प्रशासनिक हिन्दी का विकास -डॉ. नारायणदत्त पालीवाल  

प्रारंभ में यह व्यवस्था थी कि अंग्रेजी का प्रयोग 1965 तक चलता रहे तथा बीच में हिन्दी को विकसित रूप दे दिया जाए। भाषा के प्रश्न पर 1965 में खेर आयोग की स्थापना की गई और उस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए 1957 में पंत समिति बनाई गई। इस आयोग तथा समिति दोनों ने जहां हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने की सिफारिश की वहीं अंग्रजी का प्रयोग 1965 के बाद भी जारी रखने की सिफारिश की। इन परिस्थितियों को कार्य रूप देने के लिए 1963 में संसद द्वारा राजभाषा अधिनियम 1963 पास किया गया। इसके अनुसार यह व्यवस्था की गई कि संघ के जिन कार्यों के लिए 26 जनवरी, 1965 से पहले अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता था उनके लिए उस तारीख के बाद भी हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है। बाद में परिस्थितियां बदलीं और 1967 में राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 1967 पास किया गया। इस प्रकार यह व्यवस्था हुई कि ‘हिन्दी ही संघ की राजभाषा होगी, किंतु अंग्रेजी के इस्तेमाल की छूट तब तक बनी रहेगी, जब तक हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमंडल अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त करने के लिए संकल्प न पारित करें और उनके संकल्पों पर विचार करने के बाद संसद के दोनों सदन भी ऐसा ही न करें।’ इस प्रकार कानून के विचार से सरकारी कागजपत्रों, लिखा पढ़ी और दैनिक कार्यों में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं को चलाने की व्यवस्था हुई। हाल ही में भारत सरकार द्वारा हिन्दी के संबंध में एक अधिसूचना जारी की गई है जिससे प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी के व्यापक प्रयोग की व्यवस्था की गई है।

हिन्दी में तकनीकि शब्दावली का विकास

हिन्दी को प्रशासनिक कार्याें में लाने के लिए सबसे पहले तकनीकी शब्दावली की आवश्यकता पड़ी। इस दिशा में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय तथा वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने बड़ा काम किया। उनके प्रयास से विभिन्न विषयों की शब्दावली के संकलन तैयार किए गए और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रयोग के लिए पारिभाषिक शब्द संग्रह बनाए गए। यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत की शब्द निर्माण सामर्थ्य की बराबरी कोई भाषा नहीं कर सकती। संस्कृत की लगभग 2000 धातुएं अनेक शब्दों के निर्माण मे सहायक हैं। इसकें साथ ही प्रत्यय और उपसर्ग लगाकर नए शब्दों का निर्माण किया जा सकता है। यहां तक कहा गया है कि उपसर्ग, प्रत्यय और धातुओं की सहायता तथा शब्दों के क्रम परिवर्तन, संधि आदि से लगभग 85 करोड़ शब्द बनाए जा सकते हैं। परंतु देखना है कि अनेक शब्द केवल कोश की ही शोभा बनाने के लिए हैं या वे व्यवहारोपयोगी भी हैं। अतः अति उत्साह और केवल संस्कृत निष्ठ शब्दावली के प्रयोग का मोह छोड़ना व्यावहारिक दृष्टि से कहीं अधिक उपयोगी है। यही कारण है कि आरंभ में संवैधानिक, विधि और प्रशासनिक क्षेत्र में शब्दावली से संबंधित समस्या को हल करने के लिए बनाए गए कुछ कोश महत्वपूर्ण होते हुए भी लोकप्रिय नहीं हो सके। इसका कारण यह है कि प्रशासनिक कार्य के क्षेत्र में ऐसी शब्दावली का स्वागत होता है जो व्यावहारिक रूप से सहज, स्वाभाविक और और समझ में आ सकने योग्य हो। वास्तव में जिस भाषा का प्रयोग सरकारी कार्यो में किया जाता है और जो विभिन्न विभागों अथवा दैनिक सरकारी पत्र व्यवहार के लिए अथवा एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच पारस्परिक आदान प्रदान के प्रयोग में आती है। उस भाषा का स्वरूप न तो पूरी तरह से सामान्य बोलचाल की भाषा से मेल खा सकता है और न पूरी तरह स साहित्यिक भाषा से। अतः उसका स्वरूप कुछ अलग ही होता है और उसकी शब्दावली भी उसी के अनुरूप होना अनिवार्य है।
जहां तक हिन्दी की अपनी शब्द संपदा का प्रश्न है हमें अनेक शब्दकोश मिलते है। इस बीच नए नए शब्द इन कोशों में और भी जुड़ गए हैं। यहां तक कि हिन्दी शब्दसागर के 11 भागों में लगभग 2,11,50,000 शब्द उपलब्ध हैं। प्रश्न हिन्दी की संपदा का उतना नहीं है जितना कि अभिव्यंजना शक्ति और समय की संपूर्ण परिस्थितियों के अनुरूप ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाओं से संबंधित पारिभाषिक और प्राविधिक अर्थ रूपों को समझा सकने योग्य होने की उसकी सामर्थ्य का है। अतः हिन्दी के विकास की यह नई दिशा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है और भाषा को नए नए शब्द और अर्थ मिले हैं। अब धीरे धीरे न्यायालयों में, कार्योलयों में, समाचार पत्रों में, कार्यशालाओं में और जनता तथा सरकार के पारस्परकि कार्य व्यवहार में एक नए रूप में उभर कर सामने आ रही है। इस कार्य में विभिन्न राज्यों ने शब्दावली के निर्माण का कार्य किया है और उसके द्वारा बनाए गए अनेक कोश, शब्द संग्रह अथवा शब्द संकलन निरंतर प्रयोग में आ रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली प्रशासन आदि सम्मिलित हैं।

विधि शब्दावली

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोनियर विलियम, हिंदुइज्म, (के.एम.मुंशी द्वारा संपादित 'इंडिया इन हैरिटेंस' जिल्द 2, पृ. 91 राधाकुमुद मुखर्जी द्वारा उद्धृत

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