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प्रयाग  

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प्रयाग
विवरण 'प्रयाग' का आधुनिक नाम इलाहाबाद है। प्रयाग उत्तर प्रदेश का एक प्राचीन तीर्थस्थान है जिसका नाम अश्वमेध आदि अनेक याज्ञ (यज्ञ) अधिक होने से पड़ा था।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला इलाहाबाद ज़िला
प्रसिद्धि गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहाँ संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है।
कब जाएँ कभी भी जा सकते हैं
कैसे पहुँचें विमान, रेल, बस, टैक्सी
इलाहाबाद विमानक्षेत्र, वाराणसी हवाई अड्डा
प्रयाग रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद सिटी रेलवे स्टेशन, दारागंज रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन, नैनी जंक्शन रेलवे स्टेशन, सूबेदारगंज रेलवे स्टेशन, बमरौली रेलवे स्टेशन
लीडर रोड एवं सिविल लाइंस से बसें उपलब्ध
ऑटो रिक्शा, बस, टैम्पो, साइकिल रिक्शा
क्या देखें संगम, इलाहाबाद क़िला, आनंद भवन, इलाहाबाद संग्रहालय
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
गूगल मानचित्र, इलाहाबाद विमानक्षेत्र
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प्रयाग का आधुनिक नाम इलाहाबाद है। प्रयाग उत्तर प्रदेश का एक प्राचीन तीर्थस्थान है जिसका नाम अश्वमेध आदि अनेक याज्ञ (यज्ञ) अधिक होने से पड़ा था। यह गंगा-यमुना के संगम पर स्थित है तथा यहाँ का स्नान त्रिवेणी स्नान (दोनों नदियों की अलग-अलग तथा एक संयुक्त धारा- तीन धाराओं के कारण अथवा गंगा, यमुना के साथ अन्त:सलिला सरस्वती के कारण 'त्रिवेणी') कहा जाता है। प्रयाग का मुस्लिम शासन में 'इलाहाबाद' नाम कर दिया गया था परंतु 'प्रयाग' नाम आज भी प्रचलित है। यहाँ उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय और एजी कार्यालय भी है। रामायण में इलाहाबाद, प्रयाग के नाम से वर्णित है। ऐसा माना जाता है कि इस संगम पर भूमिगत रूप से सरस्वती नदी भी आकर मिलती है। इलाहाबाद का उल्लेख भारत के धार्मिक ग्रन्थों में भी मिलता है। वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में इस स्थान को प्रयाग कहा गया है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहाँ संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है। इन्हें भी देखें: इलाहाबाद, संगम, कुम्भ मेला, गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी

प्रयाग की व्युत्पत्ति

प्रयाग शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की गयी है। महाभारत में वनपर्व में आया है कि 'सभी जीवों के अधीश ब्रह्मा ने यहाँ प्राचीन काल में यज्ञ किया था और इसी से 'यज् धातु' से प्रयाग बना है।[1]

  • स्कन्दपुराण ने इसे 'प्र' एवं 'याग' से युक्त माना है[2]
  • प्रथम अंश स्कन्दपुराण [3] में भी आया है। अत: प्रयाग का अर्थ है 'यागेभ्य: प्रकृष्ट:', 'यज्ञों से बढ़कर जो है' या 'प्रकृष्टो यागो यत्र', 'जहाँ उत्कृष्ट यज्ञ है।' इसलिए कहा जाता है कि यह सभी यज्ञों से उत्तम है, हरि, हर आदि देवों ने इसे 'प्रयाग' नाम दिया है।
  • मत्स्यपुराण ने 'प्र' उपसर्ग पर बल दिया है और कहा है कि अन्य तीर्थों की तुलना में यह अधिक प्रभावशाली है।
