी रचना भाषा थी जो स्थानीय गुणों को रख कर भी एक व्यापक बृहत्तर परिवेश में संचरण करती थी, एक सामान्य चिंतन भूमि को उजागर करती थी तथा विभिन्न प्रदेशो में संप्रेषित होने को प्रतिश्रुत थी। हिन्दी इसी भाषा धारा का परवर्ती नाम है। स्वभावतः इस धारा के कवि को हिन्दी का कवि कहा जाता है।

         सातवीं शती के बीतते न बीतते तत्कालीन सामाजिक गतिशीलता, विद्रोह और यथार्थ की वहा चेतना, जिसका सातत्य हिन्दी साहित्य का सर्वोपरि लक्षण और महान् परंपरा बन गया, इसी भाषा मे दिखाई पड़ने लगा था। इसी में सोपान की अवधारणा के विरुद्ध उस अखिल भारतीय संघर्ष के दर्शन हुए थे, जिसके साक्षात्कार के बिना हिन्दी क्या, किसी भी भारतीय भाषा का इतिहास आज तक लिखा ही नहीं जा सकता। किंतु यह दुर्भाग्य है कि इस संघर्ष का इतिहास आज तक लिखा ही नहीं गया। हम जिन्हें सिद्ध कहते हैं वे दरअसल अपने समय के प्रबुद्ध चिंतक थे, मात्र अश्लील मुद्रा वाले, रजकी का अबाध सेवन करने वाले, शास्त्रविरोधी अटपटे योगी नहीं जैसा सामान्यतः माना जाता रहा है। इनमें अनेक तो नालंदा विक्रमशिला के आचार्य थे। सरहपा, विरूपा और भुसुकपा नालंदा विहार के नियमित छात्र थे। गुह्यज्ञानवज्र दीपंकर श्रीज्ञान ने नालंदा और विक्रमशिला दोनों विद्याकेंद्रोें में शिक्षा पाई थी। शांतिपा विक्रमशिला में शिक्षित होने के बाद ही सोमपुरी विहार के स्थविर नियुक्त हुए थे। बौद्ध दर्शन के पंडित कंबला, महाराज के लेखक आदि सिद्धाचार्य लुइपा और राज शांतिवाहन के पुत्र चैरंगीपा अशिक्षित थे, ऐसा मानना संभव नहीं है, बल्कि मानना तो यह पड़ेगा कि ये सब नालंदा और विक्रमशिला के मेधावी स्नातक थे और तदनंतर स्वीकृत आचार्य होकर अपने युग के चिंतन के प्रभावी माध्यम हुए। यह अकारण नहीं था कि सरल अध्ययनोपरांत नालंदा के ही, जहां के वे छात्र थे, प्रधान पुरोहित नियुक्त हुए। गुह्यज्ञान दीपंकर श्रीज्ञान ने मगधनृप के अनुरोध पर विक्रमशिला विहार के पूर्वाद्वार के महापंडित बनाए गए थे। अपने समय के ये भारतीय बुद्धिजीवी नाना जातियों और नाना प्रदेशों - कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार, बंगाल, आसाम, उड़ीसा, त्रिपुरा, नेपाल आदि के थे। दूर दूर से आए हुए ये साधक विचारक समय से उद्भूत आवश्यकता की भूमि में भारतीय संस्कृति की पुनर्व्यवस्था करने के हेतु सामान्य सूत्रों की खोज में नालंदा और विक्रशिला विद्यापीठों में सोद्देश्य इकट्ठे हुए थे। इन्होंने इसी भाषा में अपने मुहावरे गढ़े थे। इनमें अपने समय के भारत का अंतर्विरोध भी है। और जहां ये जातिवाद ओर सोपान पर चोट करते हैं तथा जीवन पद्धति की कृत्रिमता के विरुद्ध सहजवाद और सामरस्य के दर्शन को उजागर करते हैं, वहां हम तत्कालीन भारत के सांस्कृतिक मानस की वह काई धोने वाली छटपटाहट भी देखते हैं[4] जो चढ़ाई के अगले मुकाम पर अधिक स्पष्ट हुई किंतु जिसकी तैयारी इन सिद्धों ने ही कर दी थी और जिसका सिलसिला आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक चलता रहा। सिद्धों के अनेक शिष्य मुसलमान थे, जैसे चैरंगीपा आदि। नाथ संप्रदाय में तो महंत महंत नहीं बल्कि पीर कहलाते थे। गोरखनाथ कहते हैं कि उत्पत्ति से हम हिन्दू हैं, जीर्णता और परिपक्वता से योगी हैं तथा अक्ल से मुसलमान हैं।[5] उधर सार्मत चारण काव्यधारा की प्रवृत्तियाँ भी अब अधिक स्पष्ट होने लगी हैं। इसमें स्थानीय राष्ट्रीयता के साथ ही व्यापक भारतीय संस्कृति की अवधारणा भी प्रश्रय पाने लगी है। जैसा हमने ऊपर देखा है, चंदबरदाई ने अपने जननांतर सुहृद राजा की यातनाएं देखीं थीं। किंतु इससे उनकी व्यामक सांस्कृतिक अवधारणा खंडित नहीं हुई और उन्होंने पुराण और क़ुरआन दोनों को विवेक के स्तर पर स्वीकार करने की बात कही।

         इसके बाद भक्ति की जो लहर उमड़ी उसमें सारा देश समान रूप से लहरा उठा। उसमें उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गये। श्रीमद्भागवत महापुराण के माहात्म्य वर्णन मे आई हुई, खंडितांग हुई और वृंदावन पहुंचकर नए सिरे से फिर सम्यक उत्कृष्ट रूप प्राप्त कर नवयुवती हो गई[6]। इस कथन का तर्क संगत तात्पर्य यह है कि जो वैदिक काल से चली आ रही थी उस भक्ति का अवतरण, एक प्रबल सामाजिक आंदोलन के रूप में, अलवार भक्तों के कारण द्रविड़ में हुआ।

