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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Sahir-Ludhianvi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=साहिर लुधियानवी&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=अब्दुल हयी साहिर&lt;br /&gt;
|अन्य नाम= &lt;br /&gt;
|जन्म=[[8 मार्च]],  [[1921]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[लुधियाना]], [[पंजाब]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[25 अक्तूबर]], [[1980]] &lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[मुम्बई]], [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
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|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=जो वादा किया, कभी कभी मेरे दिल में के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार, [[पद्म श्री]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=फिल्म नौजवान का गाना ठंडी हवायें लहरा के आयें ..... बहुत लोकप्रिय हुआ और आज तक है।&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=पहली पुस्तक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=तल्ख़ियां&lt;br /&gt;
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|पाठ 2=दिल का दौरा&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>चित्र:Sahir-Ludhianvi.jpg</title>
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		<title>आनंद बख़्शी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Anand-Bakshi.jpg|thumb|आनंद बख़्शी]]&lt;br /&gt;
'''आनंद बख़्शी''' (अंग्रेज़ी: ''Anand Bakshi'') (जन्म- [[21 जुलाई]] [[1930]], रावलपिंडी [[पाकिस्तान]]; मृत्यु- [[30 मार्च]] [[2002]], [[मुम्बई]]) एक लोकप्रिय भारतीय [[कवि]] और गीतकार थे।&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
आनंद बख़्शी का जन्म पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में 21 जुलाई 1930 को हुआ था। आनंद बख़्शी को उनके रिश्तेदार प्यार से नंद या नंदू कहकर पुकारते थे। बख़्शी उनके परिवार का उपनाम था, जबकि उनके परिजनों ने उनका नाम आनंद प्रकाश रखा था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद आनंद बख़्शी के नाम से उनकी पहचान बनी।&lt;br /&gt;
==गीतकार के रूप में==&lt;br /&gt;
आनंद बख़्शी बचपन से ही फ़िल्मों में काम करके शोहरत की बुंलदियों तक पहुंचने का सपना देखा करते थे, लेकिन लोगों के मजाक उड़ाने के डर से उन्होंने अपनी यह मंशा कभी जाहिर नहीं की थी। वह फ़िल्मी दुनिया में गायक के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। आनंद बख़्शी अपने सपने को पूरा करने के लिए 14 वर्ष की उम्र में ही घर से भागकर फ़िल्म नगरी [[मुंबई]] आ गए, जहाँ उन्होंने रॉयल इडियन नेवी मे कैडेट के तौर पर 2 वर्ष तक काम किया। किसी विवाद के कारण उन्हें वह नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद 1947 से 1956 तक उन्होंने भारतीय सेना में भी नौकरी की। बचपन से ही मजबूत इरादे वाले आनंद बख़्शी अपने सपनों को साकार करने के लिए नए जोश के साथ फिर मुंबई पहुंचे, जहाँ उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर अभिनेता [[भगवान दादा]] से हुई। शायद नियति को यही मंजूर था कि आनंद बख़्शी गीतकार ही बने। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान दादा ने उन्हें अपनी फ़िल्म बड़ा आदमी में गीतकार के रूप में काम करने का मौक़ा दिया। इस फ़िल्म के जरिए वह पहचान बनाने में भले ही सफल नहीं हो पाए, लेकिन एक गीतकार के रूप में उनके सिने करियर का सफर शुरू हो गया। अपने वजूद को तलाशते आनंद बख़्शी को लगभग सात वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 1965 में जब जब फूल खिले प्रदर्शित हुई तो उन्हें उनके गाने परदेसियों से न अंखियां मिलाना.., ये समां समां है ये प्यार का.., एक था गुल और एक थी बुलबुल.. सुपरहिट रहे और गीतकार के रुप में उनकी पहचान बन गई। इसी वर्ष फ़िल्म हिमालय की गोद में उनके गीत चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोंचा था.. को भी लोगों ने काफ़ी पसंद किया। वर्ष 1967 में प्रदर्शित सुनील दत्त और नूतन अभिनीत फ़िल्म मिलन के गाने सावन का महीना पवन कर शोर..,युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे.., राम करे ऐसा हो जाए.. जैसे सदाबहार गानों के जरिए उन्होंने गीतकार के रूप में नई ऊंचाइयों को छू लिया। चार दशक तक फ़िल्मी गीतों के बेताज बादशाह रहे आनंद बख़्शीने 550 से भी ज़्यादा फ़िल्मों में लगभग 4000 गीत लिखे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गीतों के सफल रचनाकार==&lt;br /&gt;
यह सुनहरा दौर था जब गीतकार आनन्द बख़्शी ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम करते हुए 'फ़र्ज़ (1967)', 'दो रास्ते (1969)', 'बॉबी (1973'), 'अमर अकबर एन्थॉनी (1977)', 'इक दूजे के लिए (1981)' और राहुल देव बर्मन के साथ 'कटी पतंग (1970)', 'अमर प्रेम (1971)', हरे रामा हरे कृष्णा (1971)' और 'लव स्टोरी (1981)' फ़िल्मों में अमर गीत दिये। फ़िल्म अमर प्रेम (1971) के 'बड़ा नटखट है किशन कन्हैया', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'ये क्या हुआ', और 'रैना बीती जाये' जैसे उत्कृष्ट गीत हर दिल में धड़कते हैं और सुनने वाले के दिल की सदा में बसते हैं। अगर फ़िल्म निर्माताओं के साक्षेप चर्चा की जाये तो [[राज कपूर]] के लिए 'बॉबी (1973)', 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम् (1978)'; सुभाष घई के लिए 'कर्ज़ (1980)', 'हीरो (1983)', 'कर्मा (1986)', 'राम-लखन (1989)', 'सौदाग़र (1991)', 'खलनायक (1993)', 'ताल (1999)' और 'यादें (2001)'; और यश चोपड़ा के लिए 'चाँदनी (1989)', 'लम्हें (1991)', 'डर (1993)', 'दिल तो पागल है (1997)'; आदित्य चोपड़ा के लिए 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)', 'मोहब्बतें (2000)' फ़िल्मों में सदाबहार गीत लिखे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://podcast.hindyugm.com/2009/02/anand-bakshi-song-writer-of-common-man.html |title=आनंद बख़्शी |accessmonthday=[[10 जुलाई]] |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल. |publisher=आवाज़ |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
==कई गायकों को दिया जीवन==&lt;br /&gt;
आनंद बख़्शी ने शैलेंद्र सिंह, उदित नारायण, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति और एस. पी. बालसुब्रय्मण्यम जैसे अनेक गायकों के पहले गीत का बोल भी लिखा है। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
आनंद बख़्शी40 बार फ़िल्मफेयर अवार्ड के लिए नामित किये गये और चार बार यह पुरस्कार उनके खाते में आया। अंतिम बार 1999 में सुभाष घई की ताल के गीत इश्क बिना क्या जीना के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर से नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्होंने कई पुरस्कार प्राप्त किए थे। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
सिगरेट के अत्यधिक सेवन की वजह से वह फेफड़े तथा दिल की बीमारी से ग्रस्त हो गए। आखिरकार 72 साल की उम्र में अंगों के काम करना बंद करने के कारण [[30 मार्च]], 2002 को उनका निधन हो गया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/15814 |title=आनंद बख़्शी |accessmonthday=[[10 जुलाई]] |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=पी.एच.पी. |publisher=आज तक |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://in.jagran.yahoo.com/cinemaaza/cinema/memories/201_201_856.html आनंद बख्शी: जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम वो..]&lt;br /&gt;
*[http://josh18.in.com/hindi/movies-movies-movies-/10092/0 सदा यादों में रहेंगे आनंद बख्शी]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गीतकार}}&lt;br /&gt;
[[Category:गीतकार]][[Category:कवि]][[Category:सिनेमा]] [[Category:संगीत कोश]] [[Category:सिनेमा कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>वार्ता:तमाशा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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		<title>तमाशा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{पुनरीक्षण}} '''तमाशा''' भारत के लोकनाटक का श्रृंगारिक...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''तमाशा''' [[भारत]] के लोकनाटक का श्रृंगारिक रूप, जो [[पश्चिम भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य में 18वीं शताब्दी में शुरू हुआ। &lt;br /&gt;
*अन्य सभी भारतीय लोकनाटकों में प्रमुख भूमिका में पुरुष होते हैं। लेकिन तमाशा में मुख्य स्त्री की भूमिका महिला करती है। &lt;br /&gt;
*20वीं सदी में ये व्यावसायिक रूप से सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>भारतीय इस्फ़ाहानी क़ालीन</title>
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		<updated>2012-03-22T10:03:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Isfahan-Carpet.jpg|thumb|250px|इस्फ़ाहानी क़ालीन]]&lt;br /&gt;
'''इस्फ़ाहानी क़ालीन''' फ़र्श को ढकने के लिए छोटे से लेकर बहुत बड़े आकार वाले फ़ारसी हेराती डिज़ाइनों की नक़ल के रूप में [[भारत]] में प्रारंभिक तौर पर 17वीं शताब्दी में हस्तनिर्मित हुई। &lt;br /&gt;
*इस्फ़ाहान नाम का प्रयोग इस विश्वास के कारण किया गया था कि फ़ारसी क़ालीन भारत के क़ालीनों से बेहतर बिकते हैं।&lt;br /&gt;
*प्रतीत होता है कि विभिन्न [[ईस्ट इंडिया कंपनी|ईस्ट-इंडिया कंपनियाँ]] बड़ी संख्या में इन क़ालीनों का निर्यात [[यूरोप]], विशेषकर [[पुर्तग़ाल]] और हॉलैंड व बेल्जियम आदि देशों को करती थीं। &lt;br /&gt;
*इन क़ालीनों को 17वीं शताब्दी के डच चित्रों में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
*[[अंगूर]] के पत्तों व फूलों वाले अलंकृत मिटिफ़ एक जामुनी-[[लाल रंग|लाल]] पृष्ठभूमि पर प्रयोग किए जाते थे; किनारा अक्सर समान मूल भाव वाला [[नीला रंग|नीला]]-[[हरा रंग|हरा]] होता था।&lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी क़ालीन [[आगरा]] में बनाए जाते होगे, जहाँ ऐसे क़ालीन 19वीं शताब्दी में भी बनाए जा रहे थे। &lt;br /&gt;
*संभवतः दक्कन में अधिक [[रंग]]-बिरंगे क़ालीन बनाए गए, लेकिन उनका निर्यात नहीं किया गया। &lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी शब्द का प्रयोग 19वीं शताब्दी के अनाकार्षक और असमृद्ध डिज़ाइनों के भारतीय क़ालीनों के लिए भी किया गया है, जिन्हें 17वीं शताब्दी के क़ालीनों से लिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:हस्तशिल्प कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>महाविहार</title>
