राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में देवनागरी -जीवन नायक  

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लेखक- श्री जीवन नायक

          भारतवासियों को लेखनकला का ज्ञान किस काल में हुआ यह सुनिश्चित नहीं है, किंतु यह निर्विवाद है कि अशोक कालीन भारत (ई. पू. तीसरी शती) में विविध लिपियां प्रचलित थीं। हड़प्पा (दक्षिणी पंजाब) और मोहन जोदड़ो (उत्तरी सिंध) में हुई खुदाई के फलस्वरूप सिंधु सभ्यता के बारे में प्राप्त जानकारी से उस प्रचलित धारणा की पुष्टि नहीं होती भारतीय लेखन पद्धति का सूत्रपात अशोक के राज्यकाल में ही हुआ था। अशोक के शिलालेखों से पहले भी ब्राह्मी में उत्कीर्ण अनेक शिलालेख मिले हैं। फलतः ब्राह्मी लिपि के प्रचलन का समय सुदूर अतीत में चला जाता है। फिर भी यह तो प्रमाणित ही है कि ब्राह्मी लिपि सन् 1837 में लिखी और समझी जाने लगी थी।
          विश्वास किया जाता है कि ब्राह्मी लिपि ब्रह्मा से उद्भूत हुई जो समस्त वाक् और वर्ण समाम्नाय के मूल स्रोत हैं। परंपरागत विश्वास है कि तांडव नृत्य के समय नटराज के डमरू से निकले 14 माहेश्वर सूत्रों से ही संपूर्ण वाक् निस्सृत हुआ। यह भी कहा जाता है कि ये सूत्र धन्यात्मक आधार पर वर्गीकृत थे। बाद में, बुद्ध के पूर्व जन्मे पाणिनि ने, ध्वनियों को स्थान, करण और प्रयत्न के अनुसार व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।
          ब्राह्मी प्राचीनतम भारतीय लिपि है और उसका उपयोग मूलतः संस्कृत के लेखन के लिये किया गया था। अशोक के शिलालेखों में प्राकृत में लिखे ब्राह्मी के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं। अपने विकास क्रम में ब्राह्म लिपि अनेक संशोधनों से अलंकृत हुई।
          वर्तमान भारतीय लिपियों का विकास ब्राह्मी लिपि से ही माना जाता है। उत्तर-पश्चिम भारत में ब्राह्मी के विकसित रूप को शारदा कहा जाता था। कश्मीरी और गुरुमुखी लिपियों के विकास मे शारदा का योग स्वीकार किया जाता है। ब्राह्मी का दूसरा रूप गुप्त लिपि है जो सारे उत्तर भारत में प्रचलित रही और जिससे नागरी (अथवा देवनागरी), राजस्थानी, गुजराती मराठी, उड़िया बंगला, मैथिली और असमियां की लिपियां विकसित हुईं। ब्राह्मी के ही एक परिवर्तित रूप, पल्लव से दक्षिण की चार महान् लेखन प्रणालियां भी विकसित हुईं। अब यह बात स्वीकार की जाने लगी है कि देवनागरी किसी समय भारत की राष्ट्रीय लिपि थी और 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच उसमे उपेक्षित पूर्णता आ चुकी थी।
          स्थान, करण और प्रयत्न के आधार पर पाणिनि के वर्ण समाम्नाय की व्यवस्था इस प्रकार है- कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य ओष्ठ्य, अंतर्मुखी, तालव्य-कंठ्य, अनुनासिक और ऊष्म।
          गुप्त लिपि से अंतर बताने के लिए देवनागरी शब्द का उपयोग 9वीं शताब्दी में प्रचलित हुआ था। देवनागरी का शाब्दिक अर्थ है देव लिपि या वह जो देवताओं की नगरी की हो। यह नगरी प्राचीन पाटिलपुत्र, थी जो आज पटना (बिहार) है। कहा जाता है कि पाटिलपुत्र नगर या शहर के नाते उत्तरोत्तर प्रसिद्धि प्राप्त करता जा रहा था। ऐसी स्थिति में इस नगरी से जो कुछ भी संबद्ध था वह नागर या नागरी था। इसीलिए नागरी लिपि उत्तर की लिपि के नाम से जानी गई। दक्षिण में प्रचलित देवनागरी का प्राचीनतम रूप 8वीं शताब्दी का है। इसे नंदी नागरी कहा जाता है। वाकाटक और राष्ट्रकूट राजाओं की राजधानी नंदीनगर रही है। यह आजकल का नांदेड (महाराष्ट्र) है। देवनागरी और नंदीनगरी अब क्रमशः उत्तर और दक्षिण की लिपियों के लिए व्यवहार में आने वाले नाम हैं।
          भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची मे 15 भाषाएं उल्लिखित हैं। उर्दू तथा सिंधी भाषाओं की लिपियां फारसी लिपि की ही परिवर्तित रूप है; शेष 13 भाषाओं की लिपियां ब्राह्मी की उत्तर या दक्षिण शैली से ही विकसित हुई हैं। अब सिंधी के लिए भी देवनागरी का प्रयोग चल पड़ा है। इसके अतिरिक्त भारत के बाहर नेपाल में नेपाली के लिए देवनागरी का व्यवहार होता है।
          विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच समानता और एकसूत्रता को मानते हुए स्वतत्रता के बाद यह विचार सामने आया कि पूरे देश के लिए एक सामान्य भाषा का माध्यम आवश्यक होगा। यही कारण है कि वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ से ही भारतीय चिंतकों ने समस्त भारतीय भाषाओं के लिए समान लिपि की आवश्यकता पर जोर दिया था। इस प्रकार की विचारधारा का पोषण करने वाले देश के अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्ति ही थे। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने सन् 1850 में यह विचार व्यक्त किया कि नागरी लिपि का व्यवहार अतिरिक्त लिपि के रूप में किया जाना चाहिए। 1857 में स्थापित कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालयों में संस्कृत के लिए देवनागरी लिपि को स्वीकार लिया गया था। फलस्वरूप देवनागरी संपूर्ण देश में संस्कृत के लिए व्यवहार में आने लगी थी।
          पूरे देश के लिए एक सामान्य लिपि की महत्ता न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र ने भी स्वीकार की थी। उन्होंने अपने इस विचार के पोषण के लिए 20वीं शती के प्रारंभ में ‘एक लिपि विस्तार परिषद’ नामक संस्था के तत्वाधान मे और ‘देवनागर’ नामक पत्रिका के माध्यम से यह आन्दोलन चलाया था। 1905 में नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी में भाषण देते हुए लोकमान्य तिलक ने इस बात पर जोर दिया था कि देवनागरी को समस्त भारातीय भाषाओं के लिए एक सामान्य लिपि के रूप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। उन्होंने उस समय यह घोषणा की थी कि यूरोप में प्रचलित सारी लिपियों की तुलना में देवनागरी वर्णमाला कहीं अधिक परिष्कृत है। न्यायमूर्ति वी. कृष्णास्वामी अय्यर अपने समय के विख्यात नयायशास्त्री थे। संस्कृत के विद्वान् होने के अतिरिक्त् वे अपने युग के जाने माने साहित्यकार भी थे। उन्होंने 1810 में इलाहाबाद में आयोजित एक परिषद मे भाषण देते हुए कहा था कि वे पूरे देश के लिए एक सामान्य भाषा के पक्षधर हैं। साथ ही ऐसी भाषा के लिए अपेक्षित लिपि के रूप में देवनागरी लिपि को उसकी वैज्ञानिकता और लोकप्रियता के कारण सहज ही स्वीकार किया जा सकता है।
          पूरे देश के लिए एक सामान्य लिपि (देवनागरी) की आवश्यकता पर गांधीजी का मंतव्य सर्वविदित है। मद्रास में 1937 मे आयोजित भारतीय साहित्य परिषद में भाषण करते हुए गांधी जी ने यह विचार व्यक्त किया था कि देवनागरी के सिवा अन्य किसी भी लिपि में न तो वह ध्वन्यात्मक क्षमता है और न वैसी पूर्णता। उन्होंने यह भी कहा था कि एक से अधिक लिपियों को जानने का बोझा ढोना व्यर्थ है और इससे सहज ही बचा जा सकता है।
          देवनागरी लिपि का व्यवहार राजस्थान से लेकर बिहार तक और हिमाचल प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक है। महाराष्ट्र को छोड़कर इस विशाल क्षेत्र की साहित्यिक भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी के साथ उसकी विविध लिपियां भी देवनागरी के माध्यम से लिखी जाती हैं। मराठी भाषा के लिए प्रयोग में आने वाली देवनागरी का नाम बालबोध है। गुजराती लिपि देवनागरी का क्षिप्र (घसीट) रूप है। शिक्षा साहित्य और सार्वजनिक जीवन में हिन्दी का व्यवहार करने वाले सभी लोग देवनागरी लिपि जानते हैं। ऐसे लोगों की संख्या जो अपनी मातृभाषा के देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं, उन लोगों से कहीं अधिक है जो अन्य किसी भारतीय लिपि का व्यवहार करते हैं। देवनागरी लिपि उत्तर और दक्षिण की लिपियों के बीच सेतु का ही काम नहीं करती, बल्कि भारतीय आर्य तथा द्रविड़ भाषा परिवारों को भी जोड़ती है।