         आज से दो हजार वर्ष पहले यानी ईसा की पहली शताब्दी से ही भारत के दार्शनिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक चिंतन में एक व्यापक क्रांतिमूलक परिवर्तन होने लगा था। कर्मकांड और ज्ञानप्रधान धर्म के, जो स्वतः अपर्याप्त होने लगा था, आमने सामने कवियों के हृदय से निःसृत एक नई मानवीय संवेदना और ममता से सिक्त भक्ति धारा प्रवाहित होने लगी थी। वैदिक, जैन और बौद्ध धर्म के साथ, बावजूद नहीं जैसा अक्सर समझ लिया जाता है, शैव वैष्णव भक्तिधारा एक नए आयाम की खोज थी। इसे ब्राह्मण धर्म कहना गलत है। ब्राह्मण धर्म की पुनःस्थापना कहना तो और भी गलत है। अपनी सामायिक अपर्याप्तता में ब्राह्मण और श्रमण धर्म सहजीवन बिताने के अनेकविध उपकर्म रच रहे थे। समन्वय का यह महान् काल था।

         तमिल साहित्य के नयनद्वय ओवेयार और तिरुवल्लूर का समय आज से दो हजार वर्ष पहले ही माना जाता है। इनके भक्ति काव्य मेें नायन्मार और आलवारों की वाणी ने अपना रस मिलाया। ब्राह्मण से शूद्र तक सब इस लोकजीवनधारा के सहयात्री थे। गंगा-यमुना की भक्ति का इतिहास भी उतना ही पुराना है और इसकी बिखरी तीलियों के संकलन और उन पर आधृत ऐतिहासिक विभावन पर ही हमारे साहित्येतिहास का प्रथम वाचन पूरा होगा।

         भारतीय इतिहास और संस्कृति की एक ही लीला उत्तर और दक्षिण में, मथुरा और मदुरा में चलती रही है। नागार्जुन कोंडा की खुदाइयों में प्राप्त अश्वमेघ घाट, सर्वदेव मंदिर आदि के अवशेष यही प्रमाणित करते हैं कि 2200 वर्ष पूर्व ही ब्राह्मण और श्रमण धर्म गलबांही डाले इस देश में सर्वत्र सहजीवन बिता रहे थे। अधिसम्राट ब्राह्मण एवं अश्वमेघ पराक्रमी थे, तो उनकी रानियाँ बौद्ध धर्म में आस्था रखती थीं। वास्तुशिल्प का तत्कालीन परस्परालिंगन एवं निरपेक्षता द्रष्टव्य है।
         इस भक्ति आंदोलन के प्रसंग मे जिन मतप्रवर्तकों के नाम आदर से लिए जाते हैं उनमें श्री संप्रदाय और विशिष्टद्वैतवाद के प्रर्वतक रामानुजाचार्य, ब्रह्म संप्रदाय और द्वैतवाद के प्रर्वतक माध्वाचार्य, रुद्र संप्रदाय और शुद्धाद्वैतवाद के प्रर्वतक बल्लभाचार्य आदि दक्षिण के ही थे। शंकराचार्य ने उत्तर और दक्षिण का सेतु बनाने का जो काम शुरू किया था उसे इन लोगों ने अपने अपने ढंग से पुष्ट किया था। और यह कितनी दिलचस्प बात है कि जैसे प्रतिफलस्वरूप इनके दार्शनिक दृष्टिकोणों का भावात्मक और साहित्यिक विनियोग उत्तर में ही हुआ।
         जिस लोकभाषा की आहट अशोक के शिलालेखों और कालिदास की रचनाओं में सुनाई पड़ी थी, वह मध्य युग के रूढ़ियों के कूप को हतप्रभ कर बहता नीर बन गई। इस जनगंगा के तट पर देश भर के सिद्धों, संतों और भक्तों ने साहित्यिक साधना की। इसी भाषा में संतों की वह बौद्धिक क्रांति हुई थी जिसका लक्ष्य था वर्ग और जाति की दीवारों को तोड़कर, अंधविश्वासों को छिन्न कर, एक समता समाज का निर्माण। इस क्रांति में सवर्ण और अवर्ण, हिन्दू और मुसलमान, उत्तर और दक्षिण, औरत और मर्द के सारे भेद मिट गये थे। उत्तर और दक्षिण के संतों और सूफियों की एक ही भाषा थी। दक्षिण भारत के हैदर अली और टीपू सुल्तान ने इसी भाषा को राजपद दिया था। दक्षिण की हिन्दी ने भारतीय संस्कृति में समन्वय की जो भूमिका निभाई वह बेपनाह है। उत्तर में अमीर खुसरो ने भाषा के अजनबीपन को मिटाने का ऐतिहासिक काम किया और उसके व्यापक रूप का साक्षात्कार कराया।

शर्मो हया दर हिन्दी लाज,
हासिल कहिए बाज खिराज।

         जायसी आदि सूफियों ने भारतीय और फ़ारसी दोनों की रचना शैलियों को मिलाकर परंपरा से आती हुई भारतीय प्रेमकथाओं को एक सर्वग्राह्य रूप में पेश किया। सभी भाषाओं के प्रति उन्होंने आदर का भाव प्रकट किया। यह कहकर कि

अरबी, तुरकी, हिन्दुई, भाषा जेति आहि,
जेहि मंह मारग प्रेम का सबै सराहै ताहि।

         उन्होंने हिन्दी में एकरस चल रही भाषा नीति की अगुआई और पेशवाई की थी तथा हिन्दी की आधुनिक रचनात्मक नीति को जैसे पूर्वाशित किया था। हिन्दी की पूरी अनुरूपता कबीर की जिंदगी में है जो ग़रीब ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुआ और कनीज मुसलमान के घर पाला गया, जो जीवन भर मार खाता रहा और फिर भी जीवन को प्यार करता रहा। कबीर आदि संतों ने केवल संप्रदायिक एकता की ही बात नहीं की बल्कि इंसानियत के नाते आदमी आदमी की एकता की बात कही। दादू दयाल ने तो हिन्दू और मुसलमान को राष्ट्र के अंग के रूप में देखा:

