अतिशा  

अतीश दीपांकर श्रीज्ञान (अतिशा) (जन्म-981 भारत, मृत्यु-1054) बौद्ध धर्म की ब्रजयान शाखा (तांत्रिक महायान) के वे महान् दार्शनिक थे। जिसका विकास विक्रमशिला विश्वविद्यालय में ही हुआ था। उसके बाद ब्रजयान दर्शन को उन्होंने तिब्बत में भी फैलाया। तिब्बत में प्रचलित लामा प्रणाली मूल रूप से इसी ब्रजयान दर्शन का विकसित रूप है। जिसे अतीश अपने साथ तिब्बत ले गए। उन्हें तिब्बत में मंजुश्री का अवतार माना जाता है तथा बुद्ध और पद्मसम्भव के बाद सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है।

जीवन परिचय

अतिशा का जन्म 981 ई. में भारत के एक सम्पन्न ज़मींदार परिवार में साहोर अथवा जाहोर नामक स्थान पर हुआ, जिसे कुछ लोग बंगाल में बताते हैं। अतिशा के पिता का नाम श्रीकल्याण और माता का नाम पद्मप्रभा था। माता-पिता ने अतिशा का नाम चन्द्रगर्भ रखा था। प्रारम्भिक जीवन में अतिशा साधारण गृहस्था और तारादेवी का उपासक था। युवा होने पर उसने बौद्ध सिद्धान्तों का अध्ययन किया और शीघ्र ही बौद्ध धर्म का प्रचुर ज्ञान अर्जित कर लिया। उड्यन्तपुर-बिहार के आचार्य शीलभद्र ने जहाँ अतिशा अध्ययन कर रहा था, अतिशा को 'दीपंकर श्रीमान' उपाधि से विभूषित किया। बाद में तिब्बती लोगों ने उसे अतिशा नाम से पुकारना आरम्भ कर दिया। शीघ्र ही लोग उसके असली नाम चन्द्रगर्भ को भूल गये और वह अतिशा दीपंकर श्रीज्ञान के नाम से अमर हो गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ


भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 7।

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