  • ब्रह्मपुराण का कथन है- 'प्रकृष्टता के कारण यह 'प्रयाग' है और प्रधानता के कारण यह 'राज' शब्द अर्थात् तीर्थराज से युक्त है।[4]
  • 'प्रयागमंडल', 'प्रयाग' एवं 'वेणी' या त्रिवेणी के अन्तर को प्रकट करना चाहिए, जिनमें आगे का प्रत्येक पूर्व वाले से अपेक्षाकृत छोटा किंतु अधिक पवित्र है।
  • मत्स्यपुराण[5]; पद्मपुराण [6]; कूर्मपुराण [7] का कथन है कि प्रयाग का विस्तार परिधि में पाँच योजन है और ज्यों ही कोई उस भूमिखंड में प्रविष्ट होता है, उसके प्रत्येक पद पर अश्वमेध का फल होता है।
  • त्रिस्थलीसेतु [8] में इसकी व्याख्या यों की गई है- 'यदि ब्रह्ययुप[9] को खूँटी मानकर कोई डेढ़ योजन रस्सी से चारों ओर मापे तो वह पाँच योजन की परिधि वाला स्थल प्रयागमंडल होगा।
  • महाभारत वनपर्व [10] , मत्स्यपुराण [11] आदि ने प्रयाग के क्षेत्रफल की परिभाषा दी है[12] 'प्रयाग का विस्तार प्रतिष्ठान से वासुकि के जलाशय तक है और कम्बल नाग एवं अश्वतर नाग तथा बहुमूलक तक है; यह तीन लोकों में प्रजापति के पवित्र स्थल के रूप में विख्यात है।
  • मत्स्यपुराण [13]ने कहा है कि 'गंगा के पूर्व में समुद्रकूप है, जो प्रतिष्ठान ही है।
  • त्रिस्थलीसेतु ने इसे यों व्याख्यात किया है- पूर्व सीमा प्रतिष्ठान का कूप है, उत्तर में वासुकिह्नद है, पश्चिम में कम्बल एवं अश्वतर हैं और दक्षिण में बहुमूलक है। इन सीमाओं के भीतर प्रयाग तीर्थ है।'
  • मत्स्यपुराण [14] के मत से दोनों नाग यमुना के दक्षिणी किनारे पर हैं, किंतु मुद्रित ग्रंथ में 'विपुले यमुनातटे' पाठ है। किंतु प्रकाशित पद्मपुराण [15] से पता चलता है कि कल्पतरु का पाठान्तर (यमुना-दक्षिणे तटे) ठीक है। वेणी क्षेत्र प्रयाग के अंतर्गत है और विस्तार में 20 धनु है, जैसा कि पद्मपुराण में आया है।[16] यहाँ तीन पवित्र कूप हैं, यथा प्रयाग, प्रतिष्ठानपुर एवं अलर्कपुर में।
  • मत्स्यपुराण एवं अग्निपुराण का कथन है कि यहाँ तीन अग्निकुंड हैं और गंगा उनके मध्य में बहती है। जहाँ भी कहीं पुराणों में स्नान स्थल का वर्णन (विशिष्ट संकेतों को छोड़कर) आया है, उसका तात्पर्य है वेणी-स्थल-स्नान और वेणी का तात्पर्य है दोनों (गंगा एवं यमुना) का संगम।[17]
  • वनपर्व एवं कुछ पुराणों के पर्व के मत गंगा एवं यमुना के बीच की भूमि पृथ्वी के जाँघ है अर्थात् यह पृथ्वी की अत्यन्त समृद्धशाली भूमि है और प्रयाग जघनों की उपस्थ भूमि है।[18]
  • नरसिंहपुराण (63|17) का कथन है कि प्रयाग में विष्णु योगमूर्ति के रूप में हैं।
  • मत्स्यपुराण (111|4-10) में आया है कि कल्प के अन्त में जब रुद्र विश्व का नाश कर देते हैं, उस समय भी प्रयाग का नाश नहीं होता। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर (शिव) प्रयाग में रहते हैं। प्रतिष्ठान के उत्तर में ब्रह्मा गुप्त रूप में रहते हैं, विष्णु वहाँ वेणीमाधव के रूप में रहते हैं और शिव वहाँ अक्षयवट के रूप में रहते हैं। इसीलिए गंधर्वों के साथ देवगण, सिद्ध लोग एवं बड़े-बड़े ऋषिगण प्रयाग के मंडल को दुष्ट कर्मों से बचाते रहते हैं।[19] इसी से मत्स्यपुराण (104|18) में आया है कि यात्री को देवरक्षित प्रयाग में जाना चाहिए, वहाँ एक मास ठहरना चाहिए, वहाँ संभोग नहीं करना चाहिए, देवों एवं पितरों की पूजा करनी चाहिए और वांछित फल प्राप्त करने चाहिए।