दोनों भाई हाथ पग, दोनो भाई कान।
दोनो भाई आँख हैं, हिन्दू मुसलमान।।

         हिन्दू मुसलमान भाई-भाई के नारे का जन्मदाता इन्हें ही मानना चाहिए। हिन्दी के ऊँचे कवि भी निर्धन कोटि के मनुष्य रहे हैं। उनके लिए सवर्णता का क्या महत्व? कवियों के शिरोमणि तुलसीदास जब होश संभालते हैं, तो अपने को भिखमंगों की टोल मे पाते हैं। जाति कुजाति सब की टुकड़ी खाते हैं:

जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागि बस,
खाए टूक सबके विदित जात, गुनी सो।

         जहां मुट्ठी भर अन्न मिलता है ले लेते हैं, जहां बित्ते भर जगह मिलती है सो जाते हैं चाहे वह मंदिर हो या मस्जिद:

मांगि के खैबो मसीद को सोइबो।

वे मानते हैं कि उनकी कोई जाति नहीं है बल्कि एक अर्थ में किसी की जाति नहीं बनती:

मेरी न जाति-पांति, न चाहूँ काहू की जाति-पांति।

उनकी दृष्टि में जाति तो दो ही हैं, राज की या ग़ुलाम की, एक जाति शासक की और दूसरी शासक की।

साह ही को गोत, गोत होत है ग़ुलाम को।

         इसी तुलसी ने बदलते हुए भारत का महानतम महाकाव्य लिखा। ऐसा महाकाव्य जो न केवल अपने समय का दर्पण है वरन् आगे आने वाले समय के लिए भी अक्षय राष्ट्रकवच है जिसने न केवल नतशिर बंदी भारत को उद्ग्रीव और उन्नतभाल किया, पराभवकाल में बिखरते टूटते देश को संभाला, उसे सामाजिक एवं धार्मिक एकता का मार्ग दिखाया प्रत्युत जिसने आत्मा का साक्षात्कार करा कर सदा सदा के लिए पराजय भावना से बचा लिया। उसमें किसी की व्यक्तिगत या स्थानीय समस्या नहीं है, अखिल देश और मानव समाज की पीड़ा है। तुलसी ने अपने समय की समस्या को इस प्रकार देखा: दुःख का मूल कारण पराधीनता है और पराधीनता का मृख्य कारण समाज का धुरीहीन हो जाना है। अतः तुलसीदास देशवासियों को स्वाधीनता के लिए ललकारा-‘पराधीन समनेहं सुख नाहीं’ और इस हेतु शक्ति संचय करने के लिए सब प्रकार के समन्वय को उपाय बताया और उन्हें अपने महाकाव्य में शिव, राम, शबरी, कागभुशुंडि आदि के द्वारा चरितार्थ किया। तुलसी को जीने की प्रेरणा उस गौरवानुभूति से मिलती है जो किसी भी भारतवासी की हो सकती है कि हमारा जन्म भारत की श्रेष्ठ भूमि में हुआ है ‘भलो भारतभूमि भलो कुल जन्म’। रथी प्रतिरक्षी के समक्ष अपने नायक को विरथ दिखाकर तुलसीदास ने सशस्त्र दुश्मन और निशस्त्र प्रजा का अंतर दिखाया है पर विरथ सत्याग्रही की विजय दिखाकर यह सिद्ध किया है कि सत्य के युद्ध में यदि शौर्य, धैर्य, शीन, विवेक और समता का अमोघ उपाय बरता जाए तो सत्याग्रही की विजय निश्चित है:

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य शीन दृढ़ ध्वजा पताका।।
बल विवेक दम परिहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे।
सखा धर्ममय अस रथ जाके।

         इस प्रकार तुलसी ने समता की रस्सी को भारतीय समाज की अखंडता के लिए आवश्यक बताया है और उसके अनुरूप आचरण किया है। गौतम चंद्रिका के अनुसार तुलसी की जो अंतरंग मंडली थी उसमें थे - पंडित काशीनाथ, समरसिंह राजपूत, गंगाराम सत्संगी, कैलास कवि, नगरसेठ जैराम, तांबुली सियाराम, नाथू नापित, केबट रामू, रैदास खेलावन, बोधा गोड़, हरि हरबाहु, धाढ़ी मीर जसन जुलाहा, टोडर, मेहता भगत।

         हिन्दी ब्रज काव्यधारा की उपलब्धियां तो ऐतिहासिक और अनेक हैं। इस काव्यधारा ने, विशेषतः महाकवि सूरदास ने हिन्दी काव्य को इस प्रकार रागबद्ध किया है कि हिन्दुस्तानी संगीत और ब्रजकाव्य एकप्राण, एक देह हो गए। सूरसागर सुरों का भी सागर हो गया। शुद्ध हिन्दुस्तानी संगीत की पहिचान शुद्ध सूरकाव्य की खोज हो गई। परिणाम हुआ कि एक तो संगीत को काव्य का अंग मानकर काव्य रचने की परंपरा चली और दूसरे, हिन्दुस्तानी संगीत के सहारे उसके उदाहरण के रूप में हिन्दी कविता का अहिन्दी क्षेत्रों में भी प्रचार प्रसार हुआ।
         
