सच्चिदानन्द सिन्हा  

सच्चिदानन्द सिन्हा
पूरा नाम डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा
जन्म 10 नवम्बर, 1871
जन्म भूमि भारत (आज़ादी पूर्व)
मृत्यु 6 मार्च, 1950
मृत्यु स्थान पटना, बिहार
पति/पत्नी राधिका
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र पत्रकारिता, वकालत, शिक्षा
विद्यालय पटाना विश्वविद्यालय
प्रसिद्धि संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष, पत्रकार, अधिवक्ता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी डॉ. सिन्हा ने बिहार की आवाज़ को बुलंद करने के लिए नवजागरण का शंखनाद किया। इस मुहिम में महेश नारायण, अनुग्रह नारायण सिन्हा, नन्दकिशोर लाल, राय बहादुर, कृष्ण सहाय जैसे मुट्ठीभर लोग ही थे।
डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा (अंग्रेज़ी: Sachchidananda Sinha, जन्म- 10 नवम्बर, 1871; मृत्यु- 6 मार्च, 1950) भारत के प्रसिद्ध सांसद, शिक्षाविद, अधिवक्ता तथा पत्रकार थे। वे भारत की संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे। बिहार को बंगाल से पृथक राज्य के रूप में स्थापित करने वाले लोगों में सच्चिदानन्द सिन्हा का नाम सबसे प्रमुख है। सन 1910 के चुनाव में चार महाराजों को परास्त कर वे केन्द्रीय विधान परिषद में प्रतिनिधि निर्वाचित हुए थे। वह प्रथम भारतीय थे, जिन्हें एक प्रान्त का राज्यपाल और हाउस ऑफ् लार्डस का सदस्य बनने का श्रेय प्राप्त है।

बिहार की स्थापना में योगदान

बिहार का इतिहास सच्चिदानन्द सिन्हा से शुरू होता है क्योंकि राजनीतिक स्तर पर सबसे पहले उन्होंने ही बिहार की बात उठाई थी। कहते हैं, डॉ. सिन्हा जब वकालत पास कर इंग्लैंड से लौट रहे थे, तब उनसे एक पंजाबी वकील ने पूछा था कि मिस्टर सिन्हा आप किस प्रान्त के रहने वाले हैं। डॉ. सिन्हा ने जब बिहार का नाम लिया तो वह पंजाबी वकील आश्चर्य में पड़ गया। इसलिए, क्योंकि तब बिहार नाम का कोई प्रांत था ही नहीं। उसके यह कहने पर कि बिहार नाम का कोई प्रांत तो है ही नहीं, डॉ. सिन्हा ने कहा था, नहीं है लेकिन जल्दी ही होगा। यह घटना फरवरी, 1893 की बात है।

डॉ. सिन्हा को ऐसी और भी घटनाओं ने झकझोरा, जब बिहारी युवाओं (पुलिस) के कंधे पर ‘बंगाल पुलिस’ का बिल्ला देखते तो गुस्से से भर जाते थे। डॉ. सिन्हा ने बिहार की आवाज़ को बुलंद करने के लिए नवजागरण का शंखनाद किया। इस मुहिम में महेश नारायण, अनुग्रह नारायण सिन्हा, नन्दकिशोर लाल, राय बहादुर, कृष्ण सहाय जैसे मुट्ठीभर लोग ही थे। उन दिनों सिर्फ ‘द बिहार हेराल्ड’ अखबार था, जिसके संपादक गुरु प्रसाद सेन थे। तमाम बंगाली अखबार बिहार के पृथककरन का विरोध करते थे। पटना में कई बंगाली पत्रकार थे जो बिहार के हित की बात तो करते थे लेकिन इसके पृथक् राज्य बनाने के विरोधी थे। बिहार अलग राज्य के पक्ष में जनमत तैयार करने या कहें माहौल बनाने के उद्देश्य से 1894 में डॉ. सिन्हा ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ ‘द बिहार टाइम्स’ अंग्रेज़ी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। स्थितियां बदलते देख बाद में ‘बिहार क्रानिकल्स’ भी बिहार अलग प्रांत के आन्दोलन का समर्थन करने लगा। 1907 में महेश नारायण की मृत्यु के बाद डॉ. सिन्हा अकेले हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी मुहिम को जारी रखा। 1911 में अपने मित्र सर अली इमाम से मिलकर केन्द्रीय विधान परिषद में बिहार का मामला रखने के लिए उत्साहित किया। 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सरकार ने बिहार और उड़ीसा के लिए एक लेफ्टिनेंट गवर्नर इन कौंसिल की घोषणा कर दी। यह डॉ. सिन्हा और उनके समर्थकों की बड़ी जीत थी। डॉ. सिन्हा का बिहार के नवजागरण में वही स्थान माना जाता है जो बंगाल नवजागरण में राजा राममोहन राय का। उन्होंने न केवल बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत की बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विकास के अग्रदूत भी बने।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जवाहरलाल का हिन्दी-प्रेम (हिन्दी) (पी.एच.पी) lakesparadise.com। अभिगमन तिथि: 7 जून, 2011।
  2. जवाहरलाल का हिन्दी-प्रेम (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) lakesparadise.com। अभिगमन तिथि: 7 जून, 2011।

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