  • प्रयाग की सीमा प्रतिष्ठान (झूँसी) से वासुकि सेतु तक तथा कंबल और अश्वतर नागों तक स्थित है। यह तीनों लोकों में प्रजापति की पुण्यस्थली के नाम से विख्यात है।
  • पद्म पुराण[20] के अनुसार 'वेणी' क्षेत्र प्रयाग की सीमा में 20 धनुष तक की दूरी में विस्तृत है। वहाँ प्रयाग, प्रतिष्ठान (झूँसी) तथा अलर्कपुर (अरैल) नाम के तीन कूप हैं। पुराणों[21] के अनुसार वहाँ तीन अग्निकुण्ड़ भी हैं जिनके मध्य से होकर गंगा बहती है। वनपर्व[22] तथा मत्स्य पुराण[23] में बताया गया है कि प्रयाग में नित्य स्नान को 'वेणी' अर्थात् दो नदियों (गंगा और यमुना) का संगम स्नान कहते हैं। वनपर्व[24] तथा अन्य पुराणों में गंगा और यमुना के मध्य की भूमि को पृथ्वी का जघन या कटिप्रदेश कहा गया है। इसका तात्पर्य है पृथ्वी का सबसे अधिक समृद्ध प्रदेश अथवा मध्य भाग।[25]-
    प्रयाग

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गंगायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम्। यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामह:। प्रयागमिति विख्यातं ब्रस्माद भरतसत्तम।। वनपर्व (87|18-19); तथा 'सर्वेषु लोकेषु प्रयागं बुध:। पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर।। -मत्स्यपुराण (109|15)।
  2. प्रकृष्टं सर्वयागेभ्य: प्रयागमिति गीयते। दृष्ट्वा प्रकृष्टयागेभ्य: पुष्टेभ्यो दक्षिणादिभि:। प्रयागमिति तन्नाम कृतं हरिहरादिभि:।। -त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 13।
  3. काशी. 7|49
  4. प्रभावात्सर्वतीर्थेभ्य: प्रभवत्यधिकं विभो। मत्स्यपुराण (110|11)। प्रकृष्टत्वात्प्रयागोसौ प्राषान्याद्राजशब्दवान्। ब्रह्मपुराण (त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 13)।
  5. पंचयोजनविस्तीर्ण प्रयागस्य तु मंडलम्। प्रविष्टमात्रे तदभूमावश्वमेध: पदे पदे।। मत्स्यपुराण (108|9-10, 111|8)
  6. पद्मपुराण (1|45|8)
  7. कूर्मपुराण (2|35|4) में आया है- पंचयोजनविस्तीर्ण ब्रह्मण: परमेष्ठिन:। प्रयागं प्रथितं तीर्थ यस्य माहात्म्यमीरितम्।।
  8. त्रिस्थलीसेतु (पृष्ठ 15)
  9. ब्रह्मा के यज्ञस्तम्भ
  10. वनपर्व (104|5
  11. मत्स्यपुराण, 106|30)
  12. आ प्रयागं प्रतिष्ठानाद्यत्पुरा वासुकेर्ह्नदात्। कम्बलाश्वतरौ नागौ नागश्च बहुमूलक:। एतत् प्रजापते: क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। मत्स्यपुराण (104|5); पद्मपुराण (1|39|69-70, 41|4-5) में भी यही बात कही गयी है। वनपर्व (85|76-77) में आया है- 'प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरावुभौ। तीर्थ भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापते:।। तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर।' अग्निपुराण (111|5) में भी आया है- 'प्रयागं... प्रजापते:' (यहाँ 'वेदी प्रोक्ता' पढ़ा गया)।
  13. मत्स्यपुराण(106|30)
  14. (कल्पतरु, तीर्थ, पृष्ठ 143)
  15. पद्मपुराण (1|43|27)
  16. माघ: सितासिते विप्र राजसूयै: समो भवेत्। धनुर्विंशतिविस्तीर्णे सितनीलाम्बुसंगमे।। इति पाद्मोक्ते:। पद्मपुराण, त्रिस्थलीसेतु (पृष्ठ 75)। सितासित (श्वेत एवं नील) का अर्थ है वेणी। 'धनु' का माप बराबर होता है चार हाथों या 96 अंगुलों के।