          स्ववतंत्रता के बाद भारत सरकार ने हिन्दी के प्रचार और विकास की अनेक योजनाएं हाथ में लीं थीं। यह आवश्यक समझा गया था कि हिन्दी वर्तनी और वर्णमाला का मानक स्वरूप स्थिर कर दिया जाए ताकि टाइपराटर और टेलीप्रिंटर की कुंजियों के निर्धारण में सहायता मिले और विभिन्न भारतीय भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए देवनागरी में उपयुक्त प्रतीकों का समावेश किया जा सके। परिणामस्वरूप देवनागरी लिपि में सुधार की आवश्यकता जान पड़ी, उसके वर्णों के मानक स्वरूप स्थिर करना ज़रूरी हो गया ताकि टाइपराइटिंग और मुद्रण की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।
          देवनागरी लिपि के सुधार का प्रश्न सरकार और संस्थाओं के अतिरिक्त अनेक विद्वानों का भी ध्यान काफ़ी समय से आकर्षित करता रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर 1953 में उसी विचार मे एक परिषद का आयोजन किया था जिसमें देवनागरी लिपि में सुधार के कुछ सुझाव दिए गए थे। अगले चार वर्षों अर्थात् 1857 तक उत्तर प्रदेश सरकार ने परिषद की सिफारिशों को कार्यान्वित करने में व्यावहारिक कठिनाइयों का अनुभव किया और अक्टूबर 1957 में लिपि सुधार की दूसरी परिषद आमंत्रित की। 1957 की परिषद ने पिछली बैठक की सिफारिशों को दोहराया और कुछ नए सुधार सुझाए। अंततः भारत सरकार ने इस मामले पर पुनर्विचार किया और यह निश्चय किया गया कि परामर्श के लिए विशेषज्ञों की एक परिषद बुलाई जाए। 1953 और 1957 में लखनऊ में हुई इन दोनों परिषदों की सिफारिशों पर अगस्त 1959 में आयोजित शिक्षामंत्रियों के सम्मेलन में विचार किया गया और कुछ स्पष्टीकरण के साथ उन्हें स्वीकार कर लिया गया।
          देवनागरी लिपि में सुधार संबंधी रिपोर्ट का अनुमोदन करते हुए भारत सरकार ने 1959 में यह निश्चय किया था कि आधुनिक भारतीय भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियों कोे व्यक्त करने के लिए देवनागरी लिपि में अतिरिक्त चिन्ह और प्रतीक जोड़ना आवश्यक है और यह काम अबिलंब हाथ में लिया जाना चाहिए। इस निश्चय के अनुसार 1960 में भाषाविदों की एक समिति गठित की गई थी ताकि विभिन्न आधुनिक भारतीय भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियों का अध्ययन किया जा सके और उन्हें व्यक्त करने के लिए देवनागरी लिपि में प्रतीक आदि जोड़े जा सकें। राष्ट्रीय एकीकरण के प्रश्न पर विचार करने के लिए अगस्त 1961 में दिल्ली में आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में यह बात सर्वसम्मति से स्वीकार की गई थी कि सारी भारतीय भाषाओं के लिए एक सामान्य लिपि न केवल आवश्यक है, बल्कि राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए वांछनीय भी है। भारत की वर्तमान स्थिति में उनेक मतानुसार देवनागरी ही एक मात्र ऐसी लिपि है।
          जवाहरलाल नेहरू का विचार था कि भारत की सारी भाषाओं के लिए किसी न किसी दिन एक सामान्य लिपि को प्रोत्साहित करना होगा। उन्होंने यह मत भी व्यक्त किया था कि समस्त भारत के लिए जो सामान्य लिपि स्वीकार की जाए वह संबंधित लिपियों को हटाने के विचार से न होकर उनके लिए अतिरिक्त लिपि के रूप में स्वीकृत मानी जाए। ऐसी स्थिति में देवनागरी को समस्त भारतीय भाषाओं के लिए एक अतिरिक्त लिपि के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, ताकि एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र की भाषाओ से अपना परिचय सरलतापूर्वक बढ़ा सकें। अंततः वास्तविक कठिनाई भाषा की न होकर लिपि की है।
