आदि बुद्ध  

आदि बुद्ध महायान बौद्ध धर्म के कुछ मतों में पहले या स्वयंभू बुद्ध थे। इनके बारे में कहा जाता है कि उनसे पांच ध्यानी बुद्ध उत्पन्न हुए।

  • हालांकि आदि बुद्ध की अवधारणा कभी भी बहुत प्रचलन में नहीं रही, लेकिन कुछ समूहों ने, विशेषकर नेपाल, तिब्बत और जावा में, वैरोचन को आदि बुद्ध के रूप में प्रतिष्ठित या एक नए देवता, जैसे 'वज्रधर' या 'वज्रसत्व' को सबसे बड़े स्वामी के रूप में स्थापित कर दिया।
  • चित्रों और मूर्तिशिल्प में आदि बुद्ध को मुकुटधारी बुद्ध के रूप में दिखाया गया है, जिनके शरीर पर राजसी वस्त्र और बोधिसत्व (भावी बुद्ध) के पारंपरिक आभूषण हैं।
  • पांच बुद्ध कि अवधारणा में 'बहुदेववाद' के किसी आभास का उत्तर देने के लिए कुछ मतों ने इन पांच में से एक, वैरोचन को आदि बुद्ध[4] का दर्जा दिया। कई बार छठे देवता को आदि बुद्ध के रूप में पूजा जाता है।
  • तिब्बत में लामा मत वज्रधर को आदि बुद्ध मानते हैं। नेपाल में कुछ मत वज्रसत्व को यह दर्जा देते हैं। आदिबुद्ध अर्थात्‌ बुद्धों में आदिम। इन्हें पंचध्यानी बुद्धों (द्र. 'भारतीय देवी देवता') में आदिम अथवा प्रथम कहा गया है। कुछ लोगों के अनुसार प्रारंभ में रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान नामक पाँच बौद्ध तत्वों अथवा स्कंधों के मूर्तरूप पंचध्यानी बुद्धों की रचना हुई। बुद्धों के कुलों की कल्पना के साथ कुलेशों की भी कल्पना हुई। आदिबुद्ध संबंधी सिद्धांत के अभ्युदयकाल के संबंध में विभिन्न मत हैं। कुछ के अनुसार 10वीं ईसवी शताब्दी, दूसरे मत के अनुसार सातवीं शताब्दी तथा तीसरे मत के अनुसार प्रथम ईसवी शताब्दी में इस सिद्धांत का अभ्युदय हुआ। इतना निश्चित है कि यह आदिबुद्धसिद्धांत बौद्धों का ईश्वरवादी सिद्धांत मान लिया गया है। लगभग छठी सातवीं ई. शताब्दी में तत्कालीन वज्रयानी आचार्यों ने आस्तिक मतों को एक पूर्ण विकसित अद्वैतवादी दर्शन की ओर अभिमुख होते देखा और उन लोगों ने बहुदेववादी बौद्ध देवमंडल को संस्कृत करने के उद्देश्य से उस समय के पंचस्कंधों के अधिष्ठाता उन ध्यानी बुद्धों के कुलों और कुलेशों का विकास किया जो अपने-अपने कुलों के आदिबुद्ध थे। हिंदू ईश्वरवादी सिद्धांतों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए उन लागों ने इन सभी कुलों के भी प्रथम अथवा आदिम बुद्ध की विचारणा के क्रम में आदिबुद्ध अथवा वज्रधरसिद्धांत का विकास किया। आदिबुद्ध को ही वज्रयान का सर्वोच्च देवता स्थिर किया गया और यह माना गया कि पंचध्यानी बुद्धों का उन्हीं से विकास हुआ।

इस सिद्धांत का प्रवर्तन कुछ मतों के अनुसार नालंदा विहार में १०वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। दूसरे मतों के अनुसार इसका प्रवर्तन सातवीं शताब्दी में ही मध्यभारत में हुआ। प्रवर्तन के उपरांत इनके स्वरूप की कल्पना की गई, मूर्तियाँ बनीं और पूजाविधान भी स्थिर हुआ। आदिबुद्धसिद्धांत से संबंधित विशेष तंत्र कालचक्रतंत्र है। इसे ही मूल तंत्र माना जाता है जिसमें आदिबुद्धसिद्धांत का प्रवर्तन हुआ। इस दृष्टि से इस तंत्रविशेष का भी समय 10वीं शताब्दी निश्चित हाता है। इस सिद्धांत को सर्वप्रथम कालचक्रयान में ही स्वीकार किया गया। आदिबुद्ध के दूसरे दो प्रसिद्ध नाम हैं वज्रसत्व और वज्रधर। कुछ लोगों के अनुसर वज्रधर की कल्पना आदिबुद्ध के बाद की है अर्थात्‌ वज्रधर का ध्यानी बुद्ध अक्षोभ्य से विकसित बोधिसत्व वज्रपाणि से विकास हुआ। इस प्रकार वज्रसत्व परवर्ती विकास है। प्राय: वज्रधर और वज्रसत्व को एक मान लिया जाता है। आदिबुद्ध इन सभी ध्यानी बुद्धों के जनक हैं और साथ ही तांत्रिक बौद्ध देवमंडल के सर्वोच्च देवता हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 369 |

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