<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Sachin+Jain</id>
	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Sachin+Jain"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/Sachin_Jain"/>
	<updated>2026-07-14T02:21:31Z</updated>
	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82,_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407659</id>
		<title>ये गुजरात आज से नहीं, सदियों से है (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82,_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407659"/>
		<updated>2013-11-15T15:17:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-8.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          [[गुजरात]] की समृद्धता आधुनिक नहीं ऐतिहासिक है। इस इलाके ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। सैन्य, राजनीतिक, युद्ध, [[भूकंप]], [[समुद्र]] का अंगडाई लेना और गुस्सा दिखाना, [[रेगिस्तान]] से लेकर अब हो रही जबरदस्त खुदाई (खनन) तक सब कुछ। मुझे नहीं लगता कि हमारे सामान्य समाज की इस तरह के उतार-चढ़ाव को जानने और समझने में बहुत रूचि रही है। मुझे समझ नहीं आता कि हमारा आध्यात्म रहस्यवाद को खिलाफ क्यों होता है; एक समय पर एक शहर में से एक बड़ी नदी बहती थी, जिसने अपना रास्ता बदल लिया। नदी इस रास्ते में इस बदलाव ने एक अर्थव्यवस्था को खतम कर दिया।&lt;br /&gt;
          [[कच्छ]] के उत्तर पूर्व में लखपत का किला है। यह केवल एक किला नहीं है, बल्कि एक पूरा वाकया है। आज जब आप इस किले की तरफ जाने के लिए निकलते हैं तो कई किलोमीटर तक आपको कोई घनी बस्ती या बाज़ार या सेवा नज़र नहीं आती। बहरहाल आपको लिग्नाईट की खदानें होने के बहुत से बोर्ड दिखाई देते हैं। जिनसे यह पता चलता है कि गुजरात खनिज विकास निगम इस इलाके का मौजूदा सत्तादार है। इस किले के ठीक बाहर एक [[चाय]] की दुकान है। किले के भीतर हर रोज अपनी जिंदगी के लिए जूझते अब 51 परिवार रहते हैं, पर इतिहास तो कुछ और ही कहानी कहता है। जानते हैं इसे लखपत क्यों कहते हैं? यह देश का सबसे समृद्ध बंदरगाह हुआ करता था। व्यापार का आलम यह था कि हर रोज इस स्थान पर 1 लाख कोड़ियों (तब की मुद्रा) का व्यापार होता था। इसी एक लाख के कारण इसका नाम लखपत पड़ गया। लखपत मतलब लखपति परिवारों का गांव! &lt;br /&gt;
12 साल की उम्र में फ़कीर बने गौस मुहम्मद की समाधि यहाँ है। माना जाता है कि मक्का जाते समय और वापस लौटते समय [[गुरुनानक]] ने लखपत में रात्री विश्राम किया था, इसलिए यहाँ गुरुद्वारा भी है। यहाँ के ग्रंथी के मुताबिक लखपत का गुरुद्वारा पहला गुरुद्वारा है। 1805 में कच्छ के राजा के लोकप्रिय सेनापति जामदार फ़तेह मुहम्मद ने इसकी सिंध के आक्रमण से रक्षा करने के लिए लखपत का किला बनवाया। जिसका परकोटा सात किलोमीटर का है। यहाँ कच्छ के विशाल रण से कोरी खाड़ी का मिलन होता है। तब [[सिंधु नदी]] यहाँ से बहा करती थी। यहाँ की जनसँख्या 5000 हुआ करती थी, जिनमे ज्यादातर सौदागर और हिंदू होते थे। सिंधु नदी के किनारे पर कोटरी नामक स्थान था जहाँ बड़ी नावें और जहाज़ आकर खड़े होते थे। यहाँ से ऊंटों पर अन्य साधनों से माल ढो–ढो कर थार तक पंहुचाया जाता था। सोचिये आज जो रेगिस्तानी क्षेत्र है, वहां सबसे ज्यादा खेती धान की होती थी। वर्ष 1819 में कच्छ में आये जबरदस्त भूकंप ने सब कुछ बदल दिया। यहाँ [[जून]] 1819 के सात दिनों में 36 भू-गर्भीय कंपन हुए। यहाँ से बहने वाले सिंधु नदी ने अपना रास्ता बदला दिया, एक प्राकृतिक बाँध – अल्लाह्बंद का निर्माण हो गया और नदी सीधे समुद्र में जाकर मिलने लगी। सब कुछ तहस नहस हो गया। बताया जाता है कि ऐतिहासिक महत्त्व के मद्देनज़र सरकार द्वारा इस क्षेत्र और लोगों के विकास के लिए राशि जारी की जाती रही, पर भ्रष्टाचार लखपत के वजूद को मिटाने की मुहीम में सफल साबित हुआ। अब यहाँ कोई नहीं आता है। आठ पीड़ियों से रह रहे लोग अपनी इन जड़ों को छोड़ना नहीं चाहते हैं। वे मानते हैं कि समृद्धता और सम्पन्नता हमेशा नहीं रहती। हम यदि लखपत को छोड़ भी देंगे तो हमारी जिंदगी नहीं बदलेगी। अब हमें अपना नया भविष्य गढ़ना है।&lt;br /&gt;
          कच्छ में ही 17वीं शताब्दी में निर्मित हुआ मुंद्रा बंदरगाह भी है। निजीकरण के जरिये आर्थिक विकास की नीतियों के तहत यह बंदरगाह दस साल पहले एक निजी कम्पनी समूह अडानी को दे दिया गया। उसने यहाँ पर्यावरण को खूब नुक्सान पंहुचाया, जिसके लिए उस पर 200 करोड़ रूपए का जुर्माना भी हुआ। बहरहाल यह बंदरगाह एक समय में नमक और मसालों के व्यापार के लिए बेहद प्रसिद्ध था। यहाँ रहने वाले खारवा जाति के लोग कुशल जहाज़ चालक होते थे, इसलिए यह बंदरगाह भी बहुत सफल रहा। इन तीनों उदाहरणों को देखा जाए तो आर्थिक सम्पन्नता के साथ यहाँ धार्मिक और आध्यात्मिक सौहार्द भी फैला हुआ नज़र आता है। मुंद्रा में भी शाह बुखारी पीर की दरगाह है। संत दरिया पीर के बारे में कहा जाता है कि वे मछुआरों की रक्षा करते थे और 17वीं सदी में यहाँ आये थे।&lt;br /&gt;