          भाषाविद् समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट जून, 1965 में प्रस्तुत की थी। इस भारत सरकार ने 1966 में अंतिम रूप देकर स्वीकार किया था। समिति की सिफारिशों की व्यावहारिकता को स्पष्ट करने के लिए भारत की प्रत्येक साहित्यिक भाषा का एक पाठांश परिवद्धित देवनागरी मे लिप्यंतरित कर समिति की शेष सिफारिशों के साथ प्रकाशित किया गया था। तमिल, मलयालम, तेलुगु, कन्नड़, बंगला, उर्दू आदि में लिखित पाठांश को परिवर्द्धित देवनागरी मे मुद्रित करने का अभिप्राय यह था कि समसत भारत के नागरिकों के बीच इन भाषाओं की लोकप्रियता को बढ़ावा मिले (परिवर्द्धित देवनागरी, देखिए लेख के अंत में)।
          यह सर्वमान्य है कि ज्ञान के द्रुत विकास के लिए राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि को तत्काल स्वीकार कर लेना चाहिए। देवनागरी का आधार लेकर एक वैज्ञानिक ध्वन्यात्मक लिपि को अंतिम रूप दिया जा सकता है और वांछित संशोधनों के साथ विद्यार्थियों के लिए व्याकरण और क्रमिक पाठ्य सामग्री तैयार करने के लिए उसे काम में लाया जा सकता है। लगभग 3000 वर्षों से व्यवहार में आने वाली लिपि में सुधार सुझाते समय इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले विशेषज्ञों और इस अभिप्राय से गठित समितियों ने इस बात का संकेत लगातार दिया है कि यह काम कितना जटिल है। इसे सुलझाने के लिए केवल साहित्यिक और ध्वन्यात्मक पक्ष पर ही बल देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि समस्त भाषाभाषी समाज में मनोवैज्ञानिक स्तर पर इस संबंध में क्या कठिनाइयां सामने आएंगी। इस दिशा में जल्दबाजी में उठाए गए किसी भी कदम से भ्रम उत्पन्न हो सकता है जो न केवल विशुद्धवादियों के बीच विवाद बन सकता है, बल्कि उन लोगों के लिए भी उलझन पैदा कर सकता है जो हिन्दी भाषा के प्रेमी हैं।
          देवनागरी पहले पहल यूरोप में 1667 में प्रयोगात्मक आधार पर ढाले गए थे और देवनागरी टाइपों की एक किताब अथनासी रिकरचेरी द्वारा प्रकाशित की गई थी लगभग उसी समय अमस्टरडम से देवनागरी बारहखड़ी प्रकाशित की गई थी और इसके लिये ब्लाकों का उपयोग किया गया था। बाद में 1771 में ज्योवन्नी क्रिस्तोफोर अपादुत्सी और कामिआनुस बेलिगाती ने रोम में ‘अलफाबेतुट्रस, ब्राह्मिनीकुम, स्यू इंदोस्तानुस, उनिवर्सितातिस कासी’ प्रकाशित किया था। इस प्रकाशन में पहले पहल देवनागरी के चल टाइप प्रयोग में लाए गए थे। भारत में नागरी और बंगला टाइप बनाने का श्रेय प्रथमतः चार्ल्स विलकिंस और पंचानन कर्मकार को मिलता है। पंचानन कर्मकार ‘पंचकटर’ (छापा काटने वाले) थे। विलकिंस ने संस्कृत के टाइप भी ढाले थे। बाद में पचानन ने 700 देवनागरी टाइपों की एक सुंदर माला तैयार की थी। यह काम 19वीं शती के प्रारंभ में सैरामपुर मिशन के विलियम कैरी की सहायता से पूरा किया गया था। पहला देवनागरी टाइप फाउंड्री सेरामपुर में 1980 में स्थापित की गई थी। इस फाउंड्री ने देवनागरी टाइप संबंधी सभी मांगे पूरी की थी; यहां तक कि बंबई की मांगे भी। भारत में भारतीय भाषाओं का सबसे पहला मुद्राणालय बंबई में 1812 में स्थापित किया गया था। इस प्रेस से 1814 में मराठी पंचांग प्रकाशित हुआ था और यही पुस्तक भारत में मराठी में प्रकाशित पहली पुस्तक थी। अमेरिकन मिशन प्रेस, बंबई में 1860 में स्थापित हुआ था। इसके मैनेजर टामस ग्राहम ने जीवन बल्लभ नामक ‘पंचकट’ के सहयोग से 1838 में मराठी, देवनागरी और संस्कृत के टाइप तैयार किए थे। जाओजी दादाजी द्वारा 1864 में पहली बार निर्णय सागर प्रेस नामक फाउंड्री स्थापित की गई थी।