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		<updated>2012-03-22T10:00:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: :श्रेणी:नया पन्ना मार्च-2012 (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''महाविहार''' तीसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में सीलोन (वर्तमान [[श्रीलंका]]) की प्राचीन राजधानी, [[अनुराधापुर]] में स्थापित बौद्ध मठ है। सिंहली राजा देवनामपिय तिस्स ने भारतीय भिक्षु महेंद्र द्वारा उन्हें [[बौद्ध]] बनाए जाने के कुछ ही समय बाद इस मठ का निर्माण किया। &lt;br /&gt;
==बौद्धों का मुख्य गढ़==&lt;br /&gt;
क़रीब 10वीं सदी तक यह एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र और परंपरावादी (जैसे [[थेरवाद]]) बौद्धों का मुख्य गढ़ रहा। श्रीलंका में [[बौद्ध धर्म]] के अति महत्त्व के कारण महाविहार के भिक्षुओं की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि उनकी शक्ति एवं प्रभाव अक्सर [[धर्म]] की परिधि से बाहर निकलकर धर्मनिपेक्ष राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाविहार की धार्मिक प्रभुता को पहली बार पहली सदी ई.पू. बौद्ध भिक्षुओं के असनातनी समूह ने चुनौती दी, जिन्होंने अलग होकर अभयगिरि विहार की स्थापना की, हालांकि यह मठ संघ हमेशा विरोध करता रहा। मुख्य रूप से तीसरी एवं सातवीं सदी में कुछ समय के लिए राजसी संरक्षण के अलावा वह महाविहार संघ की आधिकारिक स्थिति पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा नहीं कर सका, परंतु महाविहार का केंद्रीय प्रभुत्व एवं प्रधानता धीरे-धीरे कम होती गई और 11वीं सदी में श्रीलंका के धार्मिक जीवन पर इसका प्रभाव नगण्य हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बौद्ध धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध मठ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>साँचा:पहाड़ी पर्यटन स्थल</title>
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		<title>माथेरान</title>
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		<updated>2012-03-22T09:59:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''माथेरान''' [[पश्चिम भारत]] में [[महाराष्ट्र]] राज्य में [[मुम्बई]] से लगभग 90 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित पर्वतीय पर्यटन स्थल है। &lt;br /&gt;
*माथेरान समुद्र तल से लगभग 800 मीटर की ऊँचाई पर है।&lt;br /&gt;
*यहाँ नैरो गेज रेल सेवा है; वाहन योग्य कोई सड़क नहीं है; [[मुम्बई]] और [[पुणे]] जैसे निकटवर्ती नगरों में रहने वालों का प्रिय पर्वतीय स्थल है।&lt;br /&gt;
*खोपोली, पाताल गंगा और अन्य निकटवर्ती क्षेत्रों में अब औद्योगिक क्षेत्र का विकास हो रहा है, जिसमें जलविद्युत संयंत्र का सहयोग प्राप्त है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहाड़ी पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पहाड़ी पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>बुरुशास्की भाषा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=264834"/>
		<updated>2012-03-22T09:57:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: :श्रेणी:नया पन्ना मार्च-2012; Adding category :Category:जम्मू और कश्मीर (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बुरुशास्की भाषा''' पश्चिमोत्तर [[कश्मीर]] के गिलगित भूखंड में रहने वाले बुरुश लोगों द्वारा बोली जाने वाली [[भाषा]] है। &lt;br /&gt;
*बुरुशास्की एक अलग-थलग पड़ी हुई भाषा है, जिसका विश्य की किसी अन्य भाषा के साथ संबंध ज्ञात नहीं है।&lt;br /&gt;
*इस भाषा में [[संज्ञा]] को चार वर्गों या लिंगों के अनुरूप चिह्नित किया गया है:&lt;br /&gt;
#पुरुष&lt;br /&gt;
#स्त्री&lt;br /&gt;
#किसी भी लिंग के पशु और कुछ निर्जिव वस्तुएँ &lt;br /&gt;
#अन्य सभी निर्जिव वस्तुएँ&lt;br /&gt;
*अन्य व्याकरणीय विशेषताओं में संज्ञाओं तथा [[विशेषण|विशेषणों]] के लिए व [[सर्वनाम|सर्वनामों]] में पुरुष अथवा संदर्भ वस्तु को प्रदर्शित करने के लिए बहुवचन प्रत्यय शामिल हैं, [[क्रिया|क्रियाओं]] के लिए अन्य पुरुष के साथ समाप्त होने वाले शब्दों में भी प्रत्यय लगाया जाता है। ये सब लिंग के अनुरूप परिवर्तनशील हैं। &lt;br /&gt;
*बुरुशास्की भाषा में कुछ सार्वनामिक उपसर्ग भी हैं। इस भाषा की कोई [[लिपि]] नहीं है।&lt;br /&gt;
*कश्मीर में यासिन नदी घाटी में बुरुशास्की की कुछ हद तक परिवर्तित वर्चिकवार या वर्शिकवार का उपयोग होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जम्मू और कश्मीर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>बूटा</title>
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		<updated>2012-03-22T09:56:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बूटा''' [[मुग़लकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला|मुग़ल-भारतीय कला]] के सबसे महत्त्वपूर्ण सजावटी कला रूपांकनों में से एक, जो विशेष शैलीगत पत्तियों और [[फूल|फूलों]] वाली कोमल टहनियों से बनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*इसका उपयोग [[वास्तुकला]] और चित्रकारी, [[वस्त्र|वस्त्रों]], मीनाकारी और अन्य दूसरी सज्जा-कलाओं में किया जाता है।&lt;br /&gt;
*मुग़ल बादशाह [[जहाँगीर]] (1605-27) के शासनकाल में यह कला महत्त्व पाने लगी और [[शाहजहाँ]] (1628-58) के समय तक इसका निरंतर उपयोग किया गया। &lt;br /&gt;
*[[आगरा]] स्थित [[ताजमहल]] (लगभग 1632-49) में इसकी नफ़ासत और [[रंग]]-सौंदर्य के उत्कृष्ट उदहारण देखे जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
*यह [[कला]] रूपांकन 18वीं शताब्दी के आसपास कुछ स्थिर और जड़ होने लगा, किंतु इसकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:मुग़ल साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्थापत्य कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%97%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE&amp;diff=264830</id>
		<title>महगड़ा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%97%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE&amp;diff=264830"/>
		<updated>2012-03-22T09:51:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''महगड़ा''' नवपाषाण काल का पुरास्थल है, जो [[उत्तर प्रदेश]] [[इलाहाबाद ज़िला|इलाहाबाद ज़िले]] की मेजा तहसील के पहाड़ी क्षेत्र में बेलन नदी के दाहिनी तट पर [[इलाहाबाद]] से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*महगड़ा सन् [[1975]]-[[1976|76]] में इस पुरास्थल की खोज हुई थी। &lt;br /&gt;
*जी.आर.शर्मा के निर्देशन में [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] के प्राचीन [[इतिहास]], [[संस्कृति]] एवं पुरातत्त्व विभाग की ओर से यहाँ पर [[उत्खनन]] कार्य का संचालन किया था। &lt;br /&gt;
*डोरी छाप [[मिट्टी]] के बर्तन खुरदरे तथा रगड़कर चमकाये मृद्भाण्ड आदि पात्र परम्पराओं के ठीकरे प्रायः सभी स्तरों से मिले हैं।  &lt;br /&gt;
*झोपड़ियों के फर्शों स्तम्भ गर्तों आदि के आधार पर इस पुरास्थल पर कुल मिलाकर छ: निर्माण काल माने गये हैं। यहाँ से बीस झोपड़ियों के साक्ष्य मिले हैं।&lt;br /&gt;
*गोलाकार अथवा अण्डाकार इन झोपड़ियों का व्यास 4.3 मीटर से 6.4 मीटर तक है।&lt;br /&gt;
*झोपड़ियों के फर्श से नवपाषाणिक प्रसार उपकरण, मृद्भाण्ड तथा पशुओं की हड्डियों प्राप्त हुई हैं। &lt;br /&gt;
*[[गाय]], बैल, [[भैंस]], बकरियाँ आदि यहाँ के लोगों के पालतू पशु थे और हिरण तथा जंगली सुअर का ये शिकार करते थे। &lt;br /&gt;
*यहाँ की बस्ती के पूर्वी सिरे पर 125x75 मीटर के आयताकार पशु बाड़े के साक्ष्य मिले है, जिसमें कुल तीन दरवाजें थे। &lt;br /&gt;
*महगड़ा के [[उत्खन्न]] से धान की [[कृषि]] के संकेत मिले हैं। &lt;br /&gt;
*इस पुरास्थल का कालानुक्रम पाँचवी-चौथी सहस्त्राब्दी ई.पू. प्रस्तावित किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक=|पूर्णता=|शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर_प्रदेश_के_ऐतिहासिक_स्थान]] [[Category:उत्तर_प्रदेश_के_ऐतिहासिक_स्थान]][[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=264829</id>
		<title>गौर माड़िया नृत्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=264829"/>
		<updated>2012-03-22T09:51:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''गौर माड़िया नृत्य''' [[छत्तीसगढ़]] राज्य के [[बस्तर ज़िला|बस्तर ज़िले]] में गौर माड़िया जनजाति द्वारा किया जाता है। इस जनजाति का यह [[नृत्य]] बहुत ही हर्षोल्लास से परिपूर्ण, सजीव एवं सशक्त होता है। यह नृत्य प्राय: [[विवाह]] आदि के अवसरों पर किया जाता है। इस नृत्य का नामकरण गौर भैंस के नाम पर हुआ है।&lt;br /&gt;
;वस्त्र&lt;br /&gt;
यह नृत्य एक प्रकार से शिकार नृत्य प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें जानवरों की उछलने-कुदने आदि की चेष्टाओं को प्रदर्शित किया जाता है। फिर भी इस नृत्य में सधे हुए ताल के गहन धार्मिक और पवित्र भाव समाहित होते हैं। पुरुष नर्तक रंगीन और विशिष्ट शिरोवस्त्र धारण करते हैं, जिसमें [[भैंस]] की दो सींग और उन पर [[मोर]] का एक लम्बा पंख-गुच्छ और पक्षी के पंख लगे होते हैं। इसके किनारे पर [[कौड़ी]] की सीप से बनी झालर झूलती हैं, जिससे उनका चेहरा थोड़ा-सा ढॅंका रहता है। महिलाएँ पंखों की जड़ी हुई एक गोल चपटी टोपी पहनती हैं।&lt;br /&gt;
;नृत्य प्रक्रिया&lt;br /&gt;
नृत्य करने वाली नर्तकियाँ अपने साधारण [[सफ़ेद रंग|सफ़ेद]] और [[लाल रंग]] के [[वस्त्र]] को सौन्दर्यमय बनाने के लिए अनेक प्रकार के [[आभूषण|आभूषणों]] को धारण करती है। एक आन्तरिक गोला बनाकर वे ज़मीन पर लय के साथ डंडे बजाती, पैर पटकती, झूमती, झुकती और घूमती हुई गोले में चक्कर लगाती रहती है। दूसरी ओर पुरुष नर्तक एक बड़ा बाहरी गोला बनाते हैं और तीव्र गति से अपने क़दम घुमाते और बदलते हुए जोर-जोर से ढोल पीटते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://sczcc.gov.in/CG/InternalPage.aspx?Antispam=aOVv2ZXPBd4&amp;amp;ContentID=76&amp;amp;MyAntispam=ZJhp45i4l15|title=लोक नृत्य|accessmonthday=13 मार्च|accessyear=2012|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{छत्तीसगढ़ के नृत्य}}&lt;br /&gt;
{{नृत्य कला}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:नृत्य कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>चूल्हा</title>
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		<updated>2012-03-22T08:45:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Woman-Cooking-Food-Gujarat.jpg|thumb|250px|चूल्हे पर खाना बनाती ग्रामीण महिला]]&lt;br /&gt;
'''चूल्हा''' वह प्रसिद्ध उपकरण होता है जिसमें चीज़ें पकाने या गरम करने के लिए कोयले, लकड़ियाँ आदि जलाई जाती हैं। &lt;br /&gt;