         एक समय कृष्ण काव्य ने समूचे देश को एक संस्कृति और एक भाषा में आबद्ध किया था। मध्ययुगीन संस्कृति की यह ब्रज भाषा भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्थानीय रूपों रंगों को ग्रहण करती हुई देश पर छाई है। डाॅ० सुकुमार सेन कहते हैं कि ‘अबहट्ठ ने 15वीं-16वीं शती में ब्रजबुलि का रूप धारण किया । ब्रजबुलि किसी प्रांत विशेष की सम्पत्ति नहीं है, वह आदि भाषा की सम्पत्ति है और एक प्रकार से अंतिम सर्वभारतीय आर्य भाषा है।
         राजस्थान में पिंगल के रूप में, मध्य प्रदेश में ग्वालेरी के रूप में, पंजाब में ब्रज-पंजाबी-मिश्रित पटियालवी के रूप में, बंगाल और असम और उत्कल में ब्रजबुलि के रूप में यही भाषा फैली। राजस्थान की मीरा, महाराष्ट्र के नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता की वही भाषा है जो ब्रजभूमि के सूर की है। गुजरात और सौराष्ट्र से तो बल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ के कारण ब्रजभाषा का घनिष्ठ संबंध रहा ही। अष्टछाप के चौथे कवि कृष्णदास गुजराती ही थे। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ जैसे संतों की वाणी ब्रजभाषा में प्रकट हुई है। कुछ मराठी पवाड़े और युद्ध गीत भी ब्रज में लिखे मिलते हैं। दिलचस्प बात है कि नामदेव निर्गुण वाणी के लिए खड़ी बोली का और सगुण पदों के लिए ब्रजभाषा का व्यवहार करते हैं छत्रपति शिवाजी, उनके पिता शाह जी, पुत्र संभा जी, पौत्र साहू जी सबके सब ब्रजकाव्य के प्रेमी और संरक्षक थे। शिवाजी की राजसभा मेें ब्रजकवि तो समादूत थे ही छत्रपति स्वयं हिन्दी में भक्ति पद लिखते थे। पंजाब में तो ब्रजभाषा सिख समाज की धार्मिक वाहिका बनी रही, उपदेश की भाषा। गुरु गोविन्द सिंह की ब्रजी में लिखी रचनाएं उपलब्ध हैं। गुरु नानकदेव की भाषा ब्रजी और खड़ी बोली का मिश्रण रूप लिए हुए है। सिख गुरु अर्जुनदेव ब्रजभाषा में सूरदास के नाम से रचना करते थे। महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में चंद्रशेखर बाजपेयी, ग्वाल कवि आदि ब्रजभाषा के कवि थे। सिंध का डेरा गाजी खां बल्लभ सम्प्रदाय का पीठ और ब्रजकाव्य का केंद्र रहा। बिट्ठलनाथ के सिंधी शिष्य गोस्वामी श्रीलाल का वृन्दावन आना और लौट कर ब्रजभाषा में कविता करना प्रसिद्ध है। एक समय तानसेन ही क्यों, उस समय के अन्य संगीतज्ञ भी ब्रजभाषा विशेषतः सूरदास के पद के सहारे अपनी कला को प्रमाणित करते थे। केरल के महाराजा राम वर्मा (सं. 1870) को हिन्दुस्तानी संगीत के प्रेम ने ब्रजभाषा में काव्य रचने की प्रेरणा दी थी और आपने मलयालम लिपि में ब्रजभाषा की कविता लिखी थी।

         एक और महत्वपूर्ण बात यह है सूरदास ने गोचारण यानी चरवाहों को अपने काव्य का विषय बनाया है। यह नहीं कि सूरदास चरवाहों के अकेले या पहले कवि हैं। बंगला के प्रीति पदों में चरवाहों की वंशी भरपूर बजती है। पोतन्ना को तेलगू का सूरदास कहा जाता है। गुजराती परंपरा में उछंगराय केशवराय ने दूसरों की भैंस चराने वालों की प्रेमकथा शेणी विजानन्द (सेणी अने बीजाणंद) लिखी है और आंध्र प्रदेश के अन्नामाचार्य ने गोपिकाओं के साथ कोल, किरात, भिल्ल नवयुवतियों को भी प्रेम नायिकाओं की तरह उपस्थित किया है। लेकिन वह गोचारण काव्य सूरदास में श्रेण्य हो गया है। यह हिन्दी की धन्यता है। सूरदास ने चरवाही यानी कृषि में लगी युवा पीढ़ी के पूरे परिवेश को, उसकी मानसिकता को, स्वाधीन चेतना को, सुख दुःख को, औरत मर्द को, संस्कार और गतिशीलता को, रूढ़िग्रस्तता और रूढ़िभंजकता को, सपनों और जागरण को, आकांक्षा और समाज बोध को, व्यक्ति और व्यवस्था को, प्रेम और वेदना को, गरज रिश्ते के तमाम आयामों को खुले में बेबाकी से चित्रित किया है। यह एक पूरा लोकतंत्र है। यदि राम, कृष्ण और शंकर भारतीय मानस द्वारा कल्पित संयम, स्वछंदता का पूर्ण विनियोग सूरदास द्वारा चित्रित वृंदावन समाज में ही हुआ है। यहां जीवन का जो महारास रचा गया है उसमें जीवन परस्पर भी है और परात्पर भी। इस जीवन पद्धति में न कोई बड़ा है, न कोई छोटा, न कोई मालिक न कोई चाकर सब गोसाँई हैं। जाति पांति की अस्वीकृति और नारी पुरुष समता या कहिए नारी की पुनः प्रतिष्ठा तो भक्ति आंदोलन के घोषित कार्यक्रम थे ही। जब छाक आती है तब सब एक साथ मिल बैठ खाते हैं। इस सामुदायिक जीवन के सहयात्री न केवल मनुष्य हैं बल्कि कालिंदी, कदंब, करीलकुंज, गौरी धौरी गायें, पूरा वृंदावन है। देश के संकट काल में जब भी कृष्ण गोवर्धन उठाते हैं तब सभी ग्वाल बाल अपनी अपनी छेकनी लगा देते हैं कि कहीं कान्हा दुर्घटना में न पड़ जाये। इस गोचारण जीवन में सूरदास और उनके सहयोगियों की देशी स्वाधीनता चेतना विकसित हुई है। यहीं आचार्यों का यह आरोप भी दूर हो जाता है कि भक्ति साहित्य हारे हुए भारत की मानसिकता का परिणाम था। स्वाधीन चेतना के इस जन जीवन की बांसुरी जब बजती है, पुस्तकीय बुद्धिजीवियों का ज्ञान गुम हो जाता है, इंद्रासन स्तभित रह जाता है, राजसभा में नाचनेवाली कला (रंभा) मानमर्दित हो जाती है।[7]