  17. तत्र त्रीण्यग्निकुंडानि येषां मध्येन जाह्नवी। वनपर्व (85|73); त्रीणि चाप्यग्निकुंडानि येषां मध्ये तु जाह्नवी। मत्स्यपुराण (110|4), अग्निपुराण (111|12) एवं पद्मपुराण (1|39|67 एवं 1|49|4)। मत्स्यपुराण (104|13) एवं कूर्मपुराण (1|36|28-29) ने 'पंच कुंडानि' पढ़ा है।
  18. गंगायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम्। प्रयागं जघनस्थानमृपस्थमृषयो विदु:।। वनपर्व (85|75 पद्मपुराण 1|39|69 एवं 1|43|19); अग्निपुराण (111|4); कूर्मपुराण (1|37|12) एवं मत्स्यपुराण (106|19)। भावना यह है कि तीर्थ स्थल पृथ्वी के बच्चों के समान है।
  19. प्रयागं निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा:। उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्दद्मना ब्रह्म तिष्ठति।। वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति। महेश्वरी वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वर:।। ततो देवा: सगंधर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:। रक्षन्ति मंडल नित्य पापकर्मनिवारणात्।। मत्स्यपुराण (111|4-10) और कूर्मपुराण (1|36|23-26), पद्मपुराण (आदिखंड 41|6-10)।
  20. पद्म पुराण (1.43-26
  21. मत्स्य (110.4) और अग्नि (111.12
  22. वनपर्व (85.81 और 85
  23. मत्स्य0 (104.16-17
  24. वनपर्व (85.75
  25. धर्मशास्त्र का इतिहास |लेखक: डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 1326 |
  26. पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी |पृष्ठ संख्या: 336 |
  27. (भागवतपुराण 7.14.30; 10.90.28 (3); 12.1.37; 10.79.10; मत्स्यपुराण 22.8)
  28. ब्रह्मांडपुराण 3.13.100; 66.21; 4.44.98; वायुपुराण 91.50
  29. मत्स्यपुराण 13.26
  30. वायुपुराण 77.92
  31. वायुपुराण 104.76; 106.69
  32. मत्स्यपुराण 104 पूरा
  33. मत्स्यपुराण अ. 109-110
  34. मत्स्यपुराण अ. 106
  35. मत्स्यपुराण 111.112; 180.56; 192.11; 193.19
  36. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 585 |
  37. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड 54,2-5-8-22.
  38. महाभारत वनपर्व 87, 18.
  39. महाभारत वनपर्व 84, 35.
  40. महाभारत वनपर्व 95, 4-5.
  41. श्लोक 54 से 57 तक
  42. रघुवंश 13, 58.
  43. विष्णुपुराण 5,8,29
  44. स्थूल रूप से गुप्त काल
  45. महाभारत वनपर्व 84, 83
  46. जो प्रयाग के निकट गंगा के उस पार है
  47. वाल्मीकि रामायण उत्तर-89
  48. रामचरितमानस, अयोध्या कांड
  49. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 585 |
  50. मत्स्य 109.15; स्कन्द, काशी0 7.45; पद्म 6.23.27-34 तथा अन्य
  51. ऋग्वेद खिल सूक्त (10.75
  52. मत्स्य (104.12), कूर्म (1.36.27) तथा अग्नि (111.6-7) आदि
  53. तीर्थराज प्रयाग (हिंदी) (एच.टी.एम.एल) कुम्भ मेला (आधिकारिक वेबसाइट)। अभिगमन तिथि: 8 जनवरी, 2013।
  54. त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 8
  55. नरसिंहपुराण(64.17
  56. मत्स्य पुराण(111.4-10
  57. मत्स्य पुराण(10.4.18
  58. आदिपुराण और अत्रिस्मृति
  59. नारदीय, पूर्वाद्ध, 7.52-53
  60. कूर्म0 (1.36.16-39
  61. अलबरूनी का भारत, भाग 2, पृ0 170
  62. गंगा स्नान पर्व का महत्व (हिंदी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 8 जनवरी, 2013।

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