          गुजरात में कच्छ के दूसरे कोने में है [[मांडवी]]; एक समुद्र तट और एक शहर! थोडा विस्तार से बताता हूँ। आज जिस गुजरात राज्य को हम बहुत समृद्ध मानते हैं और सोचते हैं कि ये पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुआ है, पर सच यह है कि समृद्धता तो यहाँ 400 साल पहले से आना शुरू हो गयी थी। वहां मांडवी में कच्छ के रजा खेंगारजी ने वर्ष 1574 में विशालकाय बंदरगाह बनवाया था। 1581 में नगर की स्थापना हुई। इस बंदरगाह की क्षमता 400 जहाज़ों की थी। [[मुंबई]] से पहले यह बंदरगाह बन गया था। आजकल भारत का भुगतान संतुलन बिगड़ा हुआ है यानी निर्यात कम होता है और आयात ज्यादा; पर 100 सालों तक मांडवी से होने वाले व्यापार में आयात से चार गुना ज्यादा निर्यात होता था। यहाँ से पूरी [[अफ्रीका]], [[फारस की खाड़ी]], [[मालाबार तट|मालाबार]], पूर्वी एशिया से व्यापार के लिए जहाज़ [[अरब सागर]] के इस बंदरगाह पर आते थे। यहाँ के समुद्र को काला समुद्र या ब्लेक-सी भी कहा जाता है। क्योंकि यहाँ मिलने वाली बारीक मिट्टीनुमा रेत का रंग काला होता है। पहले-पहल तो आपको लगेगा कि - हैं! यहाँ तो कीचड है; पर जब हम इसे स्पर्श करते हैं तब हमें यहाँ की संस्कृति, सम्पन्नता और वैभवशाली अतीत का अहसास होने लगता है। इस यात्रा से मेरा यह विश्वास तो मज़बूत हुआ कि इतिहास और अतीत को बार-बार पलट कर जरूर देखना चाहिए; एक नए समाज को गढने के लिए यह बहुत जरूरी है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82,_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407656</id>
		<title>ये गुजरात आज से नहीं, सदियों से है (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82,_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407656"/>
		<updated>2013-11-15T15:13:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-8.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          [[गुजरात]] की समृद्धता आधुनिक नहीं ऐतिहासिक है। इस इलाके ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। सैन्य, राजनीतिक, युद्ध, [[भूकंप]], [[समुद्र]] का अंगडाई लेना और गुस्सा दिखाना, [[रेगिस्तान]] से लेकर अब हो रही जबरदस्त खुदाई (खनन) तक सब कुछ। मुझे नहीं लगता कि हमारे सामान्य समाज की इस तरह के उतार-चढ़ाव को जानने और समझने में बहुत रूचि रही है। मुझे समझ नहीं आता कि हमारा आध्यात्म रहस्यवाद को खिलाफ क्यों होता है; एक समय पर एक शहर में से एक बड़ी नदी बहती थी, जिसने अपना रास्ता बदल लिया। नदी इस रास्ते में इस बदलाव ने एक अर्थव्यवस्था को खतम कर दिया।&lt;br /&gt;
          [[कच्छ]] के उत्तर पूर्व में लखपत का किला है। यह केवल एक किला नहीं है, बल्कि एक पूरा वाकया है। आज जब आप इस किले की तरफ जाने के लिए निकलते हैं तो कई किलोमीटर तक आपको कोई घनी बस्ती या बाज़ार या सेवा नज़र नहीं आती। बहरहाल आपको लिग्नाईट की खदानें होने के बहुत से बोर्ड दिखाई देते हैं। जिनसे यह पता चलता है कि गुजरात खनिज विकास निगम इस इलाके का मौजूदा सत्तादार है। इस किले के ठीक बाहर एक [[चाय]] की दुकान है। किले के भीतर हर रोज अपनी जिंदगी के लिए जूझते अब 51 परिवार रहते हैं, पर इतिहास तो कुछ और ही कहानी कहता है। जानते हैं इसे लखपत क्यों कहते हैं? यह देश का सबसे समृद्ध बंदरगाह हुआ करता था। व्यापार का आलम यह था कि हर रोज इस स्थान पर 1 लाख कोड़ियों (तब की मुद्रा) का व्यापार होता था। इसी एक लाख के कारण इसका नाम लखपत पड़ गया। लखपत मतलब लखपति परिवारों का गांव! &lt;br /&gt;
12 साल की उम्र में फ़कीर बने गौस मुहम्मद की समाधि यहाँ है। माना जाता है कि मक्का जाते समय और वापस लौटते समय [[गुरुनानक]] ने लखपत में रात्री विश्राम किया था, इसलिए यहाँ गुरुद्वारा भी है। यहाँ के ग्रंथी के मुताबिक लखपत का गुरुद्वारा पहला गुरुद्वारा है। 1805 में कच्छ के राजा के लोकप्रिय सेनापति जामदार फ़तेह मुहम्मद ने इसकी सिंध के आक्रमण से रक्षा करने के लिए लखपत का किला बनवाया। जिसका परकोटा सात किलोमीटर का है। यहाँ कच्छ के विशाल रण से कोरी खाड़ी का मिलन होता है। तब [[सिंधु नदी]] यहाँ से बहा करती थी। यहाँ की जनसँख्या 5000 हुआ करती थी, जिनमे ज्यादातर सौदागर और हिंदू होते थे। सिंधु नदी के किनारे पर कोटरी नामक स्थान था जहाँ बड़ी नावें और जहाज़ आकर खड़े होते थे। यहाँ से ऊंटों पर अन्य साधनों से माल ढो–ढो कर थार तक पंहुचाया जाता था। सोचिये आज जो रेगिस्तानी क्षेत्र है, वहां सबसे ज्यादा खेती धान की होती थी। वर्ष 1819 में कच्छ में आये जबरदस्त भूकंप ने सब कुछ बदल दिया। यहाँ [[जून]] 1819 के सात दिनों में 36 भू-गर्भीय कंपन हुए। यहाँ से बहने वाले सिंधु नदी ने अपना रास्ता बदला दिया, एक प्राकृतिक बाँध – अल्लाह्बंद का निर्माण हो गया और नदी सीधे समुद्र में जाकर मिलने लगी। सब कुछ तहस नहस हो गया। बताया जाता है कि ऐतिहासिक महत्त्व के मद्देनज़र सरकार द्वारा इस क्षेत्र और लोगों के विकास के लिए राशि जारी की जाती रही, पर भ्रष्टाचार लखपत के वजूद को मिटाने की मुहीम में सफल साबित हुआ। अब यहाँ कोई नहीं आता है। आठ पीड़ियों से रह रहे लोग अपनी इन जड़ों को छोड़ना नहीं चाहते हैं। वे मानते हैं कि समृद्धता और सम्पन्नता हमेशा नहीं रहती। हम यदि लखपत को छोड़ भी देंगे तो हमारी जिंदगी नहीं बदलेगी। अब हमें अपना नया भविष्य गढ़ना है।&lt;br /&gt;
          कच्छ में ही 17वीं शताब्दी में निर्मित हुआ मुंद्रा बंदरगाह भी है। निजीकरण के जरिये आर्थिक विकास की नीतियों के तहत यह बंदरगाह दस साल पहले एक निजी कम्पनी समूह अडानी को दे दिया गया। उसने यहाँ पर्यावरण को खूब नुक्सान पंहुचाया, जिसके लिए उस पर 200 करोड़ रूपए का जुर्माना भी हुआ। बहरहाल यह बंदरगाह एक समय में नमक और मसालों के व्यापार के लिए बेहद प्रसिद्ध था। यहाँ रहने वाले खारवा जाति के लोग कुशल जहाज़ चालक होते थे, इसलिए यह बंदरगाह भी बहुत सफल रहा। इन तीनों उदाहरणों को देखा जाए तो आर्थिक सम्पन्नता के साथ यहाँ धार्मिक और आध्यात्मिक सौहार्द भी फैला हुआ नज़र आता है। मुंद्रा में भी शाह बुखारी पीर की दरगाह है। संत दरिया पीर के बारे में कहा जाता है कि वे मछुआरों की रक्षा करते थे और 17वीं सदी में यहाँ आये थे।&lt;br /&gt;
