हिन्दी में लेखन संबंधी एकरूपता की समस्या -प. बा. जैन  

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लेखक- प्रो. प. बा. जैन

          हिन्दी को कालासह बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि इसकी रचना व्याकरण विरुद्ध न हो इसमें सिर्फ ऐसे शब्दों का प्रयोग हो, जो विशेष व्यापक हों अर्थात् जिन्हें अधिक प्रांतों के आदमी समझ सकें। देश भर में एक भाषा होगी या नहीं और होगी तो कब होगी, यह निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता। परंतु तब तक हिन्दी को अधिक व्यापक बनाने में लाभ है।[1]
          आज से लगभग आठ दशक पूर्व युग प्रवर्तक आचार्य द्विवेदी के उक्त अभिमत की उपादेयता आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। हिन्दी अपनी सीमाओं को लांघती निरंतर व्यापक होती जा रही है, इसकी इस प्रक्रिया को सहज व सुगम बनाने के सतत प्रयत्न होते रहने चाहिए। व्यापकता किसी सीमा तक विविधता को भी साथ लाती है, जिसे हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुरूप एकरूपता साधने के प्रयास भी वांछनीय हैं। जब बोली से भाषा और भाषा से साहित्य व लेखन की भाषा बनती है तब सुबोधता एवं स्पष्टता सर्वाधिक काम्य हो जाती है। एकरूपता का अभाव इसमें बाधक सिद्ध होता है।
          आज हिन्दी का अहिन्दी भाषी क्षेत्र में व्यापक अध्ययन अध्यापन होता है। उनकी कठिनाइयों को समझा जाना चाहिए। वर्ण विन्यास की अविचारित विविधता अध्ययनकर्ता को बहुत परेशानी में डालती है। अतः भाषा में लेखन संबंधी जितनी सुविचारित एकरूपता होगी उतनी वह सीखने समझने के लिए सुगम हो सकेगी।
          भाषा को बहता नीर कहा गया है, बड़ी ही सार्थक अभिव्यक्ति है यह। प्रवाह में बहुत सारे झाड़ झंखाड़ एवं अनगड़ शिलाखंड आ मिलते हैं जो उसे रास आ जाता है, वह तो सुडौल बनकर उसका अंग बन जाता है और जो प्रवाह से एकरूप नहीं हो पाता उसे प्रवाहतरों को समर्पित कर आगे बड़ जाता है। हिन्दी के संबंध में यह बात बहुत अच्छी तरह देखी जा सकती है। भारतेंदु युग से विकसित होता इसका स्वरूप कई अवस्थाओं को पार कर परिष्कृत एवं व्यवस्थित होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। जीवंत भाषा में परिवर्तन परिवर्धन की प्रक्रिया सतत चलती रहती है और उसकी प्राणवत्ता को प्रकट करती है, पर यह प्रक्रिया चर्चा, संवाद एवं सहमति से सुविचारित रूप में होनी चाहिए।
          आज हिन्दी में अनेक क्रियारूप, अव्यय, विशेषण आदि की वर्तनी के एक से अधिक रूप प्रचलित हैं- कहीं कहीं यह रूप तीन तीन, चार चार भी हैं। यह स्थिति सभी के लिए पर ख़ास कर अहिन्दी भाषाभाषी के लिए बड़ी उलझन भरी होती है। हिन्दी में कुछ प्रकार की क्रियाओं व अन्य पदों के लेखन में बहुरूप प्रचलित है- यथा ‘आना’ क्रिया का समान्य भविष्यकालिक रूप ‘आयेगा आएगा’-आवेगा। इसी प्रकार चाहिए-चाहिये, नयी-नई, इसलिए-इसलिये आदि शब्द हैं। इन पर चर्चा हो भाषा की प्रकृति के अनुरूप रूप विशेष स्थिर कर उसी का सर्वत्र प्रयोग होना चाहिए। एकरूपता निर्धारित करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। एकरूपता निर्धारित करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उसका संबंधित अन्य पक्षों स्थितियों पर भी क्या प्रभाव पड़ना संभव है। ऊपर के उदाहरण को ही लें-‘आना’ क्रिया के भूतकालिक व भविष्यकालिक कृदंत के रूप निर्धारण के समय इस बात पर भी विचार कर लेना सम्यक होगा कि उस क्रिया के विध्वर्थ (अज्ञार्थक) इच्छाबोधक स्वरूप क्या होंगे। यदि समय दृष्टि का अभाव रहा तो मानकीकरण एकरूपता के लिए सहयोगी सिद्ध न हो पाएगा।
          लेखनी संबंधी एकरूपता के आधारभूत तत्व हैं- भाषा की अपनी प्रवृत्ति, उच्चारण एवं व्यावहारिक सुविधा। उच्चारण महत्वपूर्ण तत्व है, किंतु भाषा की प्रवृत्ति के अनुरूप व्यावहारिक सुविधा के समक्ष उसका कहीं पालन न होता हो ता अनावश्यक रूप से दुराग्रही होने की स्थिति से बचना ही श्रेयस्कर होगा। इस संबंध में ‘प्रयोग और प्रयोग’ के वैयाकरण डॉ. वी. रा. जगन्नाथ का अभिमत सम्यक प्रतीत होता है:
          ‘वर्तनी के लिए उच्चारण का आधार लेना उचित है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वर्तनी के मानकीकरण का आधार अकेले उच्चारण हो। वर्तनी के अपने नियम भी बन सकते हैं और वर्तनी की अपनी परंपरा भी हो सकती है। यह आवश्यक है कि वर्तनी में एकरूपता तथा सुगमता के गुण हों और उच्चारण के संबंध में यह बात सिद्ध न हो तो उच्चारण का सहारा छोड़ना भी उचित होगा।[2]
          क्रियापद भाषा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक होता हे, वस्तृतः यही भाषा की पहचान कराता है। हिन्दी में लेखन संबंधी अराजकता सबसे अधिक क्रिया को लेकर ही है। जिन क्रियाओं का सामान्य भूतकालिक कृदंत ‘यकारांत’ है - उनके काल व अर्थ संबंधी विविध रूप, उनकी संयुक्त क्रियाएं संज्ञारूप आदि के लेखन में द्विविध अथवा अधिक रूप प्रचलित हैं। उदाहरणार्थ-आकारांत धातु ‘आ’ में वर्तमानकाल का ‘त’ प्रत्यय लगा, तो पुं वर्ग प्रत्यय ‘आ’ उसमें आ लगा आ + त + = आता।
          इसी तर भूतकाल का ‘य’ प्रत्यय आने पर आय + आ = आया आदि पद चलते हैं। बिना संधि के ‘आतया है’ ‘आयआ है’ नहीं चलते। हिन्दी की बहुसंख्यक क्रियाओं के ख़ासकर यौगिक क्रियाओं के सामान्य भूतकालिक कृदंत का प्रथम एकवचन रूप ‘याकारांत’ होता है। ‘याकारांत’ के ही फिर भिन्न भिन्न दशाओं में अन्य रूप बनते हैं। यथा
(क) आया-आयी-आये। समान्य भविष्य काल में आयेगा-आयेगी-आयेंगे।
‘य’ लुप्त मानन पर भविष्यकाल में
(ख) आया-आई-आए (भूतकाल में) आएगा-आएगा-आएंगे
(ग) आयगा-अयगी-आयँगे
(घ) आवेगा-आवेगी-आवेंगे
(ग) व (घ) के रूप प्रचलन से बाहर होते जा रहे है। ‘आय’ रूप इच्छा बोधक एकवचन में चलता है यथा राम आय ? हरीश जाय ? सीता गाना गाय ? (क) के अंतर्गत क्रिया के सामान्य भूतकालिक कृदंत की प्रथम अवस्था आधार रूप में ग्रहणकर क्रमशः ‘इ’ ‘ए’ प्रत्यय जोड़कर सामान्य रूप में स्वीकृत हैं। (ख) के अंतर्गत प्रथम रूप को छोड़कर शेष में य को लोप स्वर प्रधान ‘ई’ ‘ए’ के रूप ग्रहण किए गए हैं। इसके पूर्व कि ‘य’ प्रधान रूपों के पक्ष में अपने मत का प्रतिपादन करें, स्वर प्रधान रूप के पक्षधरों जिनमें प्रमुखतम हैं आचार्य प्रवर किशोरीदास वाजपेयी का मत जान लें।
1. प्रत्यक्ष का (या प्रत्यादेश का) ‘य’, इ-ई तथा ए में मिलने पर विकल्प से लुप्त हो जाता है- सवर्ण प्रबल स्वर निर्बल व्यंजन को दबा देता है इसीलिए गए-गये, आए-आये, लाए-लाये तथा गई-गयी, आई-आयी, लाई-लायी यों द्वि विविध रूप होते हैं।[3]
2. अकारांत धातु न हो तो कभी कभी ‘इ’ का ‘य’ हो जाता है। ...........परंतु जाये सर्वथा गलत है। ‘इ’ का ‘ए’ होगा या फिर ‘य’। दोनों चीजें नहीं हो सकतीं। ‘जाय’ तथा जाए का संकर रूप है ‘जायें’ इसी प्रकार, संकर है, गलत है।[4]
3. यदि धातु दीर्ध इकारांत हो तो (धातु के) ‘ई’ का विकल्प से ‘इय’ हो जाता है और इस ‘इय’ के ‘य’ का विकल्प से लोप हो जाता है। जी ए = जिय् + ए = जिये[5] और ‘इ’ का जब ‘इ’ का जब ‘इय’ होगा ही नहीं तब ‘जीए’ इसी तरह ‘पी’ के लिये, पिए, पीए ‘सी’ के सिये, सिए, सीए[6]
4. विधि अर्थ प्रकट करने के लिए हिन्दी में ‘इ’ प्रत्यय होता है, जो संस्कृत के ‘इय’ के ‘य’ का उड़ाकर बनाया जान पड़ता है। यथा पढ़ + ई = पढ़े सो + इ = सो, गा + इ = गाए आदि[7]
5. ‘इ’, ‘ई’ और ‘ए’ के साथ मिलने पर ‘य’ की स्पष्ट श्रुति नहीं होती[8]
6. हिन्दी के जायसी, कबीर, सूर, तुलसी आदि ने ‘आई’, ‘आए’ जैसे प्रयोग ही किए है, ‘य’ का नित्य लोप करके[9]
7. आकारांत धातुओं में:‘य’ रहता ही है[10]
8. ‘आये’ ‘आयी’ और ‘आए’ - आई यों दोनों तरह की वर्तनी (प्रयोग) शुद्ध है। परंतु दोनों में से एक ही अभीष्ट अपेक्षित हो-एकरूपता चाहिए। तो फिर ‘आए’ - ‘आई’ और ‘रोए’ - ‘रोई’ जैसे प्रयोग ही रहेंगे, आये, आये आयी आदि नहीं, क्योंकि ली, दी, पी, आदि क्रियाओं में ‘य’ का लोप अनिवार्य है।[11]
