प्रशासनिक हिन्दी का विकास -डॉ. नारायणदत्त पालीवाल  

अंग्रेजों के विरुद्ध सुदूर उत्तर से दक्षिण तक पूर्व से पश्चिम तक जो राष्ट्रव्यापी आंदोलन चला उसका माध्यम अधिकांश रूप में हिन्दी होने के कारण यह भाषा राष्ट्रवयापी रूप में सामने आई। इस प्रकार हिन्दी एक अखिल भारतीय भाषा के रूप में इस देश को जोड़ती हुई धीरे धीरे पारस्परिक कार्य व्यवहार की भाषा के रूप में विकसित होने लगी और उसे संस्कृत के पश्चात् इस देश के जनमानस को जोड़ने वाली भाषा का रूप मिला। डाॅ. सुनीति कुमार चटर्जी का कथन है कि ‘अपने देश से प्रेम रखने वाले जो भारतीय राष्ट्र को अखंड मानते हैं, अवश्य स्वीकार करेंगे कि हमारी राष्ट्रीय, व्यापारिक तथा सांस्कृतिक एकता के बाद हिन्दी को ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप मानता हूूं। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ साहित्यिक और अंतप्रांतीय व्यवहार में हिन्दी को जो महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ उसमें बदलती हुई परिस्थितियों और उर्दू तथा भारत की सभी भाषाओं का सहयोग सम्मिलित है। चूंकि संस्कृत की भूमिका भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त अन्य सभी भाषाओं और हिन्दी के विकास तथा पोषण का मार्ग सुगम बनाने में उसका योगदान महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। अंतप्रांतीय विचार से हिन्दी की शब्दावली में संस्कृत अथवा तत्सम शब्दों को प्रधानता देना आवश्यक है। इसी आधार पर हिन्दी की शब्दावली का आवश्यक अंग अखिल भारतीय रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
मेरा मत तो यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा (जो नाम अब भारत की सभी मान्यता प्राप्त भाषाओं के लिए प्रयुक्त होता है) का स्थान इसलिए प्राप्त नहीं हुआ कि वह सभी भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ है वरन् इसलिए प्राप्त हुआ कि इस भाषा का देश में सबसे अधिक प्रचार और प्रसार है तथा इसे अधिकांश जनता समझती तथा बोलती है। हिन्दी प्रारंभ से भारत के सभी प्रांतों में बोली व समझी जाती थी और प्रायः सभी प्रांतों के अहिन्दी भाषी लेखकों ने इस भाषा में साहित्य सृजन भी किया है। इससे इस भाषा को संस्कृत की भांति अखिल भारतीय रूप मिला है। हिन्दी को उसका अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने में देश के कोने कोने में फैले हुए मज़दूर वर्ग, व्यापारी वर्ग, आजीविका व विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

राजभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो इस बात की आवश्यकता पड़ी कि नवोदित राष्ट्र की गरिमा और आत्मसम्मान के अनुकूल हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकृत और विकसित किया जाए। अतः समाज की नई नई आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन के रूप में और भारतीय जन जीवन के चिंतन तथा भावनाओं और संवेदनाओं की अभिव्यंजना के माध्यम के रूप में अन्य भारतीय भाषाओं के सहयोग के साथ साथ हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में चुना गया। भाषायी स्वाभिमान स्वतंत्र राष्ट्र के जीवन का एक अंश होता है। अतः स्वतंत्रता के पश्चात् हिन्दी को राजकाज की भाषा बनाने के पीछे यह भावना थी कि संपर्क भाषा के रूप में विकसित होकर हिन्दी, ज्ञान विज्ञान, अध्ययन-अध्यापन और साहित्य की ही भाषा न रहे वरन् उसे प्राशसनिक भाषा का रूप भी दिया जए और सरकारी काम काज बोलचाल तथा कार्य व्यवहार की भाषा बना दिया जाए। यह ठीक भी था क्योंकि कोमलकांत पदावली प्रशासनिक कार्यों के लिए प्रयोग में नहीं लाई जा सकती। जिस भाषा ने संत कबीर की साखियों को सजाया, सूरदास और तुलसीदास की कविता को संवारा और प्रसाद, पंत तथा महादेवी के गीतों को मधुर रूप दिया उसे संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने तथा प्रशासन के क्षेत्र में जन जन की भाषा बनाने के प्रयत्न किए गए। अतः साहित्यिक हिन्दी तथा बोलचाल की हिन्दी को न्यायालयों, विद्यालयों, कार्यशालाओं, प्रशासनिक संस्थाओं और सरकारी पत्र व्यवहार में अपनाए जाने के लिए नया रूप दिया जाने लगा। अतः यह प्रयास किया गया कि धीरे धीरे सरकारी क्षेत्रों मेें ऐसा वातावरण बने जो हिन्दी को अपने दैनिक कार्य में अपनाने के लिए सहायक हो। इसके लिए वैधानिक व्यवस्था के साथ साथ मानवीय और भौतिक साधन जुटाने का प्रयास किया गया और राजभाषा के रूप में हिन्दी को सरकारी कामकाज का माध्यम चुन लिया गया। भारत के संविधान निर्माताओं ने हिन्दी का महत्व सामझते हुए उसे राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में अंगीकार करने की व्यवस्था की। फलतः भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 में यह व्यवस्था की गई कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई हिन्दी यहां की राजभाषा होगी। संविधान के अनुच्छेद 351 में इसकें लिए जो निर्देश दिए गये हैं वे इस प्रकार हैं-

‘हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि कर उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः वैसी उल्लिखित भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।’

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोनियर विलियम, हिंदुइज्म, (के.एम.मुंशी द्वारा संपादित 'इंडिया इन हैरिटेंस' जिल्द 2, पृ. 91 राधाकुमुद मुखर्जी द्वारा उद्धृत

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