          आज लगभग दो दर्जन फाउंड्रियां हैं जो 8 प्वांइट से लेकर 72 प्वाइंट तक के टाइप तैयार करती हैं। 8, 10 और 12 प्वाइंट देवनागरी टाइप समाचार पत्रों तथा पठन सामग्री मे काम आते है। 14 और 16 प्वाइंट टाइप नवसाक्षरों के लिए और 20, 24, 36 और 48 प्वाइंट टाइप शीर्षको और विज्ञापनों में काम आते हैं
          भारत सरकार के मुद्रण और डिजाइनिंग के राष्ट्रीय पुरस्कार 1855 में शुरू किए गए थे। इनमें देवनागरी टाइप के लिए विशेष पुरस्कार की व्यवस्था है। वर्तमान शताब्दी के आरंभ से देवनागरी लिपि को यांत्रिक कंपोजिंग यंत्रों के उपयुक्त बनाने का प्रश्न विद्वानों, लिपि सुधारकों और मुद्रकों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। लिपि सुधारकों के काम की तीन दिशाएं हैं
(अ) देवनागरी लिपि को इस प्रकार परिष्कृत करना कि उसके माध्यम से समस्त स्वनिमों अर्थात अर्थ भेद ध्वनियों (विदेशी शब्दों में प्रयुक्त स्वनिमों को भी) सुरुचि पूर्ण ढंग से चित्रित किया जा सके
(आ) स्वरों और व्यंजनों को जोड़ने की वर्तमान प्रणाली में इस प्रकार सुधार करना कि सेटिंग की क्रिया प्रणाली से बचा जा सके और संयुक्त रूपों को इस प्रकार तैयार करना कि टाइपों की संख्या में कमी की जा सके और
(इ) यांत्रिक कंपोजीशन में वांछित सुविधा के लिए शिरोरेखा के ऊपर के लिपि चिन्हों अथवा मात्रा चिन्हों के साथ या उनके बिना टाइप सांचों को ढलने की वर्तमान प्रणाली को परिवर्तित किया जा सके।
          देवनागरी वर्णों को तिर्यक रूप में विखंडित करने के एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है, ताकि खड़ी पाई वाले, बिना खड़ी पाई वाले अथवा लघु खड़ी पाई वाले वर्गों के लिए एक से स्वर चिन्हों का प्रयोग संभव हो सके।
          विगत एकाधिक शताब्दियों के बीच देवनागरी के उपर्युक्त विकास क्रम का ऐतिहासिक महत्व है तथापि इस वृतांत से विभिन्न भाषाओं के विशिष्ट वर्गों और उनकी ध्वन्यात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए और उन्हें विविध प्रकार के कंपोजिंग उपकरणों (जिनमें फोटो सेटर आदि सम्मिलित हैं) पर प्रतिष्ठापित करने के उद्देश्य से वर्तमान नागरी वर्णमाला के संशोधन पविर्धन में विशेष सहायता नहीं मिलेगी। इस प्रश्न पर विशेषज्ञ की विचार कर सकते हैं, परामर्श दे सकते हैं और अब तक जो कुछ किया जा चुका है उसके प्रकाश में अपेक्षित निर्णय ले सकते हैं। यहां उनका ध्यान केवल इस तथ्य की ओर आकर्षित करने का उद्देश्य है कि जब से नागरी लिपि का प्रादुर्भाव हुआ तब से उसे एक ऐसे माध्यम के रूप में अपनाया गया है जिसके द्वारा व्यापक सांस्कृतिक मूल्यों को समझने और आंचलिक परंपराओं को समृद्ध करने में सहायता मिलती रही है।
          'लिंग्विस्टिक इंप्लीकेशनस आॅफ कंप्यूटर बेस्ड इन्फर्मेंशन सिस्टम्स' पर एक संगोष्ठी विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में नवंबर 1978 में दिल्ली में आयोजित की गई थी। भारतीय लिपियों की संरचना से संबंधित सामान्य प्रश्नों पर विचार विमर्श के साथ इस संगोष्ठी में यह विचार भी किया गया था कि भारतीय लिपियां किस प्रकार और किस सीमा तक कंप्यूटर द्वारा निरुपणीय है। इस अवसर पर इन पंक्तियों के लेखक ने सविस्तार और सहोदाहरण विवेचन से यह स्पष्ट किया था कि भारत सरकार द्वारा 1961 में गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के प्रकाश में और लाइनोटाइप पाॅल लि. लंदन द्वारा निर्मित, वी. आई. पी लाइनोटाइप मार्टनलेथर के ‘फांट’ के विशेष संदर्भ में 'फोटो कंपोजिंग' के लिए देवनागरी वर्ण संयोजन (हाइफनेश) किस तरह किया जा सकता है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उक्त यंत्र की सार्थक और निरर्थक कुंजियां कौन कौन सी हैं।
          अस्तुु आशा है, कंप्यूटर के माध्यम से देवनागरी के निरूपण में उक्त विवेचन से सहायता मिलेगी और देवनागरी के उत्तरोत्तर व्यापक प्रयोग की भूमिका प्रशस्त होगी।