आचार्य वाजपेयी के उक्त उद्धरणों से यह तो सहज ही प्रकट है कि याकारांत भूतकालिक कृदंत के क्रियारूपों में वे स्वरांत व्यवस्था रखने के पक्ष में है। आचार्य के मत में व्याकरणिक स्थिति का आग्रह आधि है, भाषा की सहज प्रवृत्त एवं व्यावहारिकता की चिंता कम।
स्वरांत के पक्ष में उनकी व्याकरणिक स्थिति भी अनिश्चितता से लदी हुई है। कभी कभी जान पड़ता है वैकल्पिक लोप का ईकारांत के क्रियारूपों में त्रिविध में रूप की स्थिति किसी भी तरह व्याकरण की स्पष्ट व्यवस्था को नहीं दर्शाती।
          ‘इ’, ‘ई’ और ‘ए’ के साथ मिलने पर ‘य’ की स्पष्ट श्रुति नहीं होती। यदि वास्तविकता यह है तो फिर हमें स्थायी को स्थाई ‘उत्तरदायी का ‘उत्तरदाई’ ‘गायें को ‘गाएं तथा ‘वाजपेयी’ को वाजपेई लिखना होगा। पर आचार्य स्वयं इस मत के हैं कि गाय का बहुवचन गायें होगा ही नहीं। विशेषण में ‘य’ का लोप और संज्ञा में उसका प्रयोग (वर्तनी पृ. 48) एक ही तरह की स्थिति में ‘विकल्प’ का कार्यशील होना जटिलता एवं अस्पष्टता को बढ़ाता है।
          हिन्दी के प्राचीन कवियों के संबंध में उनका कथन अल्पांश में ही सत्य है केवल अवधी भाषा में लिखी जायसी व तुलसी की (मानस) कृतियों के संबंध में ही सत्य है। कबीर, सूर, ही नहीं, अमीर खुसरो, गोरखनाथ एवं स्वयं तुलसी की मानसेतर रचनाओं में, ‘इकारांत’ ‘यीकारांत’ तथा एकारांत-येकारांत दोनों रूपों में प्राप्त होते हैं। अतः यह धारणा सम्यक नहीं है कि पूर्ववर्ती हिन्दी कवि एकांत रूप से ‘इकारांत’ अथवा ‘एकारांत’ क्रियाओं का ही प्रयोग करते थे। आचार्य वाजपेयी स्वयं आयी-आये, गयी-गये को शुद्ध स्वीकारते है। और विकल्प से इनके प्रयोग विरुद्ध भी नहीं हैं। परंतु एकरूपता के लिए एक ही रूप स्वीकारने में उनका रुझान स्वरांत के पक्ष में है।
          आकारांत धातुओं में ‘य’ की स्थिति वे स्वीकार करते ही हैं वहां विकल्प से लोप की भी कल्पना नहीं की जा सकती।
          आकारांत ही नहीं ‘ईकारांत’ ‘एकारांत तथा ओकारांत धातुओं में भी ‘य’ है।
यथा- पी- पया, सी-सिया, जी-जिया
दे-दिया, ले-लिया, खें-खैंया
सो-सोया, रो-रोया, बो-बोया आदि
          हिन्दी की क्रिया की प्रवृत्त एवं पद्धति पर समझतः हमारे सामने जो स्थिति आती है वह भूत कालिक कृदंत के एकवचन के प्रथम रूप को आधार बनाने के पक्ष में आती है। हिन्दी की अधिकांश क्रियाओं के कोई न कोई रूप ‘य’ का दामन थामें दिखाई देते हैं। इच्छाबोधक रूप आय, जाय, कहाय, बताय, जगाय आदि। संयुक्त क्रिया के रूप बेचा गया है। जाया करता है। बुला लाया।
चल दिया। देख नहीं पाया। मन मसोसकर रह गया आदि।
          हिन्दी में प्रथम रूप को आधार बनाकर पदों के रूप परिवर्तन की पद्धति सर्वत्र दृष्टिगोचर होती हैः
संज्ञा -लड़का -लड़की -लड़के
सर्वनाम -तुम -तुझे -तुम्हारे
-मेरा -मेरी -मेरे
विशेषण -प्यासा -प्यासी -प्यासे
-अच्छा -अच्छी -अच्छे
अव्यय -कैसा -कैसी -कैसे
क्रिया -पढ़ा -पढ़ी -पढ़े
प्रथमावस्था को आधार बनाने की यह स्थिति एकांतिक रूप से हिन्दी में ही हो ऐसी बात नहीं है, अन्य भारतीय भाषाओं में भी समान रूप से प्राप्त है।
ब्रज- सखा- सखी- सखियन
राजस्थानी- छोरा- आयो छोरी आयी छोरा आया
पंजाबी- साडा (मेरा) साडी- साडे
होया- होई- होए
गुजराती- ले ग्यो- पेली गयी ले गया
आख्या- आखी- आख्या
मराठी- तो गेला- ती गेली- ते गेले (गये)
         भारतीय भाषाओं के इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि व्यापकता की दृष्टि से प्रथमावस्था को ही मानकीकरण का आधार बनाना सम्यक है। हिन्दी की ‘अकारांत’, ‘इकारांत’, ‘एकारांत’ तथा ‘ओकारांत’ धातुओं का सामान्य भूतकालिक रूप याकारांत है यथा- खाया, पिया, खोया।
अतः क्रिया के अन्य रूपों के लिए यथा आवश्यक उसे ही मानक माना जाए जिसके क्रम रूप प्राप्त होंगे।
आया-आयी-आये आयेंगे आदि
आया-आई-आए-आएंगे नहीं
अधिक स्पष्टीकरण के लिए एक क्रिया पद को सारी संगत स्थितियों में प्रयुक्त कर प्रस्तुत किया जा सकता है ताकि समग्रता लक्षित हो सके।
धातु: खो, क्रिया: खाना, सामान्य वर्तमानकालिक रूप है: खाता है