         इसी चेतना ने तत्कालीन जनजीवन को भीतर से टूटने से बचाया था, उसके मनोबल को ऊँचा रखा था। भक्त कवि देश की इसी स्वाधीनता के प्रहरी थे, वाणी से आचरण से। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन भक्तों ने दिल्ली के समानांतर वृंदावन में आकर एक सांस्कृतिक लोकतंत्र स्थापित किया था जिसका नायक कोई मुकुटधर नरेश नहीं, मोरपंखियों वाला चरवाहा था और सो भी मात्र आदर्श कलेवर। किंतु वही विग्रह दो सौ वर्षाें तक जन समुदाय के दिलों पर राज्य करता रहा। इस सांस्कृतिक लोकतंत्र के सदस्य हिन्दू मुसलमान, औरत मर्द सब थे, सूर और मीरा, रसखान और ताज।

         भक्तिकाल एक आकस्मिक दैवी चमत्कार का स्थानीय प्रतिफलन मात्र नहीं वरन् परंपरा के पुनराख्यान का एक देशव्यापी अनुष्ठान है। वह सांस्कृतिक आंदोलन ईसाई मत की देन तो नहीं था। जैसा भ्रम ग्रियर्सन को हुआ था, संस्कृति और आदमी की विश्वछवि में ईसाइयत की झांकी भी मिल गई तो क्या आश्चर्य।

         भक्तिकाव्य के बाद हिन्दी में घटित होने वाला रीतिकाल भी हिन्दी की कोई आकस्मिक या अनोखी घटना नहीं है। बल्कि भक्तिकाल के बाद समूचे देश के चिन्तन और साहित्य में श्रंगार और सजावट की जो पतोन्मुख वृत्ति आई थी उसका परिणाम है। क्योंकि तब बंगला में भी दौलत क़ाज़ी और सैयद अलाउल ने 17वीं शताब्दी में भौतिक प्रेमरीति का वर्णन किया था और 18वीं शताब्दी में भारतचंद्र ने और कुछ बाद रामप्रसाद ने काव्य में मूल्य भावना की अपेक्षा कौशल और चमत्कार को महत्व दिया था। मराठी में 17वीं शताब्दी के वामन और रघुनाथ तथा 18वीं शताब्दी के मोरो पंत उन कवियों के प्रमुख स्वर हैं जो संस्कृत के रीति-सिद्धांत से प्रभावित होकर रचना करने चले थे और जिनका लक्ष्य पांडित्य एवं कौशल से पाठक को प्रशिक्षित करना था तथा सिंधी में हो रही सूफियानी कविताओं को गुल और बेदिल ने फारसी काव्यरीति से लैस किया था। इस प्रकार भारतीय वाङ्मय के परिप्रेक्ष्य में अधीत होते ही हिन्दी रीतिकाव्य ने केवल हिन्दी की अविच्छिन्न केंद्रीयता को उजागर करता है बल्कि इसे धारण करने वाली स्थानीय प्रतिभा को प्रमाणित करने वाले इस अद्यावधि अपरिचित तथ्य कोे भी कि रीतियुग के माहौल में भी हिन्दी कावय ही सिरमौर और प्रतिनिधि था।

         19वीं शती के मध्य से भारत की समस्त भाषाओं और साहित्य का आधुनिक काल आरंभ होता है। यह नव जागरण काल ब्रिटिश शासन की देन नहीं है, जैसा कुछ औपनिवेशक मानस वाले इतिहासकार मानते रहे हैं। यह नव जागरण पाश्चात्य संस्कृति और ब्रिटिश शासन की टकराहट से आया। यह जागरण मुक्ति चेतना के इर्द गिर्द उठा था और इस मुक्ति चेतना के साथ साथ भाषा चेतना भी विकसित होती रही। यह अकारण नहीं है कि भारत माता की कल्पना की भूमि बंगाल में ही सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा की कल्पना भी उद्भूत हुई। तत्कालीन नवजागरण के एक अग्रणी राजा राममोहन राय को सुसंस्कृत भारतीय राष्ट्र के हेतु एक अखिल भारतीय भाषा की तलाश थी। 1826 ई० में उन्होंने एक साप्ताहिक पत्र निकाला था ‘बंगदूत’ जिसमें बंगला के अतिरिक्त हिन्दी को भी स्थान दिया गया था। राष्ट्रभाषा की यह चेतना प्रथम बार साकार और सनाम होकर प्रकट हुई ब्रह्मसमाज के प्रकांड नेता केशवचंद्र सेन में, जिन्होंने 1875 में अपने पत्र ‘सुलभ समाचार’ में लिखा कि ‘यदि एक भाषा के न होने के कारण भारत में एकता नहीं होती है तो और चारा क्या है? तब सारे भारतवर्ष में एक ही भाषा का व्यवहार करना ही एकमात्र उपाय है।......इसी हिन्दी को अगर भारतवर्ष की एक मात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाये तो सहज में ही यह एकता सम्पन्न हो सकती है।’ ये केशवचंद सेन ही थे जिन्होंने ऋषि दयानंद को सलाह दी थी कि वे ‘सत्यार्थ प्रकाश’ संस्कृत में न लिख कर जनभाषा हिन्दी में ही लिखें और यह गुजराती ऋषि दयानंद थे जिन्होंने देश विदेश मेें हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार किया और सर्वत्र हिन्दी माध्यम के विद्यालयों की स्थापना करके राष्ट्रभाषा का प्रथम चरण पूरा किया। तभी ‘आनन्द मठ’ के विधाता और वंदेमातरम के रचयिता कवि उपन्यासकार श्री बंकिमचन्द्र चटर्जी भविष्यवाणी करते हैं कि ‘हिन्दी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि हिन्दी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में जो ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेगें वे ही सच्चे भारत बंधु की संज्ञा पाने योग्य होंगे’। उधर राष्ट्रभाषा घोषित होने से पहले ही हिन्दी कुदरती तौर पर भारत की राष्ट्रभाषा बन चुकी थी। अतः आधुनिक भारत के बंधन-मोक्ष की क्रांति का अनल किरीट इसी के माथे पर रखा गया। 1857 की महान् क्रांति की भाषा यही थी। इसी भाषा में बहादुरशाह ने लाल किले का प्रसिद्ध सामरिक भाषण दिया था। तात्या टोपे और कुंवर सिंह के पत्र व्यवहार की भाषा यही थी। इसके बाद तो स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई में हिंन्दी बीहड़ और बियावान से गुजर कर भी रक्षाबंधन की भूमिका निभाती रही। जो आधुनिक हिन्दी के पिता कहे जाते हैं उन भारतेंदु हरिश्चंद्र को जनता ने ‘भारतेंदु’ की उपाधि दी थी और ऋषिकल्प बंकिमचंद्र ने भारतबंधु कहा था। इसीलिए कि उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य को भारत की एकता और जागरण का साधन बनाया था। अपने नाटक में उन्होंने भारत को नायक बनाकर नई चाल का नाटक लिखा और भरतवाक्य में यही आशीर्वाद मांगा कि भारत की भुजाओं में वह बल आए जिससे वह अपना स्वत्व पा सके। वैर फूट बहुभाषण, उपधर्मवाद को वे भारत की दुर्दशा का कारण मानते थे। वे भाषा की एकता को देश की एकता के लिए ज़रूरी समझते थे:

एक भाषा, इक जीव, इक मति के सब लोग,
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।

         इसके लिए वे भाषा के अखिल भारतीय रूप का संधान और निर्माण कर रहे थे। कहीं खड़ी बोली को खड़ा करते, कहीं मध्ययुग से आ रही देशव्यापी रचनाभाषा ब्रजभाषा का पुनरीक्षण करते कहीं रसाल नाम से शेर और गजलों की भाषा की अजमाइश करते, कही संस्कृत, बंगला, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी आदि में रचनाएँ करते। उनके नाटक में मराठी पात्र मराठी भाषा लिए आता है, अफ़ग़ानिस्तानी अपने लहजे लिए। यह ठीक ही कहा गया कि ‘भारतेंदु कर गए भारती का वीणा-निर्माण। जहाँ वे हिन्दी और अंग्रेजी का विनोदपूर्ण मेल करते हैं वहाँ ऐसा लगता है मानो वे भारती को विश्वभारतीय बनाने का उपक्रम रच रहे हैं। यह भी अप्रासंगिक न था। भारतेंदु के समय भारत में एक और संस्कृति आ मिली थी, यूरोप की ईसाई संस्कृति। खुद भारत में अब कुछ नागरिक ईसाई थे।फलतः भारत की संस्कृति और बृहत्तर हुई तथा और अधिक व्यापक दृष्टि की अपेक्षा करने लगी। अतः भारतेंदु जब एकता की बात करते हैं तब इन्हे भी भूल नहीं पातेः

खहु एक कैसे सबें मुसलमान क्रिस्तान।
हाय फट इक हमहि में कारन परत न जान।
तासों सबही भांति है इनकी उन्नति आज।
एकहि भाषा महं अहै जिनकी सकल समाज।

         भारतेंदु वैष्णव थे पर उन्होने आदरपूर्वक क़ुरआन शरीफ का अनुवाद प्रकाशित किया। उन्होने भारतीय महापुरुषों के अतिरिक्त हजरत मोहम्मद, ईसा मसीह, नेपोलियन बोनापार्ट, जार, मेयो आदि पर भी लेख लिखे। लार्ड रिपन की भारत सेवा पर मुग्ध होकर ‘रिपनाष्टक’ लिखा। शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट आफ वेनिस’ का रूपांतरण ‘दुर्लभ बंधु’ शीर्षक से किया। दिलचस्प बात यह है कि भारतेंदु इस नाटक का भारतीयकरण करते हैं, इसके स्थानों और पात्रों के भारतीय नाम रखते है, जैसे वेनिस के लिए वंश नगरख् मोरक्कों के लिए मोर कुटी, बसेनियो के लिए बसंत, अंटोनियों के लिए अनन्त, ग्रेशिअनों के लिए गिरीश, पोर्शिया के लिए पुरुश्री आदि। ऐसा लगता है जैसे वे देशी-विदेशी संस्कृति के कृत्रिम कोटि को अस्वीकार कर विश्व संस्कति के पूरे सौंदर्य को आत्मसात कर लेना चाहते हैं। उनके गुणों पर रीझकर बंगला के युगांतरकारी लेखक माइकेल मधुसूदन दत्त ने अपना एक नाटक भारतेंदु को समर्पित किया था और इंग्लैंड के श्री फे्रडरिक पिनकाट, जो कभी भारत नहीं आ सके, अपने देश से भारतेंदु की प्रशंसा में ब्रजभाषा की कविताएँ लिख लिख कर भेजा करते थे। भारतेंदु मंडल जिस विश्वमैत्री के लिए रहा उसे भारतेंदु के अभिन्न मित्र प्रेमधन इस प्रकार व्यक्त करते हैं।

हिन्दू मुस्लिम जेन फारसी पारसी ईसाई सब जात।
सुखी होंय हिय भरे प्रेमधन सकत भारती भात।।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखः भाग्भवेत्। का भारती आदर्श सर्वत्र चरितार्थ हुआ है।

हिन्दी की छायावादी धारा के कवियों के पद्य और गद्य में भारती संस्कृति की सामासिक गरिमा और उसमें निहित विश्वप्रेम की छवियाँ नाना रूपों में अभिव्यक्त हुई है। जयशंकर प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ का धातुसेन कहता है - ‘अहंकारमूलक आत्मवाद का खंडल करके गौतम ने विश्वात्मवाद को नष्ट नहीं किया। यदि वैसा करते तो इतनी करुणा की क्या आवश्यकता थी। उनके एक अन्य नाटक ‘चंद्रगुप्त’ में संस्कृति पर मुग्ध होकर कहती हैं - ‘यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान की पालना, यह प्रेम की रंगभूमि भारत भूमि क्या भुलाई जा सकती है। कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्म भूमि है, यह भारत मनुष्यता देश की जन्म भूमि है। ‘वह भारत को संस्कृति का अरुण मधुमय देश मानती है, जहाँ जीवन पर मंगल कुंकुम बरसता रहता है, जहाँ पहुँचकर कोई गैरियत महसूस नहीं करता, जहाँ अनजान क्षितिज को भी एक सहारा और लहर को भी एक किनारा मिल जाता है, जिसकी ओर मनुष्य क्या पक्षी भी अपना नीड़ समझकर उड़ आते हैं।