*यह चूल्हा किसी भी प्रकार का हो सकता है। जैसे-  [[मिट्टी]] का चूल्हा, अंगीठी या सिगड़ी, गैस का चूल्हा और सौर चूल्हा आदि। &lt;br /&gt;
*चूल्हे में [[ईंधन]] के रूप में लकड़ी व [[गाय]] या [[भैंस]] के गोबर से बने उपले का प्रयोग किया जाता है। &lt;br /&gt;
*ईंधन के रूप में बबूल की लकड़ी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भूले बिसरे शब्द}}&lt;br /&gt;
[[Category:घरेलू उपकरण]][[Category:भूला-बिसरा भारत]][[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A3%E0%A4%BE&amp;diff=264825</id>
		<title>दक्षिणा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A3%E0%A4%BE&amp;diff=264825"/>
		<updated>2012-03-22T08:44:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
[[यज्ञ]] करने वाले [[पुरोहित|पुरोहितों]] को दिये गये दान (शुल्क) को दक्षिणा कहते हैं। ऐसे अवसरों पर '[[गाय]]' ही प्राय: शुल्क होती थी। दानस्तुति तथा [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] में इसका और भी विस्तार हुआ है, जैसे [[गाय]], अश्व, [[भैंस]], ऊँट [[आभूषण]] आदि। इसमें भूमि का समावेश नहीं है, क्योंकि भूमि पर सारे कुटुम्ब का अधिकार होता था और बिना सभी सदस्यों की अनुमति के इसका दान नहीं किया जा सकता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतएव भूमि अदेय समझी गयी। किंतु मध्य युग आते-आते भूमि भी राजा द्वारा दक्षिणा में दी जाने लगी। फिर भी इसका अर्थ था भूमि से राज्य को जो आय होती थी, उसका दान। प्रत्येक धार्मिक अथवा मांगलिक कृत्य के अंत में पुरोहित ऋत्विज अथवा ब्राह्मणों को दक्षिणा देना आवश्यक समझा जाता है। इसके बिना शुभ कार्य का सुफल नहीं मिलता, ऐसा विश्वास है। ब्रह्मचर्य अथवा अध्ययन समाप्त होने पर शिष्य द्वारा आचार्य को दक्षिणा देने का विधान गृह्मसूत्रों में पाया जाता है। &lt;br /&gt;
==एकलव्य की दक्षिणा==&lt;br /&gt;
हिरण्यधनु नामक निषादराज का पुत्र [[एकलव्य]] धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से [[द्रोणाचार्य]] के आश्रम में आया किन्तु निम्न वर्ण का होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश होकर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन सारे राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। इससे क्रोधित हो कर एकलव्य ने उस कुत्ते पर अपना बाण चला-चला कर उसके मुँह को बाणों से से भर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी किन्तु बाणों से बिंध जाने के कारण उसका भौंकना बन्द हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुत्ते के लौटने पर जब [[अर्जुन]] ने धनुर्विद्या के उस कौशल को देखा तो वे द्रोणाचार्य से बोले, &amp;quot;हे गुरुदेव! इस कुत्ते के मुँह में जिस कौशल से बाण चलाये गये हैं उससे तो यह प्रतीत होता है कि यहाँ पर कोई मुझसे भी बड़ा धनुर्धर रहता है।&amp;quot; अपने सभी शिष्यों को ले कर द्रोणाचार्य एकलव्य के पास पहुँचे और पूंछा, &amp;quot;हे वत्स! क्या ये बाण तुम्हीं ने चलाये हैं।?&amp;quot; एकलव्य के स्वीकार करने पर उन्होंने पुनः प्रश्न किया,'तुम्हें धनुर्विद्या की शिक्षा देने वाले कौन हैं?' एकलव्य ने उत्तर दिया, 'गुरुदेव! मैंने तो आपको ही गुरु स्वीकार कर के धनुर्विद्या सीखी है।' इतना कह कर उसने द्रोणाचार्य को उनकी मूर्ति के समक्ष ले जा कर खड़ा कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणाचार्य नहीं चाहते थे कि कोई अर्जुन से बड़ा धनुर्धारी बन पाये। द्रोणाचार्य एकलव्य से बोले, 'यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ तो तुम्हें मुझको गुरुदक्षिणा देनी होगी। 'एकलव्य बोला, 'गुरुदेव! गुरुदक्षिणा के रूप में आप जो भी माँगेंगे मैं देने के लिये तैयार हूँ।' इस पर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ के अँगूठे की माँग की। एकलव्य ने सहर्ष अपना अँगूठा दे दिया। इस प्रकार एकलव्य अपने हाथ से धनुष चलाने में असमर्थ हो गया तो अपने पैरों से धनुष चलाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
==राजा हरिश्चंद्र की दक्षिणा==&lt;br /&gt;
{{main|राजा हरिश्चंद्र}}&lt;br /&gt;
[[विश्वामित्र]] ने ब्राह्माण होने के नाते राजा से उसका समस्त दानस्वरूप ले लिया। तदनंतर उसे उस राज्य की सीमाएं छोड़कर चले जाने को कहा और यह भी कहा कि एक माह के उपरांत [[राजा हरिश्चंद्र|हरिश्चंद्र]] उनके [[राजसूय यज्ञ]] के लिए दीक्षास्वरूप धन (दक्षिणा) भी प्रदान करे। राजा अपनी पत्नी [[तारामती]] (शैव्या) तथा पुत्र रोहिताश्व को साथ ले पैदल ही [[काशी]] की ओर चल दिया। तारामती धीरे-धीरे चल रही थी, अतः क्रुद्ध मुनि ने उस पर डंडे से प्रहार किया। कालांतर में वे लोग काशी पहुंचे। वहां विश्वामित्र दक्षिणा लेने के निमित्त पहले से ही विद्यमान थे। कोई और मार्ग न देख राजा ने शैव्या और [[रोहिताश्व]] को एक ब्राह्मण के हाथों बेच दिया। दक्षिणा के लिए धन पर्याप्त न होने के कारण स्वयं चांडाल के हाथों बिक गया। वास्तव में धर्म ने ही चांडाल का रूप धारण कर रखा था। हरिश्चंद्र का कार्य शवों के वस्त्र आदि एकत्र करना था। उसे श्मशान भूमि में ही रहना भी पड़ता था। कुछ समय उपरांत किसी सर्प ने रोहिताश्व का दंशन कर लिया। उसका शव लेकर शैव्या श्मशान पहुँची। हरिश्चंद्र और शैव्या ने परस्पर पहचाना तो अपने-अपने कष्ट की गाथा कह सुनायी। तदनंतर चिता तैयार करके बालक रोहिताश्व के साथ ही हरिश्चंद्र और शैव्या ने आत्मदाह का निश्चय कर किया। धर्म ने प्रकट होकर उन्हें प्राण त्यागने से रोका।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारतीय संस्कृति के प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A7&amp;diff=264822</id>
		<title>दूध</title>
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		<updated>2012-03-22T08:41:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Milk-Glass.jpg|thumb|गिलास में दूध]]&lt;br /&gt;
'''दूध''' एक अपारदर्शी [[सफ़ेद रंग|सफ़ेद]] पेय पदार्थ है जो मादाओं के दुग्ध ग्रन्थियों द्वारा बनता है। नवजात शिशु तब तक दूध पर निर्भर रहता है जब तक वह अन्य [[पदार्थ|पदार्थों]] का सेवन करने में अक्षम होता है। &lt;br /&gt;
*दूध एक विजातीय पदार्थ है जिसमें [[वसा]], [[प्रोटीन]], दुग्धम, खनिज पदार्थ तथा अन्य अवयव या तो घोल या निलम्बन या पायस के रूप में सदैव [[द्रव]] अवस्था में पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
*साधारणतया दूध में 85 प्रतिशत [[जल]] होता है और शेष भाग में ठोस [[तत्त्व]] यानी [[खनिज]] व [[वसा]] होता है। [[गाय]]-[[भैंस]] के अलावा बाज़ार में विभिन्न कंपनियों का पैक्ड दूध भी उपलब्ध होता है। &lt;br /&gt;
*दूध [[प्रोटीन]], [[कैल्शियम]] और राइबोफ्लेविन (विटामिन बी -2) युक्त होता है, इनके अलावा इसमें [[विटामिन]] ए, डी, के और ई सहित [[फॉस्फोरस]], [[मैग्नीशियम]], [[आयोडिन]] व कई खनिज और वसा तथा [[ऊर्जा]] भी होती है। इसके अलावा इसमें कई एंजाइम भी होते हैं। आहार विशेषज्ञों की मानें तो ये सब पोषक तत्व हमारी [[मांसपेशी|मांसपेशियों]] और हड्डियों के गठन में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन एंटीबॉडीज के रूप में काम करता है और हमें इन्फेक्शन से बचाता है।&lt;br /&gt;
*दूध में न्यूनतम वसा 3.5 प्रतिशत और वसा रहित ठोस 8.5  प्रतिशत होनी चाहिये। दूध का PH मान 6.6 तथा क्वथनांक 100 से 115 से.ग्रे. होता है। &lt;br /&gt;
==मुख्य अवयव और भौतिक गुण==&lt;br /&gt;
दूध के विभिन्न विश्लेषणों से पता चलता है कि इसमें वसा, प्रोटीन, खनिज लवण, दुग्धम आदि मुख्य अवयव हैं। इन अवयवों की मात्रा विभिन्न पशुओं तथा एक ही पशु में विभिन्न समयों पर भिन्न-भिन्न होता है। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+दूध और खीस के भौतिक गुणों की तुलना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! गुण &lt;br /&gt;
! दूध &lt;br /&gt;
! खीस&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| स्वाद &lt;br /&gt;
| मीठा &lt;br /&gt;
| तीखा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सुगन्ध &lt;br /&gt;
| सामान्य &lt;br /&gt;
| सामान्य &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अम्लता &lt;br /&gt;
| 0.12 से 0.14 % &lt;br /&gt;
| 0.2 से 0.4 % &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिमांक  &lt;br /&gt;
| -0.52 °C से -0.56 °C &lt;br /&gt;
| -0.605 °C &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| क्लोराइडस&lt;br /&gt;
| 0.14 %   &lt;br /&gt;
| 0.149 से 0.156 %   &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| वर्तनांक &lt;br /&gt;
| 1.344 - 1.348 &lt;br /&gt;
| दूध की अपेक्षा अधिक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आपेक्षिक घनत्व &lt;br /&gt;
| 1.028 से 1.032  &lt;br /&gt;
| 1.04 से 1.08  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| विद्युत संचालकता &lt;br /&gt;
| 0.005 म्हो &lt;br /&gt;
| दूध की अपेक्षा अधिक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाढ़ापन &lt;br /&gt;
| 1.5 से 2.0 सेंटी पाइस    &lt;br /&gt;
| दूध की अपेक्षा अधिक &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
* [[घी]] अथवा दूध का [[पीला रंग]] कैरोटिन के कारण होता है। &lt;br /&gt;
* शुद्ध देशी घी में एक विशेष प्रकार की सुगन्ध डाइएसीटिल के कारण होती है। &lt;br /&gt;
* दूध में केसीन, एलब्यूमिन तथा ग्लोबिन, तीन प्रमुख प्रकार के प्रोटीन पाये जाते हैं। इसमें केसीन की मात्रा सबसे अधिक होती है। &lt;br /&gt;
* केसीन प्रोटीन से 'लेनीटाल' या लेक्टोफिल तथा एरालोक नाम के धागे बनाये जाते हैं। &lt;br /&gt;
* दुग्धम दूध में पाया जाने वाला मुख्य [[कार्बोहाइड्रेट]] है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खीस==&lt;br /&gt;
खीस एक प्रकार का क्षरण है जो बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद प्राप्त होता है। यह क्षरण नवजात शिशु के लिए अति आवश्यक होता है, क्योंकि यह शिशु की बहुत सी बीमारियों से रक्षा करता है। इसका संघटन सामान्य दूध से अलग तरह का होता है जो कुछ दिन के अन्दर सामान्य दूध में परिवर्तित हो जाता है। खीस का दूध की तुलना में अधिक [[पीला रंग|पीला]] होने के कारण उसमें कैरोटीन की अधिकता तथा [[गुलाबी रंग]] का कारण उसमें [[रक्त]] का मिला होना है। खीस में [[प्रोटीन]] की मात्रा 11.34% दुग्ध की मात्रा 2.19%, राख की मात्रा 1% तथा जल की मात्रा 74.19% होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खीस रेचक तथा रोग प्रतिकारक के रूप में महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त खीस में [[विटामिन]] ए, विटामिन बी, ट्रिप्टोफेन तथा [[लोहा]] एवं ग्लोब्यलीन (प्रोलीन) की मात्रा अधिक होती है जो बच्चों को संक्रामक रोगों से बचाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पौष्टिक आहार==&lt;br /&gt;