          गुजरात में कच्छ के दूसरे कोने में है [[मांडवी]]; एक समुद्र तट और एक शहर! थोडा विस्तार से बताता हूँ। आज जिस गुजरात राज्य को हम बहुत समृद्ध मानते हैं और सोचते हैं कि ये पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुआ है, पर सच यह है कि समृद्धता तो यहाँ 400 साल पहले से आना शुरू हो गयी थी। वहां मांडवी में कच्छ के रजा खेंगारजी ने वर्ष 1574 में विशालकाय बंदरगाह बनवाया था। 1581 में नगर की स्थापना हुई। इस बंदरगाह की क्षमता 400 जहाज़ों की थी। [[मुंबई]] से पहले यह बंदरगाह बन गया था। आजकल भारत का भुगतान संतुलन बिगड़ा हुआ है यानी निर्यात कम होता है और आयात ज्यादा; पर 100 सालों तक मांडवी से होने वाले व्यापार में आयात से चार गुना ज्यादा निर्यात होता था। यहाँ से पूरी [[अफ्रीका]], [[फारस की खाड़ी]], [[मालाबार तट|मालाबार]], पूर्वी एशिया से व्यापार के लिए जहाज़ [[अरब सागर]] के इस बंदरगाह पर आते थे। यहाँ के समुद्र को काला समुद्र या ब्लेक-सी भी कहा जाता है। क्योंकि यहाँ मिलने वाली बारीक मिट्टीनुमा रेत का रंग काला होता है। पहले-पहल तो आपको लगेगा कि - हैं! यहाँ तो कीचड है; पर जब हम इसे स्पर्श करते हैं तब हमें यहाँ की संस्कृति, सम्पन्नता और वैभवशाली अतीत का अहसास होने लगता है। इस यात्रा से मेरा यह विश्वास तो मज़बूत हुआ कि इतिहास और अतीत को बार-बार पलट कर जरूर देखना चाहिए; एक नए समाज को गढने के लिए यह बहुत जरूरी है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%AD%E0%A5%80_%E0%A4%A4%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407654</id>
		<title>भूगोल भी तय करता है समाज का चरित्र (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%AD%E0%A5%80_%E0%A4%A4%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407654"/>
		<updated>2013-11-15T15:12:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-8.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          [[कच्छ]] अपने आप में एक ऐसा दृश्य है जिसके बारे में कोई कल्पना कर पाना संभव नहीं है। इस इलाके में रहने वाले 60 से ज्यादा समुदायों में सबसे समान व्यवहार है कला के सम्मान का। [[मिट्टी]] से बने इनके घरों से लेकर इनके वस्त्रों तक आपको अलग-अलग तरह के रंग नज़र आयेंगे। कौन से [[रंग]] – [[लाल रंग|लाल]], [[गुलाबी रंग|गुलाबी]], [[बैंगनी रंग|बैंगनी]], [[हरा रंग|हरा]], [[पीला रंग|पीला]], [[नीला रंग|नीला]]; ये भी साधारण रंग नहीं; बल्कि चटख और चमकदार रंग होते हैं ये। यह मत मानिए कि कच्छी लोगों में ये रंग अलग-अलग नज़र आयेंगे, उनके एक ही वस्त्र में ये सारे रंग नज़र आ जाते हैं। जानते हैं क्यों? &lt;br /&gt;
यह एक रेगिस्तान वाला क्षेत्र है और यहाँ दूर-दूर तक केवल कुछ खास रंग ही नज़र आते हैं। अपने जीवन में रंगों को भरने के लिए कच्छीयों ने अपने रोज-मर्रा के जीवन, रहन सहन और सामाजिक रीति-रिवाजों में भांति-भांति के रंगों का उपयोग करना शुरू कर दिया। कच्छ [[गुजरात]] का सबसे बड़ा और [[भारत]] का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। इसका क्षेत्रफल 45652 किलोमीटर है। ये पूरा जिला रेगिस्तानी इलाके के रूप में वर्गीकृत है। इसमें से 23310 किलोमीटर यानी 51 प्रतिशत खारे दलदल है। 10 में से 6 साल तो यह सूखे का सामना करता है। गर्मियों में यहाँ का तापमान 50 डिग्री तक पंहुच सकता है और शीतकाल में 1 डिग्री के सबसे नीचे स्तर तक। हर दस में से 5 या 6 साल यहाँ सूखा रहता है। देश का सबसे बड़ा रेगिस्तानी इलाका (कुल राष्ट्रीय रेगिस्तान क्षेत्र का 10.32%) तो इसी एक जिले में है। [[कच्छ का रण|कच्छ का महान या बड़ा रण]] 23300 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह माना जाता है कि [[अरब सागर]] से जुड़ा हुआ यह रण बड़ी भूगर्भीय हलचलों (भूचाल या भूकंपों) के कारण अपने मूल तल से ऊपर उभर कर आ गया। यह भी कहा जाता है कि [[सिकंदर|सिकंदर महान]] के समय यहाँ नौकायन करने लायक झील थी। [[समुद्र]] से उभर कर यह [[नमक]] से भरपूर गहरी श्याम वर्ण गाद तटीय आर्द्रभूमि का विशाल रेगिस्तान बन जाता है। समुद्र की सतह से 15 मीटर ऊपर उभर कर आने के बाद भी अरब सागर से इसका जुड़ाव साफ़ नज़र आता है। इन परिस्थितियों में पशुपालन स्थानीय लोगों का मुख्य काम बन गया। सोचिये कि बन्नी भैंस इस क्षेत्र की एक खास नस्ल बन चुकी है जो एक बार प्रजनन के बाद 1800 से 2000 किलो (लगभग 16 माह तक) [[दूध]] देती है। तमाम चुनौतियों के बाद भी कच्छीयों ने पशुओं का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष [[1962]] में यहाँ 9.40 लाख पशु थे, जो [[1992]] में 14.13 लाख हुए और वर्ष [[2007]] की गणना के मुताबिक यहाँ 17.08 लाख पशु है।[[चित्र:Kachchh-9.jpg|left|200px|border]]&lt;br /&gt;
          इस इलाके में औसतन 380 मिलीमीटर [[बारिश]] होती है और इससे एक तरफ यहाँ का जीवन चुनौतीपूर्ण बन जाता है तो वहीं दूसरी और इससे एक नया पारिस्थितिकीय जीवन का भी जन्म होता है। कच्छ के बड़े रण में यदि किसी की सत्ता है तो वह है प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा यानी अंग्रेजी बबूल। कांटेदार तनों और छोटी-छोटी इमली के पेड़ जैसी पत्तियों वाली यह ऊँची झाड़ी सेंकड़ों किलोमीटर तक फ़ैल कर एक दूसरा समुद्र तैयार करती हैं। एक समय पर बन्नी चारागाह में 40 तरह की घासें पायी जाती थीं, पर बदलते पर्यावरण के चलते अब यहाँ 15 तरह की घासें ही पायी जाती हैं। यहाँ की खास जलवायु के चलते मुख्यतः झाड़ी आधारित वनस्पतियां और दलदल में पनप सकने वाली घासें यहाँ पायी जाती हैं।[[चित्र:Kachchh-10.jpg|right|200px|border]]&lt;br /&gt;
