बुद्ध की शिक्षा  

भिक्षु यशदिन्न द्वारा निर्मित स्थापित बुद्ध प्रतिमा

बुद्ध की शिक्षाओं का सार है- शील, समाधि और प्रज्ञा। सर्व पाप से विरति ही 'शील' है। शिव में निरंतर निरति 'समाधि' है। इष्ट-अनिष्ट से परे समभाव में रति 'प्रज्ञा' है। भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की साक्षात मूर्ति थे। ये दोनों ही गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर समाहित हो गये थे। महात्मा बुद्ध के अनुसार धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में सभी स्त्री एवं पुरुषों में समान योग्यता एवं अधिकार हैं। इतना ही नहीं, शिक्षा, चिकित्सा और आजीविका के क्षेत्र में भी वे समानता के पक्षधर थे। उनके अनुसार एक मानव का दूसरे मानव के साथ व्यवहार मानवता के आधार पर होना चाहिए, न कि जाति, वर्ण और लिंग आदि के आधार पर।

बुद्ध के गुण

भगवान बुद्ध में अनन्तानन्त गुण विद्यमान थे। उनके इन गुणों को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है, यथा-

  1. काय गुण
  2. वाग-गुण
  3. चित्त गुण
  4. कर्म गुण
काय-गुण

32 महापुरुषलक्षण एवं 80 अनुव्यजंन बुद्ध के कायगुण हैं। उनमें से प्रत्येक यहाँ तक कि प्रत्येक रोम भी सभी ज्ञेयों का साक्षात दर्शन कर सकता है। बुद्ध विश्व के अनेक ब्रह्याण्डों में एक-साथ कायिक लीलाओं का प्रदर्शन कर सकते हैं। इन लीलाओं द्वारा वे विनेयजनों को सन्मार्ग में प्रतिष्ठित करते हैं।

वाग-गुण

बुद्ध की वाणी स्निग्ध वाक्, मृदुवाक, मनोज्ञवाक्, मनोरम वाक्, आदि कहलाती है। इस प्रकार बुद्ध की वाणी के 64 अंग होते हैं, जिन्हें 'ब्रह्मस्वर' भी कहते हैं। ये सब बुद्ध के वाग्-गुण हैं।

चित्त-गुण

बुद्ध के चित्त-गुण ज्ञानगत भी होते हैं और करुणागत भी। कुछ गुण साधारण भी होते हैं, जो श्रावक और प्रत्येकबुद्ध में भी होते हैं। कुछ गुण असाधारण होते हैं, जो केवल बुद्ध में ही होते हैं। दश बल, चतुवैशारद्य, तीन असम्भिन्न स्मृत्युपस्थान, तीन अगुप्त नास्ति मुषितस्मृतिता, सम्यक् प्रतिहतवासनत्व, महाकरुणा, अष्टादश आवेणिक गुण आदि बुद्ध के ज्ञानगत गुण हैं। दु:खी सत्त्वों को देखकर बुद्ध की महाकरुणा अनायास स्वत: प्रवृत्त होने लगती है। महाकरुणा के इस अजस्र प्रवाह से जगत् का अविच्छिन्न रूप से कल्याण होता रहता है। यह उनका करुणागत गुण है।

कर्म-गुण

ये दो प्रकार के होते हैं, यथा-

  1. निराभोग कर्म
  2. अविच्छिन्न कर्म
  • निराभोग कर्म से तात्पर्य उन कर्मों से है, जो बिना प्रयत्न या संकल्प के सूर्य से प्रकाश की भांति स्वत: अपने-आप प्रवृत्त होते हैं।
  • बुद्ध के कर्म बिना कालिक अन्तराल के लगातार सर्वदा प्रवृत्त होते रहते हैं, अत: ये अविच्छिन्न कर्म कहलाते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. द्र.- धम्मपद, पकिण्णकवग्गो, का., 294
  2. द्र. –चुल्लवग्ग, पृ. 228
  3. चेतनाहं भिक्खवे, कम्मं वदामि) (द्र.- अंगुत्तरनिकाय, भाग 3, पृ. 120

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