दूध प्रकृति का सबसे पौष्टिक आहार है। इसलिए इसे [[धरती]] का [[अमृत]] भी कहते हैं। मनुष्य के लिए दूध सर्वोत्तम और संपूर्ण खाद्य पदार्थ है। दूध मनुष्य की अधिकांश [[पोषण]] आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। दूध वह आहार है जो स्तनपायी प्राणियों को जन्म लेते ही सबसे पहले उपलब्ध होता है। मानव शिशु तो प्रारंभिक 5-6 माह तक एवं बाद में कुछ माह तक आंशिक रूप से [[माता]] के दूध पर ही निर्भर रहता है। यह निश्चित है कि स्वस्थ मां का दूध पीने वाला बालक जितना स्वस्थ, सुडौल और हष्ट-पुष्ट रहता है, उतना खाना (भोजन) शुरू करने के बाद नहीं रह पाता। दूध एक ऐसा पेय पदार्थ जो आसानी से पच जाता है। दूध में शारीरिक वृद्धि करने वाले, शरीर को शक्ति देने वाले सभी [[तत्त्व]] विद्यामान रहते हैं। दूध शक्ति, वृद्धि, कान्ति, [[बल]], वीर्य बढ़ाने वाला होता है। यह शरीर को ठंडक देते हुए मल को प्रवृत्त करता है व [[पाचन]] को ठीक बनाए रखने में सहायक होता है। दूध आयु बढ़ाकर यौवन को अधिक काल तक बनाए रखता है। दूध में शरीर को शक्ति देने वाले सभी तत्व काफ़ी मात्रा में पा जाते हैं। शाकाहारियों के लिए दूध से बढ़कर कोई पौष्टिक वस्तु नहीं है। यदि मांसाहारी एक कप दूध पिए तो दोनों की शक्ति समान होती है। दूध में [[कैल्शियम]] एवं [[फास्फोरस]] काफ़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इससे हड्डियां, [[दांत]], [[मांसपेशी|मांसपेशियां]] मज़बूत होती हैं। मनुष्य सिर्फ़ दूध पीकर जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक आनंदपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकता है। इसके सेवन से किसी प्रकार के रोग होने की संभावना नहीं रहती है। दूध में मनुष्य शरीर के पोषक तत्व उचित मात्रा में विद्यामान रहते हैं। दूध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक पूर्ण पुष्टिकारक आहार होते हुए भी बहुत जल्दी हजम हो जाता है। दूध किसी भी हालत में नुकसान नहीं करता। हर हालत में गुणकारी होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ra&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://ranchiexpress.com/82942.php |title=दूध एक पौष्टिक आहार |accessmonthday=[[13 मार्च]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=पी.एच.पी |publisher=रांची एक्सप्रेस |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गाय का दूध== &lt;br /&gt;
[[गाय]] के दूध में प्रति ग्राम 3.14 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। योगाचार्य सुरक्षित गोस्वामी गाय के ताजा दूध को ही उत्तम मानते हैं। अनेकानेक चिकत्सकों का भी मानना है कि गाय का दूध भैंस की तुलना में दिमाग के लिए अच्छा है, पर इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एच. एस. छाबड़ा के अनुसार कुछ स्टडी बताती हैं कि गाय के दूध से बेहतर है भैंस का दूध। उसमें कम कोलेस्ट्रॉल होता है और मिनरल ज़्यादा होते हैं। गाय के दूध में कार्बोहाइड्रेट लेक्टेज की मात्रा 4% तथा वसा की मात्रा 4.5% होती है। &lt;br /&gt;
==भैंस का दूध== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Milk-Woman.jpg|thumb|200px|दूध दुहती महिला]]&lt;br /&gt;
[[भैंस]] के दूध में प्रति ग्राम 0.65 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। भैंस के दूध में गाय के दूध की तुलना में 92 फीसदी [[कैल्शियम]], 37 फीसदी [[आयरन]] और 118 फीसदी [[फॉस्फोरस]] ज़्यादा होता है। भैंस के दूध में कार्बोहाइड्रेट लेक्टेज की मात्रा 4.9% तथा वसा की मात्रा 7% होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://hindi.economictimes.indiatimes.com/articleshow/4621954.cms |title=दूध के बारे में सबकुछ... |accessmonthday=24 जनवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==विशिष्ट दूध==&lt;br /&gt;
====टोंड दुग्ध==== &lt;br /&gt;
भैंस के दूध में पानी मिलाकर वसा तथा वसा रहित ठोस पदार्थों की मात्रा कम कर दिया जाता है तथा इसमें पुनः सप्रेटा दूध मिलाकर वसा रहित ठोस पदार्थों को शुद्ध दूध के बराबर कर दिया जाता है। इस प्रकार बने दूध को टोंड मिल्क कहते हैं। &lt;br /&gt;
====डबल टोंड दुग्ध==== &lt;br /&gt;
यह भी एक प्रकार का टोंड मिल्क ही है लेकिन इसमें वसा की मात्रा 1.5% तथा वसा रहित ठोस पदार्थ की मात्रा 10% होती है। इसमें सप्रेटा दूध की जगह सप्रेटा दूध चूर्ण का प्रयोग किया जाता है। &lt;br /&gt;
====फ्लेवर्ड दुग्ध==== &lt;br /&gt;
इसमें पाश्चुरीकृत दूध में थोड़ा मीठा एवं सुगन्ध फ्लेवर्ड दूध का निर्माण किया जाता है, तत्पश्चात् इसे बोतलों में भरकर इसे बाज़ार में बेचा जाता है। इसका पोषक मान पाश्चुरीकृत दूध से ज़्यादा होता है क्योंकि इसमें चीनी एवं सुगन्ध दोनों अलग से मिलाया जाता है। &lt;br /&gt;
====प्रबलीकृत या विटामिन युक्त दुग्ध==== &lt;br /&gt;
दुग्ध एवं दुग्ध पदार्थों में [[विटामिन]]-डी की मात्रा मिलाकर इसकी [[पोषण]] महत्ता अधिक की जाती है। कुछ देशों में शुद्ध दूध की जगह सप्रेटा दूध ही बच्चों को पीने को मिलता है। ऐसी दशा में बच्चों के शरीर में विटामिन ए की भारी कमी हो जाती है। सप्रेटा दूध में विटामिन ए एवं डी मिलाकर इसकी गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार विटामिनयुक्त दूध को प्रबलीकृत दूध कहते हैं। &lt;br /&gt;
====सोयाबीन दूध====  &lt;br /&gt;
सोयाबीन से बने दूध को सोयाबीन दूध कहते हैं। सोयाबीन [[प्रोटीन]] का अच्छा एवं सस्ता स्रोत है। फलतः सोयाबीन के दूध में भी प्रोटीन की मात्रा काफ़ी होती है। यह दूध पौष्टिकता से परिपूर्ण होता है। &lt;br /&gt;
====संघनित दूध====  &lt;br /&gt;
संघनित अथवा वाष्पित वह दूध है जिससे [[जल]] का कुछ भाग वाष्पीकरण के द्वारा अलग कर दिया जाता है। जब इसमें चीनी मिला दी जाती है तब इसे संघनित दूध कहते हैं। यदि चीनी न मिलाई जाय तो उसे वाष्पित दूध या सादा संघनित दूध कहते हैं। &lt;br /&gt;
==दूध का उपयोग==&lt;br /&gt;
दूध का सबसे अच्छा उपयोग पीना है। दूध हमेशा ताजा पीना चाहिए। दूध को 15-20 मिनट अच्छी तरह उबाल कर तथा ठंडा करके पीना चाहिए। दूध उबालने से उसके सभी हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। दूध पीने का सबसे अच्छा समय रात को सोते समय रहता है। भोजन करने के 2-3 घंटे बाद रात को सोते समय दूध पीना चाहिए, जो व्यक्ति शारीरिक रूप से कमज़ोर हो, उन्हें दूध ठंडा करके शहद डालकर पीना चाहिए। जिन व्यक्तियों को कब्ज की शिकायत रहती हों, उन्हें दूध में मुनक्का डालकर कुछ देर उबालकर पीना चाहिए, इससे कब्ज से छुटकारा मिलता है। जाड़े के दिनों में एक गिलास दूध में एक-दो अंजीर डालकर उबालकर पीने से दूध की पौष्टिकता में वृद्धि हो जाती है। &amp;lt;ref name=&amp;quot;ra&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==दुग्ध संसाधन== &lt;br /&gt;
====पास्तुरीकरण====  &lt;br /&gt;
यह वह प्रक्रिया है जिसमें दूध को निश्चित तापक्रम पर एक निश्चित निश्चित समय तक रखकर इसमें उपस्थित प्रायः सभी जीवाणुओं को नष्ट कर दिया जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि दूध की [[पोषण]] महत्ता तथा क्रीम लेयर पर कोई प्रभाव न पड़े। इस प्रक्रिया में सामान्य तौर पर दूध को 600°C पर 20 मिनट तक रखा जाय तो उसके सभी व्याधिजन जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह विधि इसके खोजकर्ता लुई पाश्चर के नाम पर जानी जाती है। &lt;br /&gt;
====निर्जीवीकरण==== &lt;br /&gt;
निर्जीवीकरण का तात्पर्य दूध को गर्म करके [[जीवाणु]] रहित करना है। इसके लिए दूध को 30 मिनट तक 93.3°C - 94.40°C तापक्रम पर रखते हैं। यद्यपि इसमें दूध पूर्णतया निर्जवीकृत तो नहीं हो पाता फिर भी जीवाणुओं की मात्रा कम हो जाती है। इससे दूध को लम्बे समय तक संग्रहित कर रखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
====समांगीकरण====  &lt;br /&gt;
इस विधि में दूध की [[वसा]] गोलिकाओं को छोटे-छोटे कणों में खण्डित कर दिया जाता है। ताकि दूध को संग्रह करते समय उसके ऊपर क्रीम लेयर के रूप में एकत्रित न हों सकें और सारे दूध में समान रूप से बिखरे रह सकें। इसके लिए पहले दूध को 37.70°C से 480°C ताप पर गर्म करने के बाद इसका तापक्रम 600°C से 650°C कर दिया जाता है और इस ताप पर इसको समांगीकरण यंत्र द्वारा 2000 से 2500 पौण्ड प्रति वर्ग इंच का दबाव डालते हैं। इस दूध को पुनः 1/10000 इंच के छिद्र से बाहर निकालते हैं फलतः वसा गोलिकाएँ छोटे-छोटे कणों में विभक्त हो जाती हैं। &lt;br /&gt;
==दुग्ध उत्पाद== &lt;br /&gt;
====क्रीम==== &lt;br /&gt;
यह एक प्रकार का दूध होता है जिसमें वसा की मात्रा बढ़ जाती है तथा पानी की मात्रा कम हो जाती है। क्रीम में वसा का कोई निर्धारित स्तर नहीं होता है फिर भी बाज़ार में बेचे जाने वाले क्रीम में वसा की मात्रा 45% से अधिक होती है। क्रीम का [[रंग]] अधिक पीला होता है। इसका कारण क्रीम में वसा की अधिकता होना है। वसा में [[विटामिन]] ए, जो कैरोटिन से प्राप्त होता है पूर्णतः घुलनशील होता है इसलिए कैरोटिन एवं जैंथोफिल के कारण क्रीम का रंग [[पीला रंग|पीला]] होता है। क्रीम को सामान्य तौर पर [[गुरुत्व|गुरुत्वाकर्षण]] विधि अथवा अपकेन्द्री विधि से दूध से निकाला जाता है।&lt;br /&gt;
====मक्खन====  &lt;br /&gt;
मक्खन भी एक प्रकार का दुग्ध उत्पाद है जो [[गाय]]- भैंस तथा अन्य स्तनधारी पशुओं के दूध या क्रीम को मथने से प्राप्त होता है। इसमें वसा 80% से कम और 20% से अधिक अन्य पदार्थ जैसे-पानी, [[नमक]] तथा अन्नानाटोरंजक नहीं होनी चाहिए। साथ ही पानी की मात्रा 16% से अधिक नहीं होनी चाहिए। &lt;br /&gt;
====दही====  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Curd.jpg|thumb|[[दही]]|250px]]&lt;br /&gt;
{{Main|दही}}&lt;br /&gt;
दही एक प्रकार का दुग्ध उत्पाद है जो दूध के सामान्य किण्वन से प्राप्त होता है। सामान्य किण्वन में दूध को उबालकर 21 ताप तक ठण्डा करके उसमें उचित मात्रा में जामन मिलाकर प्राप्त किया जाता है। जामन का तात्पर्य दूध में दही जमाने के लिए जामन मिलाने से है। जामन एक प्रकार की दूध से बनी हुई वस्तु है जिसमें केवल वही [[जीवाणु]] होते हैं जिनको हम दही में पैदा करना चाहते हैं। दही में वही जीवाणु होने चाहिए जो दूध में दुग्धाम्ल उत्पन्न करते हैं। ये जीवाणु प्रायः स्ट्रेप्टोकोकस अथवा अम्लरागी होते हैं। दही में प्रायः वह सभी [[तत्त्व]] मिलते हैं जो कि साधारण दूध में होते हैं। केवल अंतर यह होता है कि दही में पानी एवं दुग्धम की मात्रा साधारण दूध की अपेक्षा कम होती है और साथ-साथ दही में दुग्धाम्ल की मात्रा काफ़ी बढ़ जाती है। &lt;br /&gt;
====छेना====    &lt;br /&gt;
छेना एक प्रकार का दुग्ध उत्पाद है जो उबलते दूध को अम्ल द्वारा फाड़कर तैयार किया जाता है। दूध को फाड़ने के लिए दुग्धाम्ल या साइट्रिक अम्ल अथवा साइट्रिक फलों का रस प्रयोग में लाया जाता है। छेना तैयार होने के बाद इसे [[जल]] से अलग कर लिया जाता है। &lt;br /&gt;