          अंग्रेजी बबूल ने यहाँ की वान्स्पतीय विविधता और जनजीवन के लिए कई समस्याएं पैदा की हैं। इस बबूल ने कच्छ अंचल की कई मौलिक और स्थानीय वनस्पतियों को खत्म कर दिया है। कुछ बड़े पेड़ या बड़े झाड (जैसे टेमरिक्स कच्छेन्सिस और जिजिफुस – [[बेर]] की एक प्रजाति) केवल ऊँचाई वाले इलाकों में ही उपलब्ध रह गए हैं। कुल 9 वनस्पतियां और पेड़ों का अस्तित्व पूरी तरह से खतरे में है। इसके अलावा देसी बावल, करदो या केरी, पीलू और लाइ वनस्पतियां भी बहुतायत में पायी जाती हैं। छोटे-छोटे बेर जैसे फल वाली वनस्पति (करीर या कैर या कापरिस डेसीडुआ), झारबेरी और लोनिया खरपतवार (सीपवीड) भी यहाँ खूब पायी जाती है। आर्द्र पर्यावरण (यानी उमस), कुछ समय खूब गर्मी और कुछ समय कडाके की ठण्ड, दूर-दूर तक सपाट बारीक-चिकनी मिट्टी का मैदान कच्छ के रण क्षेत्र को एक बिलकुल अलग आकार देता है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण या रोचक देखने के लिए हमें किसी खास स्थान या पर्यटन क्षेत्र की यात्रा नहीं करना पड़ती है। किसी भी गांव में चले जाईये; लोग तहे दिल से इस्तकबाल करते हैं, आपमें विश्वास करते हैं। चूँकि वे आपमें विश्वास करते हैं इसलिए मन की बात करते हैं। उनके पारंपरिक घर – जो एक किस्म की झोपड़ी होती है, भुंगा कहलाते हैं। नीचे से ऊपर तक गोल आकार के ये घर ऊपर की तरफ बढते हुए नोकदार होते जाते हैं। स्थानीय जलवायु और पर्यवारण को ध्यान में रखते हुए [[मिट्टी]], यहाँ पायी जाने विशेष घांस (लाणीयारी) और रेगिस्तानी बबूल-वनस्पतियों की लकडियों से मिलकर ये घर बनते हैं, जो उन्हे बहुत ज्यादा गर्मी और बहुत ज्यादा ठण्ड के साथ ही तेज हवा से भी बचाती है। इसके चलते ये समुदाय अपने आप को कठिन परिस्थितियों के अनुकूल ढाल पाए।[[चित्र:Kachchh-11.jpg|left|200px|border]]&lt;br /&gt;
          यहाँ राबारी, पटेल, कोली, खारवा, मुसलमान, अहीर, जत समेत 60 से ज्यादा समुदाय हैं। महिलायें कंजरी, [[घाघरा]], चोली और [[ओढ़नी]] पहनती हैं। पुरुष इजार, पोत और माथे पर पगड़ी पहनते हैं। गले में रूमाल या मफलर भी ज्यादातर समुदायों के लोगों में दिखाई देता है। रण में [[गर्मी]] होने के बावजूद भी यहाँ पूरे शरीर को ढंकने वाले कपडे पहने जाते हैं क्योंकि उन्हे धूप की गर्मी, गरम-ठंडी हवा, धूल और कंटीली झाडियों से बच कर चलने की व्यवस्था करनी होती है। पानी की कमी होने की कारण भी कपडे रंगीन और मटमैले होते हैं। कच्छ कला में रंग ढूँढने की कोशिश करता है, और जिसमे वह हर बार सफल भी होता है। यहाँ की कसीदाकारी (बुनकरी) को भरतकाम कहा जाता है। अपने हर रोज के जीवन से लेकर, त्यौहार और उत्सवों और शादी में भी उपहार देने के लिए कसीदाकारी से बनाए गए कपड़ों का ही लेनदेन होता है। इसके साथ ही [[कांसा|कांसे]], [[चांदी]], मीनाकारी, मिट्टी, रोगन  कलाकारी सहित यहाँ मुख्यतः 16 तरह की कलाकारी होती है। इस अद्भुत इलाके में थोडा ध्यान से देखेंगे तो आपको दिखाई देंगी तरह-तरह की चिडियाएँ। सच में जिंदगी बनी बनाई नहीं मिलती; जिंदगी को हम बनाते हैं। यह कच्छ में सिद्ध हो जाता है।  अरे हाँ! कच्छ शब्द [[संस्कृत]] का शब्द है; जिसका मतलब है ऐसी जमीन जो रह-रहकर गाली होती है और सूखती है। यह जमीन राजहंसों, हवासील (एक तरह की बड़ी बतख) और कशीका (एक तरह की तैरने वाली चिड़िया) के प्रजनन का स्थान भी है। यह जान लीजिए कि कच्छ के रण में साल के 4 महीने जा पाना संभव नहीं होता है पानी के कारण। पानी और सूखे का यहाँ अद्भुत मिलन होता है। कडाके की सर्दी और चिका देने वाली गर्मी भी यहाँ आकर गले मिलती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407653</id>
		<title>परंपरा और स्वतंत्रता (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407653"/>
		<updated>2013-11-15T15:11:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
====परंपरा और स्वतंत्रता; छटपटाहट अभी बाकी है!====&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          [[कच्छ]] के बन्नी अंचल का एक गांव है सैराड़ा। यहाँ जत समुदाय रहता है। ये मुसलमानों का ही एक वर्ग है। अब से लगभग 500 से 600 साल पहले पर्सिया और [[सिंध]] से आकर ये लोग यहाँ रहने लगे। इनमें तीन उपसमूह हैं – फकिरानी जत, गार्सिया जत, और धानेता जत। इन्हें मज़बूत लोग माना जाता है। जो मुसलमानों को रूढ़िवादी मानते हैं उनके लिए एक सूचना है। जत समुदाय के इस गांव में 400 सालों के इतिहास में किसी भी शादी में दहेज लेने और देने का काम नहीं हुआ है। इतना ही नहीं शादी में भी कोई दिखावा नहीं होता है। सिर्फ़ 30 किलो सींगदाना (मूंगफली) मेहमानों के लिए रखी जाती है और सब एक-एक मुट्ठी लेकर [[विवाह]] कार्यक्रम में शामिल होते हैं। शिकार करने की परंपरा भी उनमें नहीं है। ऐसा नहीं है कि किसी क़ानून से उन्हें कोई डर है। वे मानते हैं जानवरों-पशुओं के साथ ही मानव समाज का अस्तित्व सुरक्षित है। जब भी किसी [[परिवार]] में किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो हर परिवार उस परिवार को 500-500 रूपए देकर आर्थिक मदद करता है। सैराड़ा के एक प्रभावशाली साहब सोडा भाई जत 150 [[भैंस|भैंसों]] को पालते हैं। वे [[1979]] से एक राजनीतिक दल, जो [[गुजरात]] में अभी सत्ता में है, के सक्रिय कार्यकर्ता हैं, पर सत्ता के बारे में उनका विश्लेषण बहुत साफ़ है। 300 परिवारों का यह गांव योजना आयोग के मापदंडों पर तो ग़रीब नहीं ही हैं, पर कुछ दूसरे मापदंडों का यहाँ सन्दर्भ लिया जाना जरूरी है।[[चित्र:Kachchh-6.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