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षिति को मिलता एक सहारा।
लघु सुर धनु से पंख पखारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किये समझ नीड़ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकराती अनन्त की पाकर जहाँ किनारा।

         तभी तो विजेता सिकंदर तलवार खीचे आता है और हदय देकर भारत से जाता है।
         ‘कामायनी’ इस काल की मानसिकता का कालजयी महाकाव्य है। ‘कामायनी’ मानव संस्कृति के आविर्भाव से भारतीय पुनर्जागरण तक के उसके वितान का महाकाव्य है। इसके नायक मनु की कथा में इतिहास इस प्रकार व्यूहित है कि अपनी लंबी पौराणिक ऐतिहासिक यात्रा के अनुभवो, विभ्रमों और समाधान संघर्षो से संपृक्त वह व्यक्ति भी रहता है और मूल रूप में विश्वमानव का प्रतीक भी। मनु उस आदमी का प्रतीक है जो हर मन्वंतर में नए सिरे से इतिहास के उस बिंदु पर जन्म लेता है जब एक पुरानी दुनिया नष्ट हो चुकी होती है और एक नया संसार नई परिस्थितियों के साथ, नई संस्कृति और नए मानव मूल्यों की अपेक्षा करता हुआ उभरने लगता है। तब मन पुरानी अभ्यस्तियों और नई परिस्थितियों के असमायोजन के कारण निर्वासित अनुभव करता है और पुर्नवास की समस्या सर्वप्रमुख होती है। वस्तुतः यह समस्या आज के विश्व मानव की समस्या है जो विज्ञान और तकनीक के अबाधविलास में आत्मनिर्वासित हो गया है। ‘कामायनी’ में मनु को यह पुनर्वास संगिनी श्रद्धा से मिलता है। श्रद्धा संवलित मनु जीने की एक कला पा गए हैं। समरसता की कला। समरसता है तो प्राचीन भारतीय संस्कृति की पहचान किंतु ‘कामायनी’ में उसे विज्ञानविद्ध के परिप्रेक्ष्य में पुनर्व्याख्यायित करके आधुनिक बनाया गया है।
हिन्दी के निर्माण में भारतीय विद्वानों के अतिरिक्त विदेशी मनीषियों ने भी चिरस्मरणीय योगदान किया है। इनमें प्रमुख हैं चार्ल्स विलिकिंस, ड़ॉ गिलक्राइस्ट, ड़ॉ हैनरी थामस कौलब्रुक, कैप्टन रोबक, गार्सा द तासी, ड़ॉ, मोनियार विलियम, ग्राउज, जॉन साहब, जॉन बीम्स, जॉन ब्लाख, जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, ड़ॉ. हार्नले, फ्रेडरिक पिनकाट, ड़ॉ. तेस्सितोरी, रूस के ए.पी. बरान्निकोव, सेवास्तिवा रोदल्फ दालगादी, उफ. ए. की, ड़ॉ, एल. डी. बानेट और भारत को अपना ही देश मानने वाले अभी अभी स्वर्गवासी हुए ड़ॉ. फादर कामिल बुल्के
हिन्दी और भारत तथा शेष संसार की भाषाओं के बीच आदान प्रदान का एक लबा सिलसिला है। कुछ की नजर में तो हिन्दी छायावाद पाश्चात्य स्वच्छंदतावाद का तथा प्रपद्यवाद अस्तित्ववाद का भारतीय प्रारोह है। प्रेमचंद तथा रूस के गोर्की, चीन के लू शुन, हंगरी के जिग्मोंद मोरित्ज, यूरोप की हाडभ्, डिकेंस आदि के उपन्यासों को एक ही जाति का माना जाता है।
हिन्दी आलोचना प्राचीन भारतीय शास्त्र के साथ भारत के बाहर विकसित आलोचना-सिद्धान्तों से संपृक्त हैं और उन सिद्धान्तों से भी अपने साहित्य को परख रहीं है, बल्कि एक अतिरिक्त उत्साह से इसमें खतरे भी हैं जिनसे बचने का एक उपाय यह है कि विदेशी साहित्य को भी एक बार भारतीय साहित्यशास्त्र की कसौटी पर परख कर देखा जाए।
हिन्दी तीसरी दुनिया के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करती और मानती है कि साहित्यकारों की दुनिया सदैव और सर्वत्र एक ही होती है। साहित्य में सबके हित और सबके सहयोग का अर्थ निहित है। हमारा तो सुझाव है कि जब तक बेहतर शब्द न गढ़ा जाए तब तक हर देश में रचना के लिए इसी साहित्य शब्द का व्यवहार किया जाए।
हमारा विश्वास है कि भारत की हर भाषा की अपनी विशेषता है, अपनी सुरभि है। तमिल का संगम साहित्य, तेलुगू का अवधान साहित्य, मलयालम का मणिप्रवालम्, पंजाबी का रम्याख्यान, मराठी का पवाड़ा, गुजराती का फाग, बंगला का मंगलगीत, असमिया का बुरंजगीत, उर्दू की गजल, हिन्दी के भक्तिपद, छायाकाव्य और प्रयोग पद्य भारतीय साहित्योद्यान के अनमोल फूल है। यहीं तो भारत की महादेशीयता है। सब रहे, सब फूलें। अगर एक फूल मुरझाता है तो पूरे उद्यान का सौंदर्य म्लान होता है। यदि हम सभी भाषाओं के इन अनमोल फूलों को एक धागे में पिरो कर भारतीय के गले में डाल सके तो वह ऐसी माला होगी जैसी किसी देश ने कभी तैयार न की होगी। हिन्दी की आकांक्षा अधिक से अधिक यही धागा बनने की है।
हिन्दी को भारत के हर क्षेत्र की मनीषा ने संवारा है और हरप्रदेश की भाषा ने इसे समृद्ध किया है। जिस तरह अपनी साधना से दुर्गा को अवतरित करके देवताओं ने अपने अपने आयुध उसे दिए थे और फलस्वरूप दुर्गा दुर्गतिनाशिनी देवी हुई थी उसी तरह अवतरणकाल से ही हिन्दी को भारतीय भाषाओं के शब्दों के वरदान मिलते रहे है और फलस्वरूप अब हिन्दी के पास गर्व करने योग्य तथा हर स्थिति का मुकाबला करने योग्य शब्द संपत्ति है। हिन्दी सब के प्रति कृतज्ञ है और सामाजिक दायित्व के प्रति सजग है।
जैसे भारत की संस्कृति आर्य, द्रविड़, यक्ष, नाग शक, हूण, आभीर, गुर्जर, पारसी, मुसलमान, ईसाई सब की है वैसे ही हिन्दी भारत में बसने वाले और भारत से जुड़े सभी की हे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोरा परहुअ हंस रहंग् अलि अग पव्वय सरिअ कुरंगम।
    तुज्झह कारण रण्णभभन्ते को णी पुच्छिअ मइं रोअते।।
  2. भइं जानिअं मिलोअणीणिस अरू कोई हरेइ।
    जाव णु णवतलिसामल धाराहरू वरिसेई।।
  3. पुव्वदिसाधवणाह अकल्लोलुग्ग अवाहओ,
    मेहअअंगे णच्चइ सलिलअ जलणि हिणाहओ।
    हंण्सिहंगण्कुकुम संखकआभरणु
    करिमअराउलकसकणकमलक आवरणु।
    वेलासलिलुवेल्लि अहत्यादिणणतालु,
    ओत्थरइ दस दिन संधेविणुवमेहआलु।।
  4. तव्वे सम रसहि मच्झे, णउ सुद्द ण बाम्हण।
  5. उतपति हिन्दू जरणां जोगी अकिल परि मुसलमानी।
    ते राह चीन्हों हो क़ाज़ी मुला बहुमा बिस्न महादेव मानी।
  6. उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धि कर्नाटके गता।
    क्वचित् क्वाचन्महाराष्ट्रे गुर्जर जीर्णतास् गता।
    तत्र घोरकलेयोगात् पाखण्डैः खण्डित गता।
    दुर्बलां चिरं याता पुत्राभ्यां सह मन्दाताम्।
    वृन्दावन पुनः प्राप्य नवीने सुरूपिणी।
    जाताय युवती सम्यक् प्रेष्ठरुपा तु साम्प्रतम्।।
  7. वेद पढ़न भूलि गए ब्रह्मा ब्रहमचारी।
    इन्द्र सभा चकित भई, लगी जब करारी।
    रम्भा को मान मिट्यों, भली नृतकारी।