====आइसक्रीम==== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ice-Cream.jpg|thumb|[[आइसक्रीम]]]]&lt;br /&gt;
{{Main|आइसक्रीम}}&lt;br /&gt;
यह एक प्रकार का कशावत एवं हिमीकृत खाद्य उत्पाद है जिसको दुग्ध उत्पाद के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें दुग्ध, [[वसा]], वसा रहित [[ठोस पदार्थ]] एवं चीनी की एक इच्छित प्रतिशत मात्रा होती है। इसके अतिरिक्त इसमें रंजक पदार्थ भी मिलाया जाता है।  &lt;br /&gt;
====पनीर====    &lt;br /&gt;
पनीर भी छेना की ही तरह दुग्ध उत्पाद है तथा इसे बनाने की विधि भी लगभग छेना की तरह है। इसे भी अम्ल द्वारा फाड़कर बनाया जाता है परंतु पनीर को पनीर जल से अलग करने के बाद लकड़ी के साँचे में भरकर 2 किग्रा. प्रति वर्ग सेमी. का दबाव डालकर शेष जल को पनीर से अलग किया जाता है। फिर इसे आवश्यकता अनुसार टुकड़ों में काटकर 2-3 घण्टे तक ठण्डे जल में डुबो कर रखा जाता है। &lt;br /&gt;
====घी==== &lt;br /&gt;
{{Main|घी}}&lt;br /&gt;
घी भी एक प्रकार का दुग्ध उत्पाद ही है। यह मक्खन तथा क्रीम को एक निश्चित ताप पर गर्म करके प्राप्त किया जाता है। इसमें दुग्ध वसा की मात्रा 99% से अधिक होती है। शेष जल और [[छाछ]] का होता है। शुद्ध घी में डाइएसीटिल की उपस्थिति के कारण एक विशेष प्रकार की सुवास होती है।  [[उत्तर प्रदेश]], [[राजस्थान]] तथा [[पंजाब]] घी उत्पादन के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। &lt;br /&gt;
====खोवा====  &lt;br /&gt;
दूध को गर्म करके उसके पानी को आंशिक रूप से सुखाकर तैयार किया गया उत्पाद खोवा कहलाता है। यह विशुद्ध रूप से भारतीय दुग्ध उत्पाद है। यह मूल रूप से मिठाई आदि बनाने के काम आता है। इस प्रकार खोवा या मावा एक आंशिक शोषित दुग्ध पदार्थ है जो दूध को एक खुले बर्तन में गर्म करके तैयार किया जाता है। &lt;br /&gt;
====दुग्ध चूर्ण====  &lt;br /&gt;
दूध को पूर्ण वाष्पित करके बनाया गया वह दुग्ध पदार्थ जिसमें नमीं अंश अधिकतम 3% हो, दुग्ध चूर्ण कहलाता है। जब यह ''संपूर्ण दूध'' और ''सप्रेटा दूध'' से बनाया जाता है तो इसे क्रमशः संपूर्ण दूग्ध चूर्ण और स्किम्ड दुग्ध चूर्ण कहते हैं। &lt;br /&gt;
==दुग्ध उद्योग==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भारत में दुग्ध उत्पादन वर्षवार विवरण &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! वर्ष  &lt;br /&gt;
! दुग्ध उत्पादन (लाख टन में) &lt;br /&gt;
! वार्षिक वृद्धि % में &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1950-1951     &lt;br /&gt;
|  170                                          &lt;br /&gt;
|  -&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1960-1961 &lt;br /&gt;
|  200                                    &lt;br /&gt;
|  17.65%&amp;lt;sup&amp;gt;*&amp;lt;/sup&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;*=दशकीय वृद्धि&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1970-1971             &lt;br /&gt;
|  212                                    &lt;br /&gt;
| 0.6.00%&amp;lt;sup&amp;gt;*&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1980-1981           &lt;br /&gt;
|  316                             &lt;br /&gt;
|  32.91%&amp;lt;sup&amp;gt;*&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1990-1991            &lt;br /&gt;
|  539                           &lt;br /&gt;
|  70.56%&amp;lt;sup&amp;gt;*&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1991-1992            &lt;br /&gt;
|  557                                     &lt;br /&gt;
|  03.33%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;+ =वार्षिक वृद्धि&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1992-1993   &lt;br /&gt;
| 580  &lt;br /&gt;
| 04.12%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1993-1994                                                   &lt;br /&gt;
| 606&lt;br /&gt;
| 04.48%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1994-1995 &lt;br /&gt;
| 638   &lt;br /&gt;
| 05.28%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1995-1996  &lt;br /&gt;
| 662    &lt;br /&gt;
| 03.60%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1996-1997&lt;br /&gt;
| 691    &lt;br /&gt;
| 04.38% &amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1997-1998  &lt;br /&gt;
| 721  &lt;br /&gt;
|  04.34%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1998-1999     &lt;br /&gt;
| 754 &lt;br /&gt;
|  04.57%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1998-1999             &lt;br /&gt;
| 754 &lt;br /&gt;
|  04.57%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1999-2000     &lt;br /&gt;
| 783 &lt;br /&gt;
| 03.84%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2000-2001       &lt;br /&gt;
| 808 &lt;br /&gt;
| 03.19%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2001-2002 &lt;br /&gt;
| 844&lt;br /&gt;
| 04.45%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2002-2003 &lt;br /&gt;
| 867&lt;br /&gt;
| 02.75%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2003-2004&lt;br /&gt;
| 881&lt;br /&gt;
| 01.61%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2004-2005 &lt;br /&gt;
|  92.5&lt;br /&gt;
|  04.99%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2005-2006  &lt;br /&gt;
| 971&lt;br /&gt;
| 04.97%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2006-2007&lt;br /&gt;
| 1009&lt;br /&gt;
| 03.92%&amp;lt;sup&amp;gt;+&amp;lt;/sup&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2007-2008&lt;br /&gt;
| 1020&lt;br /&gt;
| 01.09% &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
डेयरी फार्मिंग या दुग्ध उद्योग के लिए पाला जाने वाला मुख्य पशु गाय है। विश्व में अधिकांश गाय पश्चिमी [[यूरोप]] में विशेष रूप से ब्रिटेन, नीदरलैण्ड और स्वीट्जरलैण्ड में पायी जाती है। गर्नसी और अलडर्नो गायों में गर्नसी छेटे द्वीप और अलडर्नो इंग्लिश चैनल में स्थित द्वीप समूहों व उत्तरी-पूर्वी फ्रांस के नदी तट पर पायी जाती है। जर्सी दुग्ध उत्पादन प्रजाति की सबसे छोटी गाय होती है। इसके दूध में अत्यधिक उच्च स्तर पर मक्खन पाया जाता है। ''फ्रीसियन'' प्रजाति की गाय दुग्ध उत्पादन की सबसे बड़ी गाय है। दुग्धोत्पादक पशुओं में यह सर्वाधिक दुग्ध देने वाली नस्ल है। इसे ''हॉल्सटीन'' भी कहा जाता है। गाय की एक अन्य प्रजाति स्विस ब्राउन है। इसके दूध का उपयोग स्विट्जरलैण्ड के प्रसिद्ध चॉकलेटों में किया जाता है। पश्चिमी यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिणी महादेश के शीतोष्ण भाग अत्यधिक दुग्ध उत्पादक क्षेत्र है। इसके अतिरिक्त बाल्टिक राज्य, बेलारूस, रूस और कजाकिस्तान अन्य प्रमुख दुग्ध उत्पादन क्षेत्र है। सं.रा. अमेरिका दूध, मक्खन और पनीर उत्पादन का प्रमुख उत्पादन देश है। वर्तमान में [[भारत]] सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है। नीदरलैण्ड कंडेस्ड और पाउडर दूध का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। न्यूजीलैण्ड मक्खन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। &lt;br /&gt;
==भारत में दुग्ध उद्योग==&lt;br /&gt;
{{Main|दुग्ध उद्योग}} &lt;br /&gt;
दूध तथा उससे सम्बन्धित उत्पादों के उद्योग के नाम से जाना जाता हैं तथा दुग्ध उद्योग के विकास के चल रहे कार्यों का अध्ययन दुग्ध विज्ञान के तहत करते हैं। डेरी उद्योग का महत्व सिर्फ़ दूध और इससे बनने वाले पदार्थों तक सीमित नहीं है। इससे लाखों छोटे/मझोले किसानों तथा खेतिहर मजदूरों को पूरक रोजगार तथा आय का नियमित स्रोत प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
[[भारत]] में आज भी [[कृषि]] राष्ट्रीय आय का एक मुख्य स्रोत है। देश में बढ़ते औद्योगीकरण के कारण देश की राष्ट्रीय आय में कृषि आय नकारात्मक परिवर्तन रहा है। वर्ष [[1982]]-[[1983]], [[1988]]-[[1989]], [[1989]]-[[1990]]- एवं [[1990]]-[[1991]] में कुल राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा क्रमशः 36.47, 31%, 30.4% एवं 31.6% था। वर्ष [[2006]]-[[2007]] में यह भागीदारी घटकर 18.57% रह गयी है। कृषि आय का एक मुख्य स्रोत डेरी उद्योग है। कुल राष्ट्रीय कृषि उत्पाद का भारी हिस्सा दुग्ध उद्योग से प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्व में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भारत वर्ष 2000 में पहले स्थान पर पहुँच गया। परंतु प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता 246 ग्राम प्रति दिन (2007-08) अनुमानित है जो कि न्यूनतम अनिवार्यता 210 ग्राम से थोड़ा अधिक है। 2006-07 के दौरान कुल दुग्ध उत्पादन 1009 लाख टन हुआ जबकि 2007-08 के दौरान दूध का कुल उत्पादन 1020 लाख टन होने की प्रत्याशा है। भारत में सबसे अधिक दुग्ध उत्पादन [[उत्तर प्रदेश]] में होता है। दूसरे, तीसरे और चौथे नम्बर पर क्रमशः [[पंजाब]], [[राजस्थान]] तथा [[आन्ध्र प्रदेश]] व [[बिहार]] आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष [[2005]] के बाद प्रति वर्ष दो करोड़ टन दूध की कमी की आशंका व्यक्त की गयी है। एक गैर-सरकारी संगठन इनिसिएटीव ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2005 के बाद भारत में प्रति वर्ष 2 करोड़ टन दूध की कमी रहेगी। [[मुंबई]] के इस संगठन की एक रिपोर्ट ह्वाइट रिएलिटी में कहा गया है कि पिछले वर्षों के अनुसार सरकार की नीति शहरी दूध उपभोक्ताओं पर केन्द्रित है, जहाँ दूध आसानी से उपलब्ध हैं। गाँवों में प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता सिर्फ़ 121 ग्राम प्रति दिन है जो उसकी पोषाहार अनुपात का सिर्फ़ 50 प्रतिशत है। विश्व दुग्ध उत्पादन का कुल व्यापार दस हज़ार मिलियन डॉलर है, जिसमें [[भारत]] की हिस्सेदारी सिर्फ़ 10 मिलियन डॉलर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पेय पदार्थ}}{{दुग्ध उत्पाद}}&lt;br /&gt;
[[Category:खान पान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पेय पदार्थ]]&lt;br /&gt;
[[Category:विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:दूध]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=264815</id>
		<title>मेघालय की संस्कृति</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=264815"/>