          550 बच्चों के इस गांव में सातवीं कक्षा तक स्कूल है। अभी लगभग 120 बच्चे ही स्कूल जाते हैं। सैराड़ा में बच्चों को स्कूल भेजना शुरू करवाना भी एक चुनौती का काम रहा। सातवीं के बाद 40 किलोमीटर दूर घूरियावाली जाना पड़ता। जत एक ऐसा समुदाय है जिसमे महिलायें 3 इंच के व्यास वाली सोने की नथणी (नाक की बाली) पहनती हैं। संभवतः ये नथ [[एशिया]] में सबसे बड़ी मानी जाती है। इन महिलाओं के चित्र नहीं खींचे जा सकते हैं। सोडा भाई जत कहते हैं कि हमारी परंपरा को नकारात्मक तरीके से पेश किया जाता है, इसलिए जत महिलाओं के फोटो खींचे जाने को प्रतिबंधित कर दिया गया है। हमारे गांव में स्कूल बना, पर उसमें पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी, तब गांव के लोगों ने 400 फीट दूर से मुख्य जल आपूर्ति लाइन से पाईप डलवाया। गांव में बिजली की लाइन है, यदि ट्रांसफार्मर जल जाए तो गांव के लोग ही अपने खर्चे से उसका रख-रखाव करते हैं। स्वास्थ्य के मामले में हर महिला कहती है कि माँ बनना एक चुनौती है क्योंकि चार कांधों पर खाट रखके 21 किलोमीटर दूर स्वास्थ्य केंद्र जाते हैं। गुजरात में भी “108” स्वास्थ्य सेवा वाहन चलता है पर वह सैराड़ा नहीं आता है। इसके चलते रास्तों में भी प्रसव हो जाते हैं। कच्छ के भीतर बसे गांवों को अब भी बुनियादी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं मयस्सर नहीं हैं। इसके चलते 4 महिलाओं और 6 बच्चों की मृत्यु हुई है। गुजरात सरकार सुरक्षित मातृत्व के लिए चिरंजीवी योजना चलाती है, जिसमे आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रावधान है। पिछले एक साल में इस गांव में तीन महिलाओं को चिरेगा (चिरंजीवी) योजना के चेक मिले हैं, इन तीनों पर किसी ज़िम्मेदार अफ़सर के हस्ताक्षर ही नहीं हैं। वे सोडा भाई जत बताते हैं कि दस सालों में मैने अपनी पार्टी के नेता और [[मुख्यमंत्री]] से मिलने की 11 कोशिशें कीं, पर मैं उन तक पंहुच नहीं पाया। यह बात तो है कि वे हम जैसे लोगों से मिलते नहीं हैं।&lt;br /&gt;
          केवल सोडा भाई नहीं कहते, बल्कि अध्ययन भी बता रहे हैं कि गुजरात में महिलायें आर्थिक लाभ न मिलने पर भी अस्पताल में ही प्रसव करवाना चाहती हैं। बस उन्हें परिवहन, अस्पताल में गुणवत्तापूर्ण इलाज, दवाओं और जटिल प्रसव से निपटने वाली सेवाओं की दरकार है। गुजरात में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, इस स्थिति में जरूरत यह है कि निजी क्षेत्र को सुरक्षित प्रसव सेवाएं देने के लिए पाबन्द किया जाए। &lt;br /&gt;
यह भी सच है कि उनके आसपास एक परकोटा बना हुआ है जो ज़मीनी लोगों को उनसे मिलने नहीं देता। उनके कर्मचारी कहते हैं – आवेदन दे जाओ। इसके उलट सैराड़ा में उनके विपक्षी दल के लोगों और समुदाय के काम होते हैं; इन परिस्थितियों में भी 2100 की जनसँख्या में से 1500 मतदाताओं में से 1450 एक ख़ास राजनीतिक दल, जो अभी सत्ता में है, को ही को मत देते हैं। सवाल यह कि क्यों? क्योंकि सत्तारूढ़ दल (2013 में) का मानना है कि ये 1450 तो अपने ही हैं, हमें उन बाक़ी बचे लोगों का काम करना चाहिए ताकि दूसरे दल के लोग हमारे पास आ जाएँ। हमें यहाँ विपक्ष के अस्तित्व के खत्म करना है। हम उम्मीद करते रहे हैं कि ये हमारी बात सुनेंगे और हमारी मूल समस्याएं हल करेंगे। क्या हैं उनकी मूल समस्याएं? 400 साल से यह गांव बस हुआ है। इस गांव के 300 परिवारों में से एक के पास भी खेती की कोई जमीन नहीं है। इतना ही नहीं जमीन के जिन टुकड़ों पर वे रह रहे हैं उसका भी कोई कागज़ सरकार ने उन्हें नहीं दिया है। एक-एक घर 10 लाख रूपए से बनाया गया है, जब हम मातृत्व मृत्यु या कोई और काम न होने की बात करते हैं तो तालुका का अफ़सर कहता है कि क्यों आप लोग ये मामले उठा रहे हो; कुछ कहोगे तो सरकार भी पूछेगी कि क्या इस घर की जमीन पर आपके मालिकाने हक का कोई प्रमाण है? बस इसी तरह सरकार अपना आधिपत्य समाज पर बनाए हुए है।[[चित्र:Kachchh-7.jpg|300px|left|border]]&lt;br /&gt;
          हम अपनी कला और पशुधन के कारण ज़िन्दा हैं, नहीं तो सच बात यह है कि आप सरकार को अपना नहीं कह सकते हैं। [[कलकत्ता]] की फरीदा की शादी पांच साल पहले इस गांव में हुई। उन्होंने 3 इंच के व्यास वाली वह नाथ कभी नहीं पहनी और न ही समाज ने उन्हें मजबूर किया। फरीदा कहती हैं कि “यदि बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा की व्यवस्था हो जाए तो यहाँ महिलाओं की स्थिति भी बदल जायेगी; इस गांव के लोग भी दुनिया देखना चाहते हैं और बदलाव चाहते हैं। आज गांव के स्कूल में लड़कियाँ जाने लगी हैं, ज़रूरत यह है कि हमें मूल सुविधाएँ मिल पायें।” सोडा भाई जत भी सहमत हैं कि जो “लड़कियां पढ़ती-लिखती जा रही हैं, वो नथ के बंधन से तो आज़ाद हो ही जायेंगी।”&lt;br /&gt;
          गुजरात के बारे में जानने की रूचि मेरे लिए कई चौंकाने वाली बातें सामने ला रही है। आधुनिक विकास, आर्थिक विकास, मुख्यमंत्री जी की आभासी छवियों से प्रचार जैसे जुमले गुजरात के बारे में इतने आम रहे कि मैं मानने लगा था कि वहां आधिकारिक ई-गवर्नेंस आदि पर खूब काम हुआ होगा। अब पता चला कि आपको बच्चों के स्वास्थ्य, महिलाओं के स्वास्थ्य, राज्य के स्वास्थ्य बजट के बारे में और कई शोधों के बारे में वर्ष [[2010]] या [[2011]] की आधिकारिक जानकारियाँ ही उपलब्ध हैं। गुजरात सरकार की आधिकारिक वेबसाईट पर गुजरात सरकार की ताज़ा जानकारियाँ दर्ज नहीं हैं। जो सूचनाएं वो सरकार दे रही है, उसकी एक बानगी यह है। गुजरात स्वास्थ्य विभाग की वेबसाईट पर एक अध्ययन रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट बताती है कि स्वास्थ्य योजनाओं के बारे में सरकारी रिकार्ड में दर्ज हितग्राहियों की सूची को जब जांचा गया तो उनमे से ज्यादातर लोगों को लाभ तो मिले ही नहीं थे। इस अध्ययन में 1445 ऐसे लोगों से बात की गयी, जिन्होंने परिवार नियोजन के स्थायी साधन अपना लिए थे; अध्ययन में पता चला कि इनमें से 501 ने ये साधन नहीं अपनाए हैं। केवल 15 प्रतिशत महिलाओं की प्रसव पूर्व देखभाल के तहत तीन जांचें हुई थीं। इतना ही नहीं, जिन लोगों को सरकारी अस्पताल में लाभ दिया जाना बताया गया है, उनमें से ज़्यादातर तो निजी अस्पताल में पैसा खर्च करके इलाज करवा रहे हैं। सन्दर्भ के लिए बता दूं कि उस रिपोर्ट या वेबसाईट पर यह कहीं दर्ज नहीं है कि यह अध्ययन कब किया गया था।!   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407652</id>
