कृष्ण संदर्भ  

कृष्ण अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त ब्रह्म थे। मूलत: वे नारायण थे। वे स्वयंभू तथा संपूर्ण जगत् के प्रपितामह थे। द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी रचण, अश्विनीकुमार नासिकास्थान, चंद्र और सूर्य नेत्र तथा विभिन्न देवता विभिन्न देहयष्टियां हैं। वे (ब्रह्म रूप) ही प्रलयकाल के अंत में ब्रह्मा के रूप में स्वयं प्रकट हुए तथा सृष्टि का विस्तार किया। रुद्र इत्यादि की सृष्टि करने के उपरांत वे लोकहित के लिए अनेक रूप धारण करके प्रकट होते रहे।

प्रसंग सहित संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्ण के रूप में वही अव्यक्त 'नारायण' व्यक्त रूप धारण करके अवतरित हुए। वे वसुदेव के पुत्र हुए। कंस के भय से वसुदेव उन्हें नंद गोप के यहाँ छोड़ आये। वहीं पलकर वे बड़े हुए। यशोदा (नंद की पत्नी) से उन्हें अद्भुत वात्सल्य की उपलब्धि हुई।

  • शिशुरूप में वे एक बार छकड़े नीचे सो रहे थे। यशोदा उन्हें वहां छोड़ यमुना तट गयी थी। बाल-लीला का प्रदर्शन करते हुए रोते हुए कृष्ण ने अपने पांव के अंगूठे से छकड़े को धक्का दिया तो वह उलट गया। उस पर रखे समस्त मटके चूर-चूर हो गये।
कृष्ण जन्म
कृष्ण को कारागार ले जाते हुए वसुदेव, द्वारा- राजा रवि वर्मा
  • देवताओं के देखते-देखते उन्होंने पूतना को मार डाला। (विस्तार से पढ़ें- पूतना वध)
  • वे अपने बड़े भाई संकर्षण[1] के साथ खेलते-कूदते बड़े हुए। सात वर्ष की अवस्था में गोचारण के लिए जाया करते थे। एक बार मक्खन चुराकर खाने के दंडस्वरूप माँ यशोदा ने उन्हें ऊखल में बांध दिया। कृष्ण ने उस ऊखल को यमल तथा अर्जुन नामक दो वृक्षों के बीच में फंसाकर इतने ज़ोर से खींचा कि वे दोनों वृक्ष भूमिसात हो गये। इस प्रकार उन वृक्षो पर रहने वाले दो राक्षसों को उन्होंने मार डाला। वे दोनों भाई ग्वालोचित वेशधारी वन में पिपिहरी तथा बांसुरी बजाकर आमोद-प्रमोद के साथ गायों को चराते थे। (विस्तार से पढ़ें- यमल और अर्जुन)
  • कृष्ण पीले और बलराम नीले वस्त्र धारण करते थे। वे पत्तों के मुकुट पहन लेते। कभी-कभी रस्सी का यज्ञोपवीत भी धारण कर लेते थे। वे गोप बालकों के आकर्षण का केंद्रबिंदु थे।
  • उन्होंने कदम्बवन के पास हृद (कुण्ड) में रहने वाले कालिया नाग के मस्तक पर नृत्यक्रीड़ा की थी तथा अन्यत्र जाने का आदेश दिया था।
  • गोपाल बालकों द्वारा किये सर्वभूत ईश्वर स्वरूप को प्रकट किया तथा गिरिराज को समर्पित होने वाली खीर वे स्वयं खा गये। तब से गोपगण उनकी पूजा करने लगे। जब इन्द्र ने वर्षा की थी तब श्रीकृष्ण ने गौओं की रक्षा के निमित्त एक सप्ताह तक गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ पर उठाए रखा था। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें गोविंद नाम दिया।
  • श्रीकृष्ण ने पशुओं की हितकामना से वृक्ष रूप-धारी 'अरिष्ट नामक दैत्य' का संहार किया।
  • ब्रजनिवासी 'केशी नामक दैत्य' का संहार किया। उस दैत्य का शरीर घोड़े जैसा और बल दस हज़ार हाथियों के समान था।
  • कंस के दरबार में रहने वाले चाणूर नामक मल्ल को उन्होंने मार डाला।
  • कंस के भाई तथा सेनापति शत्रुनाशक का भी उन्होंने नाश कर डाला।
  • कंस के कुवलयापीड़ नामक हाथी को भी उन्होंने मार गिराया।
  • कंस को मारकर उन्होंने उग्रसेन का राज्याभिषेक कर दिया।
  • उज्जयिनी में दोनों भाइयों ने वेद विद्याध्ययन किया। धनुर्विद्या सीखने वे सांदीपनि के पास गये। सांदीपनि ने गुरु-दक्षिणा में अपने पुत्र को वापस मांगा, जिसे कोई समुद्री जंतु खा गया था। श्रीकृष्ण ने समुद्र में रहने वाले उस दैत्य का संहार कर दिया तथा गुरुपुत्र को पुन: जीवनदान दिया जो कि वर्षों पूर्व यमलोक में जा चुका था। कृष्ण के कृपाप्रसाद से उसने पूर्ववत् अपना शरीर धारण किया।
  • श्रीकृष्ण ने नरकासुर[2] को मार डाला। (विस्तार से पढ़ें- नरकासुर)
  • श्रीकृष्ण ने उषा अनिरुद्ध का मिलन करवाया, बाणासुर को मारा। (विस्तार से पढ़ें- उषा अनिरुद्ध)
  • उन्होंने रूक्मी को पराजित करके रुक्मिणी का हरण किया। (विस्तार से पढ़ें- रुक्मिणी)
  • इन्द्र को परास्त करके परिजात वृक्ष का अपहरण किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बलदेव
  2. भौमासुर
  3. छान्दोग्य उपनिषद [[छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-3, खण्ड-17, श्लोक 6
  4. छान्दोग्य उपनिषद (3,17,6)
  5. महाभारत, उद्योगपर्व, 130-131, द्रोणपर्व 79
  6. महाभारत, सभापर्व, अध्याय 38
  7. हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 8-9
  8. श्रीमद् भागवत 3।3।-,10।28।-,10।44।
  9. कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।
  10. श्रीमद् भागवत 10।56, 57, 58
  11. श्रीमद् भागवत 10।82-84)
  12. श्रीमद् भागवत ।10।86।13
  13. श्रीमद् भागवत 11।13।15-42/- 11।30/-
  14. भागवत, 4।20-25
  15. भागवत, 8/3
  16. शिव पुराण, 44 ।7। 26
  17. ऋग्वेद 8।85।1-9
  18. ऋग्वेद 1।116।7,23
  19. ऋग्वेद 8।86।1-5
  20. ऋग्वेद 1।101।1
  21. छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)
  22. कौशीतकी ब्राह्मण 30।9
  23. आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई.
  24. बुद्धिचरित (1-5)
  25. 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14

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