		<updated>2012-03-22T08:34:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;यह क्षेत्र जनजातीय संस्कृति और लोक परम्परा से समृद्ध है। [[भैंस]] के सींगों, [[बाँसुरी]] और [[मृदंग|मृदंगों]] से निकली स्वर लहरियों के साथ [[नृत्य]] और मदिरापान यहाँ के सामाजिक समारोहों व धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग है। [[विवाह]] सम्बन्ध अपने कुल-गोत्र के बाहर होते हैं। 19वीं [[सदी]] के मध्य में ईसाईयत के आगमन और उसके साथ जुड़ी सख़्त नैतिकता ने अनेक जनजातीय और सामुदायिक संस्थाओं को क्षति पहुँचाई है। गारो जाति के लोगों में एक विचित्र प्रथा यह है कि शादी के बाद सबसे छोटा दामाद अपने सास-ससुर के घर आकर रहने लगता है और उसकी सास के मायके में उसके ससुर का प्रतिनिधि नोकरोम बन जाता है। यदि ससुर की मौत हो जाती है तो, नोकरोम की उसकी विधवा सास की शादी कर दी जाती है (और इस [[विवाह]] को दाम्पत्य की सम्पूर्णता भी प्रदान की जाती है) और इस तरह वह माँ और बेटी, दोनों का पति बन जाता है। यह रिवाज अब ख़त्म होता जा रहा है। ख़ासियों में पहले नरबलि की प्रथा भी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[मेघालय]] राज्य में अनेक गुफ़ाएँ, पर्वत शिखर, बाग़, [[झील]]-रिज़ॉर्ट स्थल, ख़ूबसूरत दृश्यावलियाँ, गर्म पानी के सोते और जलप्रपात हैं। प्रमुख पर्यटक स्थल हैं-[[शिलांग]], [[उमियाम झील|उमियाम]], चेरापूँजी, मॉसिनराम, जाक्रीयम, माईरांग, जोवाई, नार्तियांग, थदलाशीन, तुरा, सीजू और बलपाक्रम राष्ट्रीय उद्यान। 1993 में लगभग 1,57,000 पर्यटक राज्य में आए।&lt;br /&gt;
;त्‍योहार&lt;br /&gt;
*[[मेघालय]] में ‘का पांबलांग-नोंगक्रेम’ खासियों का एक प्रमुख धार्मिक त्‍योहार है। &lt;br /&gt;
*जो पांच दिन तक मनाया जाता है। इसे 'नोंगक्रेम' के नाम से भी जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*यह शिलांग से लगभग 11 किमी की दूरी पर स्थित 'स्मित' नामक गांव में मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*'शाद सुक मिनसीम' [[खासी जाति|खासियों]] का महत्‍वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार हर साल [[अप्रैल]] के दूसरे हफ़्ते में शिलांग में मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*'बेहदीनखलम जयंतिया' आदिवासियों का महत्‍वपूर्ण त्‍योहार है। &lt;br /&gt;
*यह [[जुलाई]] [[माह]] में जयंतिया पहाडियों के जोवई कस्‍बे में मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*गारो आदिवासी सलजोंग ([[सूर्य देवता]]) नामक [[देवता]] के सम्‍मान में [[अक्टूबर]]-[[नवंबर]] में 'वांगला' नामक त्‍योहार मनाते हैं। &lt;br /&gt;
*यह त्‍योहार लगभग एक हफ्ते तक मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की संस्कृति}}&lt;br /&gt;
[[Category:मेघालय]]&lt;br /&gt;
[[Category:मेघालय की संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=264812</id>
		<title>मृत्युमहिषीदानविधि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=264812"/>
		<updated>2012-03-22T08:32:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*मृत्युमहिषीदानविधि ग्रन्थ में किसी के मृत्यु के समय [[भैंस]] के दान का वर्णन हैं। &lt;br /&gt;
*[[भारत]] में धार्मिक ग्रन्थों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित [[हिन्दू धर्म]] का एक [[ग्रन्थ]] है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ}}&lt;br /&gt;
[[Category:धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>सदस्य:रूबी/अभ्यास</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ प्रमुख फ़िल्में&lt;br /&gt;
! क्रमांक &lt;br /&gt;
| (1) &lt;br /&gt;
| (2) &lt;br /&gt;
| (3)	&lt;br /&gt;
| (4) &lt;br /&gt;
| (5) &lt;br /&gt;
| (6) &lt;br /&gt;
| (7) &lt;br /&gt;
| (8) &lt;br /&gt;
| (9)	&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! सन &lt;br /&gt;
| 1983 &lt;br /&gt;
| 1979 &lt;br /&gt;
| 1971 &lt;br /&gt;
| 1971 &lt;br /&gt;
| 1960 &lt;br /&gt;
| 1958 &lt;br /&gt;
|1956 &lt;br /&gt;
| 1955 &lt;br /&gt;
| 1950 	&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! फ़िल्म नाम &lt;br /&gt;
| रज़िया सुल्तान &lt;br /&gt;
| घर की लाज &lt;br /&gt;
| ज्वाला &lt;br /&gt;
| एक नारी एक ब्रह्मचारी &lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
| यहूदी &lt;br /&gt;
| राज हठ &lt;br /&gt;
| कुंदन &lt;br /&gt;
| शीश महल&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>साँचा:जीव जन्तु</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=जीव जन्तु&lt;br /&gt;
|title =जीव जन्तु जगत&lt;br /&gt;
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|list1style=&lt;br /&gt;
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|group4style=&lt;br /&gt;
|list4=[[गंगा डॉल्फ़िन]] '''·''' [[मछली]] '''·''' [[शार्क]] '''·''' [[बंबिल (बॉम्बे डक)]] '''·''' [[मरल मछली|मरल]]&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:विज्ञान के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
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		<title>वार्ता:भैंस</title>
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		<updated>2012-03-22T08:09:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{वार्ता}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
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		<title>भैंस</title>
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		<updated>2012-03-22T08:07:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{पुनरीक्षण}} {{tocright}} '''भैंस''' (''ब्यूबेलस ब्यूबेलिस''), यह गो...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''भैंस''' (''ब्यूबेलस ब्यूबेलिस''), यह गोवंश (बोविडी) का जुगाली करने वाला स्तनपायी प्राणी है। भैंस को प्राचीन समय से ही [[एशिया]] में पालतू बना लिया गया था। &lt;br /&gt;
==लक्षण==&lt;br /&gt;
बड़े और भारी शरीर वाले इस जानवर की ऊँचाई कंधे तक 1.5 से 1.8 मीटर या इससे अधिक, लंबाई 2.4 से 2.8 मीटर और वज़न लगभग 1000 किग्रा तक होता है। इसका शरीर धूसर काले या गहरे भूरे रंग का होता है और इसके शरीर पर बहुत कम बाल होते हैं तथा इसके 2 मीटर तक लंबे सींग पीछे की ओर निकले तथा ऊपर मुड़े होते है।&lt;br /&gt;
==प्रजातियाँ==&lt;br /&gt;
भैंस की मुख्यतः दो क़िस्मे हैं, दक्षिण चीन और दक्षिण-पूर्ण एशिया के धान की खेती वाले इलाकों में पाई जाने वाली दलदली क्षेत्र की भैंस मुख्यतः भारवाही पशु है; इसका [[दूध]] कम ही निकाला जाता है, लेकिन काम करने की आयु समाप्त होने पर इसका मांस खाने के काम आता है। दूसरी क़िस्म नदी क्षेत्र वाली भैंस है, जिसे [[भारत]], [[पाकिस्तान]], दक्षिण पूर्व एशिया और और [[मिस्र]] में मुख्यतः दुग्ध उत्पादन के लिए पाला जाता है और मांस एवं भारवहन के लिए भी इसका उपयोग होता है। नम जलवायु और जलाक्रांत क्षेत्रों में काम करने के लिए भैंस उपयुक्त जानवर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पशु पक्षी}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्तनधारी जीव]][[Category:प्राणि विज्ञान]][[Category:विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:वन्य प्राणी]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Isfahan-Carpet.jpg&amp;diff=264799</id>
		<title>चित्र:Isfahan-Carpet.jpg</title>
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		<updated>2012-03-22T07:51:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[इस्फ़ाहानी क़ालीन भारतीय|इस्फ़ाहानी क़ालीन]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/theheartindifferentkeys/ Asaf Braverman]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/theheartindifferentkeys/3458828419 Square isfahan Carpet (Private Collection)]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/theheartindifferentkeys/ Ark in Time's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=इस्फ़ाहानी क़ालीन फ़र्श को ढकने के लिए छोटे से लेकर बहुत बड़े आकार वाले फ़ारसी हेराती डिज़ाइनों की नक़ल के रूप में भारत में प्रारंभिक तौर पर 17वीं शताब्दी में हस्तनिर्मित हुई। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}}&lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8&amp;diff=264798</id>
		<title>भारतीय इस्फ़ाहानी क़ालीन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8&amp;diff=264798"/>
		<updated>2012-03-22T07:50:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Isfahan-Carpet.jpg|thumb|250px|इस्फ़ाहानी क़ालीन]]&lt;br /&gt;
'''इस्फ़ाहानी क़ालीन''' फ़र्श को ढकने के लिए छोटे से लेकर बहुत बड़े आकार वाले फ़ारसी हेराती डिज़ाइनों की नक़ल के रूप में भारत में प्रारंभिक तौर पर 17वीं शताब्दी में हस्तनिर्मित हुई। &lt;br /&gt;
*इस्फ़ाहान नाम का प्रयोग इस विश्वास के कारण किया गया था कि फ़ारसी क़ालीन भारत के क़ालीनों से बेहतर बिकते हैं।&lt;br /&gt;
*प्रतीत होता है कि विभिन्न [[ईस्ट इंडिया कंपनी|ईस्ट-इंडिया कंपनियाँ]] बड़ी संख्या में इन क़ालीनों का निर्यात [[यूरोप]], विशेषकर [[पुर्तग़ाल]] और हॉलैंड व बेल्जियम आदि देशों को करती थीं। &lt;br /&gt;
*इन क़ालीनों को 17वीं शताब्दी के डच चित्रों में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
*[[अंगूर]] के पत्तों व फूलों वाले अलंकृत मिटिफ़ एक जामुनी-[[लाल रंग|लाल]] पृष्ठभूमि पर प्रयोग किए जाते थे; किनारा अक्सर समान मूल भाव वाला [[नीला रंग|नीला]]-[[हरा रंग|हरा]] होता था।&lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी क़ालीन [[आगरा]] में बनाए जाते होगे, जहाँ ऐसे क़ालीन 19वीं शताब्दी में भी बनाए जा रहे थे। &lt;br /&gt;
*संभवतः दक्कन में अधिक [[रंग]]-बिरंगे क़ालीन बनाए गए, लेकिन उनका निर्यात नहीं किया गया। &lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी शब्द का प्रयोग 19वीं शताब्दी के अनाकार्षक और असमृद्ध डिज़ाइनों के भारतीय क़ालीनों के लिए भी किया गया है, जिन्हें 17वीं शताब्दी के क़ालीनों से लिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:हस्तशिल्प कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Isfahan-Carpet.jpg&amp;diff=264795</id>
		<title>चित्र:Isfahan-Carpet.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Isfahan-Carpet.jpg&amp;diff=264795"/>
		<updated>2012-03-22T07:48:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8&amp;diff=264792</id>
		<title>वार्ता:भारतीय इस्फ़ाहानी क़ालीन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8&amp;diff=264792"/>