		<title>टांगलिया बुनकरी और दह्या भाई (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%88_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407652"/>
		<updated>2013-11-15T15:10:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-1.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          मैं इस आलेख में कोई गहरा विश्लेषण पेश नहीं करने वाला हूँ। इस बार सोचा कि [[गुजरात]] देखा जाए। नक्शा देखा तो पता चला कि पूरा राज्य घूमना तो बड़ा भारी मामला है, तो मन [[कच्छ]] पर आकर टिक गया। मैं आपको इस इलाके के बारे में बताना चाहता था, तो बस लिखने लगा। एक बात साफ़ कर दूं कि इस इलाक़े, यहाँ की ज़मीन, यहाँ के पक्षियों, लोगों, उनकी बुनकरी की कला, कपड़ों को सामने प्रत्यक्ष रूप से देख लेने के बाद ही यह तय हो जाता है कि इसकी आंशिक अभिव्यक्ति ही की जा सकती है। जब हमने (यानी मेरे [[परिवार]] ने) इस इलाक़े में प्रवेश किया तो हम एक गांव में रुके – बाजना नाम है उस गांव का।  &lt;br /&gt;
सुरेंद्रनगर ज़िले के इस गांव में 30 [[साल]] पहले तक सभी 73 परिवार कपड़ों की बुनाई और कढाई की 700 साल पुरानी एक खास कला का काम करते रहे, पर अब इनमें से एक ही परिवार बचा है। इस बुनकरी का नाम है 'टांगलिया'। गुजरात के 26 गांवों में ही इस कला का वास रहा है। यहाँ रहने वाली डांगसिया समुदाय ही एकमात्र ऐसा समुदाय रहा है जो इस कला की तकनीक में निपुण रहा है। इसमे बांधनी के साथ धागों से बिंदियों की बुनाई इस तरह की जाती है कि उनके उभार को महसूस किया जा सके। बुनकर सूट को इस तरह पकड़ कर उभारते हैं कि उस उभार के आसपास धागा लपेटा जा सके। ज़रूरत पड़ने पर कूटनी से कूटते भी हैं। आमतौर पर समुदाय अपने ख़ुद के उपयोग के लिए ही टांगलिया बुनकरी का काम करता रहा है। भारवाड समुदाय की महिलायें कढाईदार बांधनी कपड़ों (खासतौर पर बिंदीदार काले घाघरे) को पहने हुए दिख जायेंगी।&lt;br /&gt;
          बिंदियों को जोड़कर एक रूप उकेरने में अलग-अलग रूपों का उपयोग होता है; जैसे रामराज, धुसला, लोब्दी, गदिया, चर्मालिया। मूलभावों में लाडवा या लड्डू, मोर पक्षी, आम्बो (आम के पेड़), खजुरी (खजूर के पेड़) को सबसे ज्यादा उपयोग में लाया जाता है। चटक [[गुलाबी रंग|गुलाबी]], [[लाल रंग|लाल]], [[नीला रंग|नीला]], [[हरा रंग|हरा]], मेहरून, [[बैंगनी रंग|बैंगनी]] और [[नारंगी रंग]] जम के उपयोग में लाया जाता है इस बुनकरी में। [[काला रंग|काले रंग]] की पृष्ठभूमि में [[सफ़ेद रंग]] का उपयोग पारंपरिक रूप से होता रहा है।  ऊन, रेशम और सूती कपड़ों पर (ये कपडे भी डांगसिया समुदाय ही करता है) इन्ही सामग्रियों ऊन, रेशम, काटन की धागों से बिंदियाँ या दाने रचे जाते हैं। तागों की बुनाई और कढाई की दानों से निश्चित दूरी तय की जाती है।  उन पर छोटे-छोटे बिंदी के आकार के हिस्से धागों से बाँध कर रंगे जाते हैं ताकि अलग अलग रंगों को उभारा जा सके। इन पर रंगीन धागों के ऐसे कढाई की जाती मानो कपड़ों को आभूषण पहनाए गए हैं। कपडे को धागों से बिंदी के आकार में बाँध कर धागों से उस पर मनका कढ़ाई का प्रभाव पैदा किया जाता है। यही इस कला की खासियत है। मूलतः टांगलिया हस्तकला में कपड़ों की बुनाई पिट करघों (पैर डालकर बैठने के लिए ज़मीन में 3 फिट गहरे गड्ढे से जोड़ कर करघा लगाना) में होती है। ये करघे चौड़ाई में तो 2 या तीन फिट के कपडे बुनते हैं पर इनकी लम्बाई 20 फिट तक होती है। आज बाजना में केवल दह्या भाई का एक मात्र परिवार गांव में बचा है, जो यह काम करता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-2.jpg|left|300px|border]] &lt;br /&gt;
          जानकार बताते हैं कि टांगलिया कला का उद्भव दो समुदायों से सम्बन्ध रखने वाले एक युगल के प्रति सम्बंधित समुदायों द्वारा किये गए बहिष्कार के कारण हुआ। ये समुदाय इस युगल के कला से सम्बंधित विचारों को स्वीकार नहीं कर रहे थे। इस युगल ने जो कला रची उसने एक समुदाय का रूप ले लिया। &lt;br /&gt;
दह्या भाई बताते हैं कि टांगलिया का काम करना अब पुराता नहीं है। एक समय पर काली भेड़ों या ऊँट के ऊन का उपयोग कच्चे माल के रूप में होता था, जो अब इतनी मात्रा में उपलब्ध नहीं है। लोग अपने बिस्तर के लिए चादर चाहते हैं, यदि टांगलिया कला में उसे बनाया जाता है तो हमें पूरे 30 दिन काम करना पड़ता है। तब एक चादर बन पाती है। माल और करघे की लागत निकाली जाए तो इस पर 1200 रूपए का तो सामान ही लगता है। हमें यह चादर यह 2000 रूपए में बेचनी पड़ती है। इसकी हमें 30 रूपए रोज़ के हिसाब से ही मज़दूरी मिलती है। वे कहते हैं कि “हस्तकला को अब अमीरों का शौक माना जाने लगा है, जबकि हमारे समाज में तो ये कलाएं आम लोगों के रोज़ के जीवन का हिस्सा रही हैं। अब तो भारवाड़ी महिलायें भी ख़ास मौकों पर ही कलाकारी से पूरे कते-बुने वस्त्र पहनती हैं। इसी बीच बाज़ार में अब कारखानों में बने हुए सिंथेटिक धागे भी आने लगे, जिससे भेड़ और ऊंट के ऊन का उपयोग कम हो गया।” &lt;br /&gt;
हाथ करघों और मशीन के करघों के बीच संघर्ष हुआ और हाथ के करघे यह संघर्ष हारने लगे। दह्या भाई बताते हैं कि “हाथ करघों में पैर, हाथ, आँख, दिमाग और मन (रचना की कल्पना) का एक साथ काम होता है। सबके बीच सामंजस्य भी ज़रूरी होता है। मशीन के करघे मशीन से चलते हैं। हम, यानी परिवार के 5 कामकाजी सदस्य मिल कर, एक साल में 300 इकाईयां (शॉल, पर्दे, पलंग की चादरें और पहनने के कपडे) बना पाते हैं। हम पांच श्रमिकों के काम से हम 6000 रूपए महीना कमाते हैं। थोडा रुक कर वे बताते हैं कि खेत और मकान बनाने वाले मज़दूर से भी कम मोल है हमारी मेहनत का दह्या भाई का अर्थशास्त्रीय विश्लेषण बहुत सीधा सा है। उनके मुताबिक़ हम अपने सामान की क़ीमत बहुत ज़्यादा बढ़ा नहीं सकते हैं, क्योंकि आम लोग उसे वहन नहीं कर पायेंगे। यदि आम लोग ही टांगलिया कला का उपयोग न कर पाए तो यह कला तो खत्म होनी ही है। अब ज़्यादा से ज़्यादा यह कुछ शोरूमों और संग्रहालयों में बची दिखती है। अच्छा होगा यदि सरकार टांगलिया कलाकारों और डांगासिया समुदाय को संरक्षण दे। सरकारी कर्मचारियों और मज़दूरों की आय के बारे में समितियां बन रही हैं। हम 1.2 लाख बुनकर परिवारों के लिए भी तो सोचा जा सकता है; यदि आपका मन हो तो!&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F,_%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407651</id>