परिवर्धित देवनागरी

देवनागरी में नवीन प्रतीकों का समावेश

देवनागरी लिपि को अखिल भारतीय लिपि का स्वरूप और क्षमता देने के उद्देश्य से उसमे हिन्दीतर भाषाओं की उन विशिष्ट ध्वनियों के लिए नवीन प्रतीकों का समावेश कर दिया गया है जो अब तक उसमें नहीं थे।

  1. मराठी, गुजराती, असमिया , बंगला, पंजाबी और उड़िया भाषाओं के लिपिग्राम के समान ही हैं अतः उनके संबंधों में अक्षरशः लिप्यंतरण पर्यात होगा।
  2. तमिल, तेलुगु , मलयालम, कन्नड़, कश्मीरी और सिंधी भाषाओं में देवनागरी से भिन्न या अतिरिक्त लिपिग्राम हैं, अतः उनकी विशिष्ट ध्वनिओं के लिए नीचे दिए अनुसार संकेत चिन्ह अपनाए जाएंगे।
विशिष्ट ध्वनि
स्वर अक्षर रूप मात्रा रूप
(1) दक्षिण भारत की चार भाषाओं तथा कश्मीरी भाषा के हृस्व ‘ए’ और ‘ओ’ ऐं ओ े ो
(2) कश्मीरी भाषा के विशिष्ट स्वर ‘अ’ ‘आ’ और ‘उ’ ‘ऊ’ अ आ

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
क्रमांक लेख का नाम लेखक
हिन्दी और सामासिक संस्कृति
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2. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति प्रो. केसरीकुमार
3. हिन्दी साहित्य और सामासिक संस्कृति डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर
4. हिन्दी की सामासिक एवं सांस्कृतिक एकता डॉ. जगदीश गुप्त
5. राजभाषा: कार्याचरण और सामासिक संस्कृति डॉ. एन.एस. दक्षिणामूर्ति
6. हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास प्रो. दिनेश्वर प्रसाद
7. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति डॉ. मुंशीराम शर्मा
8. भारतीय व्यक्तित्व के संश्लेष की भाषा डॉ. रघुवंश
9. देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति में हिन्दी का योगदान डॉ. राजकिशोर पांडेय
10. सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और हिन्दी साहित्य श्री राजेश्वर गंगवार
11. हिन्दी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व डॉ. शिवनंदन प्रसाद
12. हिन्दी:सामासिक संस्कृति की संवाहिका श्री शिवसागर मिश्र
13. भारत की सामासिक संस्कृृति और हिन्दी का विकास डॉ. हरदेव बाहरी
हिन्दी का विकासशील स्वरूप
14. हिन्दी का विकासशील स्वरूप डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
15. हिन्दी के विकास में भोजपुरी का योगदान डॉ. उदयनारायण तिवारी
16. हिन्दी का विकासशील स्वरूप (शब्दावली के संदर्भ में) डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया
17. मानक भाषा की संकल्पना और हिन्दी डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी
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21. प्रशासनिक हिन्दी का विकास डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
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23. भारत की भाषिक एकता: परंपरा और हिन्दी प्रो. माणिक गोविंद चतुर्वेदी
24. हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय एकीकरण प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव
25. हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका विकासशील स्वरूप प्रो. विजयेन्द्र स्नातक
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49. विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का स्थान डॉ. रामजीलाल जांगिड
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51. मैं लेखक नहीं हूँ श्री विमल मित्र
52. लोकज्ञता सर्वज्ञता (लोकवार्त्ता विज्ञान के संदर्भ में) डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा
53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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