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		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>भारतीय इस्फ़ाहानी क़ालीन</title>
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'''इस्फ़ाहानी क़ालीन''' फ़र्श को ढकने के लिए छोटे से लेकर बहुत बड़े आकार वाले फ़ारसी हेराती डिज़ाइनों की नक़ल के रूप में भारत में प्रारंभिक तौर पर 17वीं शताब्दी में हस्तनिर्मित हुई। &lt;br /&gt;
*इस्फ़ाहान नाम का प्रयोग इस विश्वास के कारण किया गया था कि फ़ारसी क़ालीन भारत के क़ालीनों से बेहतर बिकते हैं।&lt;br /&gt;
*प्रतीत होता है कि विभिन्न [[ईस्ट इंडिया कंपनी|ईस्ट-इंडिया कंपनियाँ]] बड़ी संख्या में इन क़ालीनों का निर्यात [[यूरोप]], विशेषकर [[पुर्तग़ाल]] और हॉलैंड व बेल्जियम आदि देशों को करती थीं। &lt;br /&gt;
*इन क़ालीनों को 17वीं शताब्दी के डच चित्रों में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
*[[अंगूर]] के पत्तों व फूलों वाले अलंकृत मिटिफ़ एक जामुनी-[[लाल रंग|लाल]] पृष्ठभूमि पर प्रयोग किए जाते थे; किनारा अक्सर समान मूल भाव वाला [[नीला रंग|नीला]]-[[हरा रंग|हरा]] होता था।&lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी क़ालीन [[आगरा]] में बनाए जाते होगे, जहाँ ऐसे क़ालीन 19वीं शताब्दी में भी बनाए जा रहे थे। &lt;br /&gt;
*संभवतः दक्कन में अधिक [[रंग]]-बिरंगे क़ालीन बनाए गए, लेकिन उनका निर्यात नहीं किया गया। &lt;br /&gt;
*भारतीय-इस्फ़ाहानी शब्द का प्रयोग 19वीं शताब्दी के अनाकार्षक और असमृद्ध डिज़ाइनों के भारतीय क़ालीनों के लिए भी किया गया है, जिन्हें 17वीं शताब्दी के क़ालीनों से लिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:हस्तशिल्प कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>वार्ता:बूटा</title>
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		<title>बूटा</title>
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बूटा''' [[मुग़लकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला|मुग़ल-भारतीय कला]] के सबसे महत्त्वपूर्ण सजावटी कला रूपांकनों में से एक, जो विशेष शैलीगत पत्तियों और फूलों वाली कोमल टहनियों से बनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*इसका उपयोग [[वास्तुकला]] और चित्रकारी, [[वस्त्र|वस्त्रों]], मीनाकारी और अन्य दूसरी सज्जा-कलाओं में किया जाता है।&lt;br /&gt;
*मुग़ल बादशाह [[जहाँगीर]] (1605-27) के शासनकाल में यह कला महत्त्व पाने लगी और शहाजहाँ (1628-58) के समय तक इसका निरंतर उपयोग किया गया। &lt;br /&gt;
*[[आगरा]] स्थित [[ताजमहल]] (लगभग 1632-49) में इसकी नफ़ासत और [[रंग]]-सौंदर्य के उत्कृष्ट उदहारण देखे जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
*यह कला रूपांकन 18वीं शताब्दी के आसपास कुछ स्थिर और जड़ होने लगा, किंतु इसकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>चित्र:Rani jindan.jpg</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[ज़िन्दाँ रानी]] &lt;br /&gt;
|चित्रांकन=&lt;br /&gt;
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|प्रयोग अनुमति=हरप्रीत सिंह नाज़ द्वारा भारतकोश को विशेष रूप से उपलब्ध   &lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=रानी ज़िन्दाँ पिंड चॉढ ([[सियालकोट]], तसील जफरवाल) निवासी सरदार मन्ना सिंह औलख जाट की [[पुत्री]] थी। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>साँचा:भाषा और लिपि</title>
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:भाषा संबंधित साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>वार्ता:बुरुशास्की भाषा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=264779"/>
		<updated>2012-03-22T06:53:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{वार्ता}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>पहाड़ी बोली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%80_%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=264778"/>
		<updated>2012-03-22T06:53:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''पहाड़ी बोली''' भारतीय-आर्य परिवार से जुड़ी [[भाषा|भाषाओं]] का एक समूह है, जो मुख्यत: [[हिमालय]] के निचले क्षेत्रों में बोली जाती हैं। &lt;br /&gt;
*पहाड़ी का [[हिन्दी]] में शब्दार्थ ‘पहाड़ का’ है। &lt;br /&gt;
*इस समूह को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है- &lt;br /&gt;
#पूर्वी पहाड़ी में नेपाली मुख्य भाषा है, जो प्रारंभिक रूप से नेपाल में बोली जाती है। &lt;br /&gt;
#मध्य पहाड़ी भाषाएं [[उत्तराखंड|उत्तरांचल]] राज्य में &lt;br /&gt;
#पश्चिमी पहाड़ी भाषाएं [[हिमाचल प्रदेश]] में [[शिमला]] के आसपास बोली जाती हैं। &lt;br /&gt;
*इस समूह की सबसे प्रमुख भाषा नेपाली (नैपाली) है, जिसे ख़ास-खुरा और गोरख़ाली (गुरख़ाली) भी कहते हैं। क्योंकि नेपाल के कई निवासी तिब्बती-बर्मी भाषाएं बोलते हैं, इसलिए नेपाली में तिब्ब्ती-बर्मी बोली के शब्द और मुहावरे शामिल हो गए हैं। &lt;br /&gt;
*नेपाली भाषा को 1769 में [[गोरखा]] विजेता [[नेपाल]] ले गए। &lt;br /&gt;
*मध्य पहाड़ी वर्ग में कई बोलियां हैं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सिरमौनी, क्योंठाली, जौनसारी, चमेयाली, चुराही, मंडियाली, गादी और कुलूई शामिल हैं। &lt;br /&gt;
*पहाड़ी बोलियों की कई भाषाशास्त्रीय विशेषताएं [[राजस्थानी बोलियाँ|राजस्थानी]] और [[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]] भाषाओं के समान हैं।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
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{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
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		<title>बुरुशास्की भाषा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=264776"/>
		<updated>2012-03-22T06:51:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{पुनरीक्षण}} '''बुरुशास्की भाषा''' पश्चिमोत्तर [[कश्मीर]...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बुरुशास्की भाषा''' पश्चिमोत्तर [[कश्मीर]] के गिलगित भूखंड में रहने वाले बुरुश लोगों द्वारा बोली जाने वाली [[भाषा]] है। &lt;br /&gt;
*बुरुशास्की एक अलग-थलग पड़ी हुई भाषा है, जिसका विश्य की किसी अन्य भाषा के साथ संबंध ज्ञात नहीं है।&lt;br /&gt;
*इस भाषा में [[संज्ञा]] को चार वर्गों या लिंगों के अनुरूप चिह्नित किया गया है:&lt;br /&gt;
#पुरुष&lt;br /&gt;
#स्त्री&lt;br /&gt;
#किसी भी लिंग के पशु और कुछ निर्जिव वस्तुएँ &lt;br /&gt;
#अन्य सभी निर्जिव वस्तुएँ&lt;br /&gt;
*अन्य व्याकरणीय विशेषताओं में संज्ञाओं तथा [[विशेषण|विशेषणों]] के लिए व [[सर्वनाम|सर्वनामों]] में पुरुष अथवा संदर्भ वस्तु को प्रदर्शित करने के लिए बहुवचन प्रत्यय शामिल हैं, [[क्रिया|क्रियाओं]] के लिए अन्य पुरुष के साथ समाप्त होने वाले शब्दों में भी प्रत्यय लगाया जाता है। ये सब लिंग के अनुरूप परिवर्तनशील हैं। &lt;br /&gt;
*बुरुशास्की भाषा में कुछ सार्वनामिक उपसर्ग भी हैं। इस भाषा की कोई [[लिपि]] नहीं है।&lt;br /&gt;
*कश्मीर में यासिन नदी घाटी में बुरुशास्की की कुछ हद तक परिवर्तित वर्चिकवार या वर्शिकवार का उपयोग होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>जिन्दाँ रानी</title>
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		<title>ज़िन्दाँ रानी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Rani_jindan.jpg|thumb|महारानी ज़िन्दाँ]]&lt;br /&gt;
'''रानी ज़िन्दाँ''' पिंड चॉढ ([[सियालकोट]], तसील जफरवाल) निवासी सरदार मन्ना सिंह औलख जाट की [[पुत्री]] थी।&lt;br /&gt;
*ज़िन्दाँ रानी [[पंजाब]] के महाराज [[रणजीत सिंह]] की पाँचवी रानी तथा उनके सबसे छोटे बेटे [[दलीप सिंह]] की [[माँ]] थीं। &lt;br /&gt;
*1843 ई. में जब दलीप सिंह गद्दी पर बैठा तो वह नाबालिग था, अतएव ज़िन्दाँ रानी उसकी संरक्षिका बनी। परन्तु वह इस पद भार को सम्भाल नहीं सकी और 1845 ई. में प्रथम सिखयुद्ध छिड़ गया। &lt;br /&gt;
*जब 1846 ई. में [[लाहौर]] की संधि के द्वारा प्रथम सिखयुद्ध समाप्त हुआ तो ज़िन्दाँ रानी दलीप सिंह की संरक्षिका बनी रही। परन्तु उसकी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगी और 1848 ई. में षड्यंत्र रचने के अभियोग में उसे लाहौर से हटा दिया गया। द्वितीय सिखयुद्ध (1849 ई.) जिन कारणों से छिड़ा, उनमें एक कारण यह भी था। इस युद्ध में भी सिखों की हार हुई। &lt;br /&gt;
*युद्ध की समाप्ति पर दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया। &lt;br /&gt;
*[[लाहौर]] का राजप्रबंध अंग्रेज़ी सरकार के हाथ आने पुर कुछ गलतफहमी के कारण इस महारानी को गवर्नमैंट ने लहौरों ले जाकर पहले शेखूपुरे नज़रबंद रखा, फिर [[19 अगस्त]] 1849 को [[चुनार]] ([[उत्तर प्रदेश]], [[मिर्जापुर ज़िला|ज़िला मिर्जापुर]]) के खुंटे में कैद किया। यहाँ से यह फ़कीरी भेस में कैद से निकल कर [[नेपाल]] चली गई और वहाँ सम्मान सहित रही।&lt;br /&gt;
*1861 में महारानी जिन्दकौर अपने बेटो के दर्शन के लिए [[इंग्लैंड]] गयीं थी। वहाँ [[1 अगस्त]] 1863 को [[लंदन]] में इनका देहांत हुआ था तब यह 46 [[वर्ष]] की उम्र की थी। इनकी शव का दाह हिंदुस्तान के [[बम्बई]] अहाते के [[नासिक]] नगर में किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
*पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश' पृष्ठ संख्या-170&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{औपनिवेशिक काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:औपनिवेशिक काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:अंग्रेज़ी शासन]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>साँचा:इस्लाम धर्म</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE&amp;diff=264762"/>
		<updated>2012-03-22T06:05:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
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		<title>बुराक</title>
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		<updated>2012-03-22T06:05:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: बुराक़ को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[बुराक़]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>वार्ता:बुराक़</title>
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		<updated>2012-03-22T05:59:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>बुराक़</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BC&amp;diff=264755"/>