		<title>किताब चाहिए, किताब का नारा नहीं (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F,_%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407651"/>
		<updated>2013-11-15T15:09:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-3.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ये है जरारवाड़ी; [[कच्छ]] का नाम सुनते ही हमारे मन में ज़रूर रण यानी [[रेगिस्तान]] का चित्र उभर आता है। आख़िर यह इलाक़ा है ही बड़े और छोटे रण का, पर तथ्य यह है कि कच्छ के नक्शे को यदि उल्टा करके रखा जाए तो उसकी आकृति कछुए की तरह दिखाई देती है। इसी कारण इसे 'कच्छ' की संज्ञा दे दी गयी। इसी इलाक़े का एक गांव है जरारवाडी। छोटा सा गांव है, कुछ 25 [[परिवार|परिवारों]] का। होड़का पंचायत के इस गांव में पठान समुदाय के परिवार रहते हैं। मूलतः कच्छ के [[मुसलमान]] [[भैंस]] पालने का काम करने वाला खानाबदोश समुदाय है और 4 शताब्दियों पहले ये अरबस्तान और सिंध से घास और [[पानी]] की तलाश करते करते यहाँ आ पंहुचे। एक समय पर कच्छ के इस इलाक़े में [[एशिया]] का सबसे उपयोगी और शानदार चारागाह होता था, जो 'बन्नी चारागाह' के नाम से जाना जाता था। लंबा क़द, लंबी और नुकीली [[नाक]] और पूरे शरीर को ढकने वाले पठानी सूट को देख कर इन लोगों को पहचाना जा सकता है। गले में सैनिकों वाला मफलर भी अक्सर दिखाई दे जाता है।[[चित्र:Kachchh-4.jpg|200px|left|border]]&lt;br /&gt;
          यहाँ के अय्यूब कारा कहते हैं कि आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत एक स्कूल की है। गांव के 21 बच्चों के लिए यहाँ 4 किलोमीटर तक कोई स्कूल नहीं है। शिक्षा का अधिकार क़ानून बना हुआ है पर क़ानून ने सामाजिक टकरावों को खत्म करने का माद्दा नहीं दिखाया है। दरअसल कच्छ में मुस्लिम समुदाय में 16 प्रमुख उपसमूह हैं। मुस्लिम, केवल मुसलमान नहीं हैं। जरारवाड़ी में मुस्लिमों के भीतर का पठान समुदाय रहता है, जबकि होड़का पंचायत पर कुछ कारणों से हालेपौत्रा समुदाय का प्रभाव रहा है। वहां तो स्कूल है और व्यवस्था के मुताबिक़ जरारवाड़ी के बच्चे वहां पढ़ने जा सकते हैं, पर जाते नहीं हैं; शायद यह कहना बेहतर है कि जा नहीं पाते हैं। आपसी दूरियों के कारण जरारवाड़ी के बच्चों को आंगनवाड़ी या स्कूल या मध्यान्ह भोजन योजना के हक़ नहीं मिल पाते हैं। एक आंगनवाड़ी और स्कूल का महत्त्व आपको गांव की एक बुज़ुर्ग महिला बताती हैं – &amp;quot;अब छोटे-छोटे बच्चे विमल पान मसाला खाते हैं, उन्हे सलीक़े सिखाने की परंपरा गांव में तो रही नहीं। यदि आंगनवाड़ी और स्कूल होता तो इनका बचपन सुधरता।&amp;quot; [[चित्र:Kachchh-5.jpg|250px|right|border]]&lt;br /&gt;
          आजीविका का संकट भी अब बढ़ रहा है। बदलती जलवायु के कारण पशुपालन करने वाले इस समुदाय के पास जानवरों को खिलाने के लिए घास के कम ही स्रोत बचे हैं। यहाँ के मामदीन कारा कहते हैं कि “1972 में भी हम अपने जानवरों को लेकर राजकोट और उससे आगे तक जाते थे। एक तरह से हमारी ज़िंदगी खानाबदोश ज़िंदगी रही है। हमें याद है कि तब हम जहाँ भी जाते थे, वहां हर जानवर के लिए 2 किलो चारा और पीने के लिए पानी की व्यवस्था [[गुजरात|गुजरात राज्य]] की तरफ से रहती थी। सरकार ने पशुओं को एक संसाधन, एक संपत्ति और एक जीव माना था। हम मुसलमान भी मानते हैं कि जानवरों के बिना हमारा जीवन संभव ही नहीं है। वास्तव में हम इन्हें नहीं, बल्कि ये हमें पालते हैं। जैसे-जैसे विकास होता गया सरकारी तंत्र में जानवरों (भैंस और भेड़ों) को तुलनात्मक रूप से महत्वहीन माना जाने लगा। आजकल सूखे के दौरान राहत शिविर लगते हैं, जहाँ से चारा मिल सकता है। अब वह व्यापक व्यवस्था (चारे और पानी की व्यवस्था) भी ख़त्म हो गयी। ये जानवर घास की जगह खरपतवार और रेगिस्तानी वनस्पतियां खाने लगे हैं, जो ये पहले नहीं खाते थे। अब हमें आजीविका के विकल्प चाहिए।” अय्यूब कारा कहते हैं कि हम न तो रण छोड़ना चाहते हैं न पशुपालन। इन दोनों के साथ रहते हुए समाज में ज़रूरी बदलाव आते हुए देखना चाहते हैं। जरारवाड़ी गांव की पठान महिलायें भी बुनकरी का काम करती हैं। आज शिक्षा के लिए इस गांव में कोई जागरूकता अभियान चलाने की ज़रूरत नहीं है। वे बार-बार कहते हैं कुछ मत कीजिये, बस स्कूल दे दीजिए। हमसे आप पूछते हैं कि जब पढ़े-लिखे नहीं है तो रूपए का हिसाब-क़िताब कैसे रखते हैं! हमारे पास इतने पैसे ही नहीं होते हैं, जिनके हिसाब के लिए शिक्षा की जरूरत पड़े। हम तो जानवर चराते हैं और खानाबदोश ज़िंदगी जीते रहे। अब हमारे गांव के साधन टूट गए हैं। अब हमें बाहर निकालना होगा और बाहर निकलने के लिए अपने तौर–तरीक़े बदलने होंगे। हमारी ज़िंदगी तो गुजर गयी; अपने बच्चों के लिए हमें शिक्षा का तंत्र चाहिए। अपने सामने हम उन्हें पढते-लिखते देखना चाहते हैं। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ== यह आलेख लेखक की यात्रा के अनुभवों पर आधारित है.&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F,_%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407650</id>
		<title>किताब चाहिए, किताब का नारा नहीं (यात्रा साहित्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F,_%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_(%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=407650"/>
