प्रशासनिक हिन्दी का विकास -डॉ. नारायणदत्त पालीवाल  

सरकारी कामकाज कई वर्षों से अंग्रेज़ी में किया जा रहा है। अतः माध्यम परिवर्तन के लिए अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है। यह कहा गया है कि अनुवाद यदि सुंदर है तो वह ईमानदार नहीं हो सकता और ईमानदार है तो वह सुंदर नहीं हो सकता है। इस सुंदरता का आशय उस भाषा के लालित्य तथा उसकी प्रकृति के अनुकूल होने से है जिस भाषा में अनुवाद किया गया है। इसके लिए प्रारूप तथा पत्र की रूपरेखा मूूल से हिन्दी अथवा संबंधित क्षेत्रीय भाषा में तैयार करना अधिक उचित होगा।
टिकट, स्टेशन, प्लेटफार्म जैसे शब्दों के लिए यात्रा पत्र, गाड़ी-विश्राम-स्थल, यात्री विश्राम स्थल जैसे शब्दों का प्रयोग उचित नहीं है। कभी कभी शब्द गढ़ने का मोह हमें मक्षिकास्थाने मक्षिका की स्थिति में ला देता है। इससे अनुवाद में अस्वाभाविकता आ जाती है और वह अशुद्ध भी हो सकता है। जैसे ‘वैल इक्विप्ड हाॅस्पीटल’ का हिन्दी अनुवाद भूल से ‘कुओं से सज्जित अस्पताल’ किया जा सकता है, जो अशुद्ध है। अंग्रेजी में प्रचलित परिपाटी के अनुसार ‘द अंडर साइंड इज डाइरेक्टिड टू से’ का हिन्दी अनुवाद ‘निम्नहस्ताक्षरकर्ता या अधोहस्ताक्षरी को यह कहने का निदेश हुआ है’ किया जाता है। यह हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। इसी तरह ‘कोल्ड ब्लडैड मर्डर’ के लिये नृशंस हत्या न लिखकर ‘शीत रुधिर हत्या’ लिखना तथा ‘रेफ्रीजरेटर वाटर’ के लिए सरल व स्वाभाविक रूप में ‘मशीन का ठंडा पानी’ न लिखकर ‘प्रशीतनकृत जल’ लिखना कहां तक ठीक होगा, इसका स्वयं ही अनुमान लगाया जा सकता है। किंतु प्रचलन में इस तरह के कुछ विशेष शब्द हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल भी जान पड़ते हैं और उनका प्रयोग विशुद्ध रूप से शब्द के स्थान पर शब्द का अनुवाद होते हुए भी अटपटा नहीं लगता। जैसे- लालफीताशाही (रेडटेपिज़्म), श्वेत पत्र (व्हाईट पेपर), रजत जयंती (सिल्वर जुबली), ललित कला (फाइन आर्ट), शीर्षक (हैडिंग) आदि। अंग्रेजी के ‘इंटर’ शब्द के लिए हिन्दी ने संस्कृत ‘अंतर’ शब्द अपना लिया है और इसके साथ अन्य शब्द जोड़कर हिन्दी के अनेक शब्द बना लिए गए हैं जो बराबर प्रयोग में आ रहे हैं। जैसे अंतर-विद्यालीय, अंतर-राजयीय, अंतर्राष्ट्रीय, अंतर्देशीय, अंतर-प्रांतीय, अंतर-विभागीय आदि सभी इसी प्रकार रिंग सर्विस के लिए मुद्रिका सेवा अथवा तीव्र मुद्रिका जैस कठिन लगने वाले शब्द लोकप्रियता प्राप्त कर चुके हैं। इसी प्रकार मेघ-संदेश तथा आर्यभट जैसे प्रयोग भी उल्लेखनीय हैं।
आज हमें हिन्दी को ऐसा स्वरूप प्रदान करना है जो हमारे देश की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल तो हो ही अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी सुविधाजनक हो। इसके लिए हमें उदार दृष्टिकोण अपनाना होगा। संस्कृत का महत्व रहा है और है। हिन्दी के विकास में उसके योगदान की बात भी महत्वपूर्ण है। परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्रों में असीम विकास की संभावनाओं को देखते हुए हमें हिन्दी को एक ऐसी भाषा के रूप में विकसित करना है जो आज के युग में अभिव्यक्ति का सक्षम माध्यम हो। अतः केवल संस्कृतनिष्ठ भाषा की बात पर बल न देते हुए आज हमें भारत की सभी भाषाओं के लिए और विशेषकर प्रशासनिक क्षेत्र में राजभाषा तथा निजी क्षेत्र में संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी के पोषण के लिए अपना कर्तव्य समझना चाहिए। हिन्दी इस देश की भाषा है। इसका संबंध इस धरती, इस मिट्टी और यहां के जनमानस से है परंतु सभी क्षेत्रीय भाषाएं यहां की सभ्यता और संस्कृति की पोषक हैं। क्षेत्रीय भाषाओं का विकास प्रचार व प्रसार संपर्क भाषा हिन्दी के लिए संजीवनी शक्ति है। यदि सभी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि अपना ली जाए तो भाषायी एकता को बल मिलेगा ओर अंग्रेजी तो केवल सुविधा की भाषा कही जा सकती है। अतः इस देश में प्रत्येक नागरिक, कर्मचारी तथा अधिकारी का यह राष्ट्रीय कर्तव्य है कि वह अपने दैनिक कार्य व्यवहार मे इस देश की राजभाषा हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में प्रोत्साहित करे तथा संस्कृत के परिष्कृत, सारगर्भित एवं सहज शब्दों से इस भाषा को वह रूप दे जिससे भारतवर्ष के सभी प्रांतों में सहजगम्य सूत्र भाषा का विकास हो सके।
इस भाषायी एकता को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि भाषा की क्षेत्रीय एवं आंचलिक भाषाओं के शब्दों को भी राजभाषा की तकनीकि शब्दावली में यथोचित स्थान दिया जाए। देश की विभिन्न प्रांतों की राज्य सरकारें तत्तर्देशीय शब्दों को प्रशासनिक दृष्टि से लोकप्रिय बनाने में विशेष सहायक हो सकती हैं। नागपुर और माॅरीशस में आयोजित क्रमशः प्रथम तथा द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया है कि हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया जाए, जिससे इसको विश्व भाषा का स्वरूप प्राप्त हो सके। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम भारत के प्रत्येक राज्य में वहां की क्षेत्रीय भाषा को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करें और राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी को उसका अपेक्षित स्थान दिलाएं। आशा है तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन से इस दिशा में और अधिक सफलता मिलेगी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोनियर विलियम, हिंदुइज्म, (के.एम.मुंशी द्वारा संपादित 'इंडिया इन हैरिटेंस' जिल्द 2, पृ. 91 राधाकुमुद मुखर्जी द्वारा उद्धृत

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