		<updated>2012-03-22T05:59:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: '{{पुनरीक्षण}} '''बुराक़''' इस्लामी इतिहास म...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बुराक़''' [[इस्लाम धर्म|इस्लामी]] इतिहास में एक जंतु, जिसने [[मुहम्मद|पैग़ंबर मुहम्मद]] को जन्नत तक पहुँचाया था। '[[सफ़ेद रंग]] का जानवर, आधा खच्चर, आधा गधा, जिसकी बग़लों में पंख थे...', बुराक़ का मूल वर्णन [[मक्का (अरब)|मक्का]] से येरुशलम तक मुहम्मद साहब की रात्रि-यात्रा (इस्रा) की कहानी में है, जो यह बताता है कि किस प्रकार नगरों के मध्य यात्रा को एक ही रात में पूरा कर लिया जाता था। कुछ परंपराओं में यह औरत के सिर और [[मोर]] की पूंछ वाला घोड़ा बन गया। जब रात्रि-यात्रा (इस्रा) की कहानी मुहम्मद साहब के जन्नत की सैर (मैराज) से जुड़ गई, तो बुराक़ ने जन्नत तक पहुँचने के माध्यम के रूप में सीढ़ी का स्थान ले लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कम से कम 14वीं शताब्दी से बुराक़ की किंवदंती, जिसकी कल्पना ग्रिफ़िन ([[गिद्ध]]), स्फ़िंक्स (रहस्यमय व्यक्ति) और किन्नरों के प्राचीन चित्रों के आधार पर की गई है। ईरानी लघु चित्रकला का पसंदीदा विषय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{इस्लाम धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:इस्लाम धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:इस्लाम धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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	<entry>
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		<title>अनुराधपुर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0&amp;diff=264752"/>
		<updated>2012-03-22T05:54:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Stupe-Anuradhapura.jpg|thumb|250px|स्तूप, अनुराधापुर]]&lt;br /&gt;
'''अनुराधापुर''' सिंहल ([[लंका]]) देश की राजधानी है। अनुराधापुर का उल्लेख [[बौद्ध]] ग्रंथ [[महावंश]] में हुआ है। &lt;br /&gt;
*इस नगर को एक भारतीय राजकुमार विजय के अनुरोध नामक सामंत ने वर्तमान मलवत्तुओय नदी के तट पर बसाया था। &lt;br /&gt;
*महावंश से यह विदित होता है कि यह नगर अनुराधा नक्षत्र में बसाया गया था, इसलिए इसका नामकरण अनुराधापुर हुआ। &lt;br /&gt;
*[[सम्राट अशोक]] के पुत्र महेन्द्र व पुत्री [[संघमित्रा]] द्वारा [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार हेतु लाई गयी बोधिवृक्ष की टहनी अनुराधापुर में स्थित [[महाविहार]] में लगायी गयी थी। जो आज भी मौजूद है।&lt;br /&gt;
*चौथी शताब्दी ईस्वी में [[बुद्ध|महात्मा बुद्ध]] का एक [[दाँत]] दंतपुरा (पुरी) से अनुराधापुर लाया गया था, जिसे अशोक द्वारा निर्मित धूपाराम [[स्तूप]] में रखा गया था। &lt;br /&gt;
*अनुराधापुर के खण्डहरों में देवानाम प्रिय तिस्सा (सम्राट अशोक) द्वारा लगभग 250 ई.पू. में बनवाया गया धूपाराम स्तूप, दुत्तुजेमुनु द्वारा निर्मित रूआवेलिसिया और सावती स्तूप और तिस्सा के पुत्र वातागामनीक द्वारा निर्मित अभयगिरि स्तूप मुख्य हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<title>महाविहार</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: Adding category :Category:बौद्ध मठ (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''महाविहार''' तीसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में सीलोन (वर्तमान [[श्रीलंका]]) की प्राचीन राजधानी, [[अनुराधापुर]] में स्थापित बौद्ध मठ है। सिंहली राजा देवनामपिय तिस्स ने भारतीय भिक्षु महेंद्र द्वारा उन्हें [[बौद्ध]] बनाए जाने के कुछ ही समय बाद इस मठ का निर्माण किया। &lt;br /&gt;
==बौद्धों का मुख्य गढ़==&lt;br /&gt;
क़रीब 10वीं सदी तक यह एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र और परंपरावादी (जैसे [[थेरवाद]]) बौद्धों का मुख्य गढ़ रहा। श्रीलंका में [[बौद्ध धर्म]] के अति महत्त्व के कारण महाविहार के भिक्षुओं की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि उनकी शक्ति एवं प्रभाव अक्सर [[धर्म]] की परिधि से बाहर निकलकर धर्मनिपेक्ष राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाविहार की धार्मिक प्रभुता को पहली बार पहली सदी ई.पू. बौद्ध भिक्षुओं के असनातनी समूह ने चुनौती दी, जिन्होंने अलग होकर अभयगिरि विहार की स्थापना की, हालांकि यह मठ संघ हमेशा विरोध करता रहा। मुख्य रूप से तीसरी एवं सातवीं सदी में कुछ समय के लिए राजसी संरक्षण के अलावा वह महाविहार संघ की आधिकारिक स्थिति पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा नहीं कर सका, परंतु महाविहार का केंद्रीय प्रभुत्व एवं प्रधानता धीरे-धीरे कम होती गई और 11वीं सदी में श्रीलंका के धार्मिक जीवन पर इसका प्रभाव नगण्य हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''महाविहार''' तीसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में सीलोन (वर्तमान [[श्रीलंका]]) की प्राचीन राजधानी, [[अनुराधापुर]] में स्थापित बौद्ध मठ है। सिंहली राजा देवनामपिय तिस्स ने भारतीय भिक्षु महेंद्र द्वारा उन्हें [[बौद्ध]] बनाए जाने के कुछ ही समय बाद इस मठ का निर्माण किया। &lt;br /&gt;
==बौद्धों का मुख्य गढ़==&lt;br /&gt;
क़रीब 10वीं सदी तक यह एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र और परंपरावादी (जैसे [[थेरवाद]]) बौद्धों का मुख्य गढ़ रहा। श्रीलंका में [[बौद्ध धर्म]] के अति महत्त्व के कारण महाविहार के भिक्षुओं की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि उनकी शक्ति एवं प्रभाव अक्सर [[धर्म]] की परिधि से बाहर निकलकर धर्मनिपेक्ष राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाविहार की धार्मिक प्रभुता को पहली बार पहली सदी ई.पू. बौद्ध भिक्षुओं के असनातनी समूह ने चुनौती दी, जिन्होंने अलग होकर अभयगिरि विहार की स्थापना की, हालांकि यह मठ संघ हमेशा विरोध करता रहा। मुख्य रूप से तीसरी एवं सातवीं सदी में कुछ समय के लिए राजसी संरक्षण के अलावा वह महाविहार संघ की आधिकारिक स्थिति पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा नहीं कर सका, परंतु महाविहार का केंद्रीय प्रभुत्व एवं प्रधानता धीरे-धीरे कम होती गई और 11वीं सदी में श्रीलंका के धार्मिक जीवन पर इसका प्रभाव नगण्य हो गया। &lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
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'''महाविहार''' तीसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में सीलोन (वर्तमान [[श्रीलंका]]) की प्राचीन राजधानी, [[अनुराधापुर]] में स्थापित बौद्ध मठ है। सिंहली राजा देवनामपिय तिस्स ने भारतीय भिक्षु महेंद्र द्वारा उन्हें [[बौद्ध]] बनाए जाने के कुछ ही समय बाद इस मठ का निर्माण किया। &lt;br /&gt;
==बौद्धों का मुख्य गढ़==&lt;br /&gt;
क़रीब 10वीं सदी तक यह एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र और परंपरावादी (जैसे [[थेरवाद]]) बौद्धों का मुख्य गढ़ रहा। श्रीलंका में [[बौद्ध धर्म]] के अति महत्त्व के कारण महाविहार के भिक्षुओं की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि उनकी शक्ति एवं प्रभाव अक्सर [[धर्म]] की परिधि से बाहर निकलकर धर्मनिपेक्ष राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाविहार की धार्मिक प्रभुता को पहली बार पहली सदी ई.पू. बौद्ध भिक्षुओं के असनातनी समूह ने चुनौती दी, जिन्होंने अलग होकर अभयगिरि विहार की स्थापना की, हालांकि यह मठ संघ हमेशा विरोध करता रहा। मुख्य रूप से तीसरी एवं सातवीं सदी में कुछ समय के लिए राजसी संरक्षण के अलावा वह महाविहार संघ की आधिकारिक स्थिति पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा नहीं कर सका, परंतु महाविहार का केंद्रीय प्रभुत्व एवं प्रधानता धीरे-धीरे कम होती गई और 11वीं सदी में श्रीलंका के धार्मिक जीवन पर इसका प्रभाव नगण्य हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बौद्ध धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>मान्यखेत</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;स्नेहा: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;'''मान्यखेत''' आधुनिक मालखेड़, [[भारत]] के [[कर्नाटक]] राज्य में एक प्राचीन शहर है। यह [[हैदराबाद]] से लगभग 135 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। &lt;br /&gt;
*[[राष्ट्रकूट वंश]] के शासक [[अमोघवर्ष प्रथम]] ने नौंवी शताब्दी में इसकी आधारशिला रखी थी और यह उनके वंश की राजधानी बना। &lt;br /&gt;
*972 ई. में परमार राजा सीयक ने इसे लूटा। अगले वर्ष इस वंश के पतन के बाद यह [[चालुक्य|चालुक्यों]] के अधिकार में चला गया, जिन्होंने कुछ समय तक इसे राजधानी बनाया। इसके बाद यह कभी भी अपना खोया हुआ वैभव प्राप्त नहीं कर सका और एक गाँव बनकर रह गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कर्नाटक के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:कर्नाटक]] &lt;br /&gt;
[[Category:कर्नाटक के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>स्नेहा</name></author>
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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[मगर जाति]] के लोग&lt;br /&gt;
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|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=मगर जाति [[नेपाल]] व [[भारत]] के [[सिक्किम]] राज्य में रहने वाली जाति के लोग है और यह मुख्यतः भारत के [[धौलगिरि पर्वत|धौलागिरि पर्वत-खंड]] के पश्चिमी और दक्षिण पार्श्व में भी रहते हैं। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>स्नेहा</name></author>
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		<title>मगर जाति</title>
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Magars.jpg|thumb|मगर जाति के लोग]]&lt;br /&gt;
'''मगर जाति''' [[नेपाल]] व [[भारत]] के [[सिक्किम]] राज्य में रहने वाली जाति के लोग है और यह मुख्यतः भारत के [[धौलगिरि पर्वत|धौलागिरि पर्वत-खंड]] के पश्चिमी और दक्षिण पार्श्व में भी रहते हैं। &lt;br /&gt;
*इनकी जनसंख्या 3,90,000 के क़रीब है। मगर तिब्बती-बर्मी परिवार की [[भाषा]] बोलते हैं। &lt;br /&gt;
*उत्तरी मगर लोगों का [[धर्म]] जहाँ लामा बौद्ध है, वहीं दूर दक्षिण में रहने वाले मगरों पर [[हिंदू धर्म]] का प्रभाव है। &lt;br /&gt;
*अधिकांश लोगों का जीवनाधार [[कृषि]] है। अन्य पशुपालक, कारीगर या दिहाड़ी मज़दूर हैं। &lt;br /&gt;
*गुरंग, राइ और अन्य नेपाली जाति समूहों के साथ इन्होंने भी ब्रिटिश व [[भारतीय सेना]] में गुरखा सैनिकों के रूप में शोहरत हासिल की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जातियाँ और जन जातियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:सिक्किम]]&lt;br /&gt;
[[Category:जातियाँ और जन जातियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना मार्च-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>चित्र:Magars.jpg</title>
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