		<updated>2013-11-15T15:08:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sachin Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्वतंत्र लेखन नोट}}&lt;br /&gt;
;लेखक- सचिन कुमार जैन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kachchh-3.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ये है जरारवाड़ी; [[कच्छ]] का नाम सुनते ही हमारे मन में ज़रूर रण यानी [[रेगिस्तान]] का चित्र उभर आता है। आख़िर यह इलाक़ा है ही बड़े और छोटे रण का, पर तथ्य यह है कि कच्छ के नक्शे को यदि उल्टा करके रखा जाए तो उसकी आकृति कछुए की तरह दिखाई देती है। इसी कारण इसे 'कच्छ' की संज्ञा दे दी गयी। इसी इलाक़े का एक गांव है जरारवाडी। छोटा सा गांव है, कुछ 25 [[परिवार|परिवारों]] का। होड़का पंचायत के इस गांव में पठान समुदाय के परिवार रहते हैं। मूलतः कच्छ के [[मुसलमान]] [[भैंस]] पालने का काम करने वाला खानाबदोश समुदाय है और 4 शताब्दियों पहले ये अरबस्तान और सिंध से घास और [[पानी]] की तलाश करते करते यहाँ आ पंहुचे। एक समय पर कच्छ के इस इलाक़े में [[एशिया]] का सबसे उपयोगी और शानदार चारागाह होता था, जो 'बन्नी चारागाह' के नाम से जाना जाता था। लंबा क़द, लंबी और नुकीली [[नाक]] और पूरे शरीर को ढकने वाले पठानी सूट को देख कर इन लोगों को पहचाना जा सकता है। गले में सैनिकों वाला मफलर भी अक्सर दिखाई दे जाता है।[[चित्र:Kachchh-4.jpg|200px|left|border]]&lt;br /&gt;
          यहाँ के अय्यूब कारा कहते हैं कि आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत एक स्कूल की है। गांव के 21 बच्चों के लिए यहाँ 4 किलोमीटर तक कोई स्कूल नहीं है। शिक्षा का अधिकार क़ानून बना हुआ है पर क़ानून ने सामाजिक टकरावों को खत्म करने का माद्दा नहीं दिखाया है। दरअसल कच्छ में मुस्लिम समुदाय में 16 प्रमुख उपसमूह हैं। मुस्लिम, केवल मुसलमान नहीं हैं। जरारवाड़ी में मुस्लिमों के भीतर का पठान समुदाय रहता है, जबकि होड़का पंचायत पर कुछ कारणों से हालेपौत्रा समुदाय का प्रभाव रहा है। वहां तो स्कूल है और व्यवस्था के मुताबिक़ जरारवाड़ी के बच्चे वहां पढ़ने जा सकते हैं, पर जाते नहीं हैं; शायद यह कहना बेहतर है कि जा नहीं पाते हैं। आपसी दूरियों के कारण जरारवाड़ी के बच्चों को आंगनवाड़ी या स्कूल या मध्यान्ह भोजन योजना के हक़ नहीं मिल पाते हैं। एक आंगनवाड़ी और स्कूल का महत्त्व आपको गांव की एक बुज़ुर्ग महिला बताती हैं – &amp;quot;अब छोटे-छोटे बच्चे विमल पान मसाला खाते हैं, उन्हे सलीक़े सिखाने की परंपरा गांव में तो रही नहीं। यदि आंगनवाड़ी और स्कूल होता तो इनका बचपन सुधरता।&amp;quot; [[चित्र:Kachchh-5.jpg|250px|right|border]]&lt;br /&gt;
          आजीविका का संकट भी अब बढ़ रहा है। बदलती जलवायु के कारण पशुपालन करने वाले इस समुदाय के पास जानवरों को खिलाने के लिए घास के कम ही स्रोत बचे हैं। यहाँ के मामदीन कारा कहते हैं कि “1972 में भी हम अपने जानवरों को लेकर राजकोट और उससे आगे तक जाते थे। एक तरह से हमारी ज़िंदगी खानाबदोश ज़िंदगी रही है। हमें याद है कि तब हम जहाँ भी जाते थे, वहां हर जानवर के लिए 2 किलो चारा और पीने के लिए पानी की व्यवस्था [[गुजरात|गुजरात राज्य]] की तरफ से रहती थी। सरकार ने पशुओं को एक संसाधन, एक संपत्ति और एक जीव माना था। हम मुसलमान भी मानते हैं कि जानवरों के बिना हमारा जीवन संभव ही नहीं है। वास्तव में हम इन्हें नहीं, बल्कि ये हमें पालते हैं। जैसे-जैसे विकास होता गया सरकारी तंत्र में जानवरों (भैंस और भेड़ों) को तुलनात्मक रूप से महत्वहीन माना जाने लगा। आजकल सूखे के दौरान राहत शिविर लगते हैं, जहाँ से चारा मिल सकता है। अब वह व्यापक व्यवस्था (चारे और पानी की व्यवस्था) भी ख़त्म हो गयी। ये जानवर घास की जगह खरपतवार और रेगिस्तानी वनस्पतियां खाने लगे हैं, जो ये पहले नहीं खाते थे। अब हमें आजीविका के विकल्प चाहिए।” अय्यूब कारा कहते हैं कि हम न तो रण छोड़ना चाहते हैं न पशुपालन। इन दोनों के साथ रहते हुए समाज में ज़रूरी बदलाव आते हुए देखना चाहते हैं। जरारवाड़ी गांव की पठान महिलायें भी बुनकरी का काम करती हैं। आज शिक्षा के लिए इस गांव में कोई जागरूकता अभियान चलाने की ज़रूरत नहीं है। वे बार-बार कहते हैं कुछ मत कीजिये, बस स्कूल दे दीजिए। हमसे आप पूछते हैं कि जब पढ़े-लिखे नहीं है तो रूपए का हिसाब-क़िताब कैसे रखते हैं! हमारे पास इतने पैसे ही नहीं होते हैं, जिनके हिसाब के लिए शिक्षा की जरूरत पड़े। हम तो जानवर चराते हैं और खानाबदोश ज़िंदगी जीते रहे। अब हमारे गांव के साधन टूट गए हैं। अब हमें बाहर निकालना होगा और बाहर निकलने के लिए अपने तौर–तरीक़े बदलने होंगे। हमारी ज़िंदगी तो गुजर गयी; अपने बच्चों के लिए हमें शिक्षा का तंत्र चाहिए। अपने सामने हम उन्हें पढते-लिखते देखना चाहते हैं। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
लेखक मध्यप्रदेश में रह कर सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन और लेखन का काम करते हैं. उनसे sachin.vikassamvad@gmail पर सम्पर्क किया जा सकता है. इस आलेख के साथ दिए गए चित्र भी लेखक के द्वारा खींचे गए हैं.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ== यह आलेख लेखक की यात्रा के अनुभवों पर आधारित है.&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सचिन कुमार जैन]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:कच्छ]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:यात्रा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतंत्र लेखन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{Theme pink}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sachin Jain</name></author>
	</entry>
</feed>