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
1. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. कर्ण राजशेषगिरि राव
2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
हिन्दी का विकासशील स्वरूप
14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
17. मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी
18. राजभाषा के रूप में हिन्दी का विकास, महत्त्व तथा प्रकाश की दिशाएँ श्री जयनारायण तिवारी
19. सांस्कृतिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास डॉ. त्रिलोचन पांडेय
20. हिन्दी का सरलीकरण आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा
21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
22. जन की विकासशील भाषा हिन्दी श्री भागवत झा आज़ाद
23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
25. हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप प्रो. विजयेन्द्र स्नातक
देवनागरी लिपि की भूमिका
26. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी श्री जीवन नायक
27. देवनागरी प्रो. देवीशंकर द्विवेदी
28. हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या प्रो. प. बा. जैन
29. देवनागरी लिपि की भूमिका डॉ. बाबूराम सक्सेना
30. देवनागरी लिपि (कश्मीरी भाषा के संदर्भ में) डॉ. मोहनलाल सर
31. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी लिपि पं. रामेश्वरदयाल दुबे
विदेशों में हिन्दी
32. विश्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ डॉ. कामता कमलेश
33. विदेशों में हिन्दी:प्रचार-प्रसार और स्थिति के कुछ पहलू प्रो. प्रेमस्वरूप गुप्त
34. हिन्दी का एक अपनाया-सा क्षेत्र: संयुक्त राज्य डॉ. आर. एस. मेग्रेगर
35. हिन्दी भाषा की भूमिका : विश्व के संदर्भ में श्री राजेन्द्र अवस्थी
36. मारिशस का हिन्दी साहित्य डॉ. लता
37. हिन्दी की भावी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा
38. अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद
39. नेपाल में हिन्दी और हिन्दी साहित्य श्री सूर्यनाथ गोप
विविधा
40. तुलनात्मक भारतीय साहित्य एवं पद्धति विज्ञान का प्रश्न डॉ. इंद्रनाथ चौधुरी
41. भारत की भाषा समस्या और हिन्दी डॉ. कुमार विमल
42. भारत की राजभाषा नीति श्री कृष्णकुमार श्रीवास्तव
43. विदेश दूरसंचार सेवा श्री के.सी. कटियार
44. कश्मीर में हिन्दी : स्थिति और संभावनाएँ प्रो. चमनलाल सप्रू
45. भारत की राजभाषा नीति और उसका कार्यान्वयन श्री देवेंद्रचरण मिश्र
46. भाषायी समस्या : एक राष्ट्रीय समाधान श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी
47. संस्कृत-हिन्दी काव्यशास्त्र में उपमा की सर्वालंकारबीजता का विचार डॉ. महेन्द्र मधुकर
48. द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन : निर्णय और क्रियान्वयन श्री राजमणि तिवारी
49. विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का स्थान डॉ. रामजीलाल जांगिड
50. भारतीय आदिवासियों की मातृभाषा तथा हिन्दी से इनका सामीप्य डॉ. लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा
51. मैं लेखक नहीं हूँ श्री विमल मित्र
52. लोकज्ञता सर्वज्ञता (लोकवार्त्ता विज्ञान के संदर्भ में) डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा
53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://amp.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=हिन्दी_साहित्य_में_सामासिक_संस्कृति_की_सर्जनात्मक_अभिव्यक्ति_-प्रो._केसरीकुमार&oldid=622905" से लिया गया