सामान्य भूतकाल

एकवचन पुलिंस: राम ने आम खाया। प्रथमावस्था
एकवचन स्त्रीलिंग: सीता ने रोटी खायी।
बहुवचन पुं.: हमने फल खाये (खाए-खाए)

सामान्य भविष्यकाल

एकवचन पुंलिंग - राम आम खायेगा। (खाएगा-खायगा-खावेगा)
स्त्रीलिंग - सीता आम खायेगी। (खाएगी-खायगी-खावेगी)
बहुवचन पुलिंग-हम आम खायेंगे। (खाएंगे-खायंगे-खावेंगे)
विध्यवर्थक- वे आम खायें।
तुम आम खाओ। (खावे)
आप आम खाइये। (खाइए)
आम आप खाइयेगा (खाइएगा)
इच्छाबोधक - वह आम खाय (खाए)
(खाएं, खावें)
संयुक्त क्रिया- चलो आम खाया जाय। (खाया जाए)
                        आम खा लिया जाय (खा लिया जाए)
आम खिलाया जाय (खिलाया जाए)

भाववाचक संज्ञा- खवाई

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी - सरस्वती 1905
  2. प्रयोग और प्रयोग डाॅ. वी. रा. जगन्नाथ पृ. 56
  3. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी पृ. 104
  4. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 104
  5. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 104
  6. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 104
  7. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 103
  8. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 105
  9. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 105
  10. हिन्दी शब्दानुशासन, आचार्य किशोरीदा वाजपेयी पृ. 420
  11. हिन्दी की वर्तनी तथा शब्द विश्लेषण - आचार्य किशोरीदास वाजपेयी पृ. 16
  12. प्रयोग और प्रयोग पृ. 329
  13. हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा पृ. 156
  14. हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा पृ. 355

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